कानपुर। वकीलों के तीन दिन के प्रयास के बाद न्यायालय ने प्रेस क्लब के पूर्व महामंत्री और फिलवक्त अधिवक्ता कुशाग्र पाण्डेय की जमानत अर्जी को सशर्त मंजूर कर लिया है।

कोर्ट ने कागजात के आधार पर वर्ष 2009 से कुशाग्र को अधिवक्ता मानते हुए विस्तृत आदेश सुनाया है।
इससे पहले जमानत पर बहस के दौरान अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि, दीवानी विवाद में पुलिस का दबाव बनाने के इरादे से फौजदारी का फर्जी मामला दर्ज कराया गया है। इसके अतिरिक्त मुकदमा दर्ज करने के दो घंटे के अंदर बगैर जांच-पड़ताल कुशाग्र पाण्डेय को गिरफ्तार कर लिया गया।
इसी मामले में दो महीने पहले पुलिस अधिकारी ने कागजात देखने के बाद दीवानी विवाद के कारण कुशाग्र को क्लीनचिट थमाई थी।
खास बात यह कि, जमानत से पूर्व मेघदूत होटल के मालिक के परिसर के हिस्से के कब्जेदार कमल पॉल ने समझौता करते हुए विवादित परिसर की चाभी सौंपकर खुद को मामले से अलग कर लिया था। ऐसे में वादी पक्ष ने जमानत अर्जी का विरोध भी नहीं किया।
कुशाग्र पाण्डेय के अधिवक्ता शैलेंद्र पाण्डेय और बॉर एसोसिएशन के महामंत्री अमित सिंह ने सत्र न्यायाधीश से समक्ष तर्क रखा कि कथित तौर पर फौजदारी की घटना के समय और पुलिस में शिकायत दर्ज कराने में दस महीने का अंतर है। शिकायत के दो महीने बाद पुलिस ने बगैर जांच-पड़ताल मुकदमा दर्ज करते हुए दो घंटे के अंदर कचहरी परिसर से अधिवक्ता कुशाग्र पाण्डेय को गिरफ्तार कर लिया।
शैलेंद्र पाण्डेय ने सवाल उठाया कि, एफआईआर में देरी कतिपय कारणों से मुमकिन भी हो तो घटना वाले दिन मेघदूत होटल के मालिक ने डॉयल 112 के जरिए पुलिस को सूचना क्यों नहीं उपलब्ध कराई थी।
बहस के दौरान अधिवक्ताओं ने अदालत को बताया कि मेघदूत परिसर में कई स्थानों पर सीसीटीवी कैमरे लगे हैं, लेकिन किसी भी कैमरे का फुटेज वादी की ओर से उपलब्ध नहीं कराया गया है।
जमानत याचिका पर बहस के दरमियान परिसर के कब्जेदार कमल पॉल ने परिसर की चाभी मेघदूत होटल के मालिक अशोक मेहरोत्रा को सौंप दी। इसके बाद अदालत ने एक-एक लाख के दो बांड पर कुशाग्र पाण्डेय की जमानत को मंजूर कर लिया।


