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सुख-दुख

सहारा के कर्मचारियों की यह पीड़ा भी पढ़िए!

हारा वो जगह है जहाँ पर हर कोई सुनहरे सपने लेकर कभी आया करता था। और अब सहारा वो है कि यहां पर समय काटना किसी सजा से कम नहीं है? हम भी कई साल पहले यहां पर आये थे। इस उम्मीद के साथ, भविष्य उज्वल होगा। जवानी का एक खूबसूरत हिस्सा सहारा के कदमों में रख दिया। अब हालात यूं हो गए हैं कि लोगों को यहाँ तनख्वाह नहीं मिल रही। हेड्स अपनी कुर्सी बचाने में लगे हैं, कोई भी डिपार्टमेंट हो।

इस बार अक्टूबर की सैलरी गोल हो गयी। और नवंबर की सैलरी के भी आने की उम्मीद छोड़ने को कह दिया गया है। हालात ऐसे हैं कि स्टाफ के पास ऑफिस आने के लिए भी पैसे नहीं है। फिर भी मीडिया हेड सुमित रॉय को अपने स्टाफ पर तरस नहीं आ रहा।

सुमित रॉय के अंदर का मानव शायद मर चुका है। साथ ही हर डिपार्टमेंट के हेड का भी। हम ऑफिस जाते हैं पैसे लगा के, 8 घंटे की shift पूरी करते हैं और वापस घर आ जाते है। यह जानते हुए भी कि तनख्वाह नहीं मिलेगी। अगर आप हमें तनख्वाह नहीं दे रहे तो कम से कम छुट्टी ही दे दीजिए ताकि हम कहीं और नौकरी ढूंढ सकें। हर एक हेड यहाँ पर पैसा खाता है, पैसे अपने बनाता है उसको इस बात की चिंता ही नहीं है कि उसकी टीम के लोगों का क्या होगा.

हमें ऐसे हालात में धकेल दिया गया है कि न हाथ में पैसे हैं और ना ही नौकरी। इस उम्र में हमें कौन नौकरी देगा, इस बात से इन लोगों को कोई लेना देना नहीं है।

सहाराश्री के लिए मन में बहुत सम्मान है, लेकिन यह कौन सी बात हुई कि हमारी सैलरी काट कर सुब्रत जी की मूर्ति और उनके माता-पिता की मूर्ति का अनावरण हुआ। क्यों हुआ? आपको बोलते नहीं बना? आप सहाराश्री की आत्मा को भी ठेस पहुंचा रहे हैं।

आलमी चैनल बंद पड़ा है, नेशनल में guest debate में आना नहीं चाहते, अखबार के कई एडिशन बंद हो गए, डिजिटल के व्यूज भी दो चार या कहीं पे जीरो भी है, पर किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता.

यहाँ चुन चुन कर लोगों को निकाला जा रहा है। खासतौर से उन्हें जो काम करते हैं। staff  यहाँ ना के बराबर ही रह गया है। लेकिन फिर भी हेड्स की हाइरिंग हो रही है. दो महीने से सैलरी नहीं आई है। सुमित रॉय जी ये बताइए हमारे घर का खर्चा कैसे चलेगा….? आप तो सहारा के गेस्ट हाउस में रह रहे हैं। गाड़ी आप को मिली हुई है, आपका कोई खर्च नहीं है आप क्या जानें। हमसे पूछिए कि हम एक एक रुपया कैसे बचा-बचा के दिन काट रहे हैं, लेकिन आपके अंदर की शर्म मर चुकी है। आप जब से media head बने हैं, आपने कभी यह जानने की कोशिश नहीं की कि यहाँ लोग कैसे रह रहे हैं? आपसे अगर कोई मिलना चाहता है तो आप उसे डांट कर भगा देते हैं।

आपके कई एंप्लॉयीज ऐसे भी हैं जिनके घर में शायद चूल्हा भी नहीं जल रहा होगा। हर कोई जानता है यहाँ के heads का बाहर अपना बिज़नेस है, किसी की इवेंट कंपनी है, किसी को रियल एस्टेट से कमाई हो रही है, सीनियर रिपोर्टर बाहर टोपी पहना के लोगों की paid खबरें छापते हैं, चलवाते हैं, उससे पैसे बना रहे हैं। लेकिन हम लोगों का क्या जिसने पूरा समय सहारा को दिया?

मेरी जेबी रॉय से हाथ जोड़ के विनती है कि जीतने भी आपके हेड्स हैं, उन सबके अकाउंट चेक करवाईये और देखिये आप ही के पैसे कैसे और कितने मारे हुए हैं सभी ने। हमारी सैलरी के पैसे ये लोग खा जाते हैं और सैलरी के पैसे को अपनी जेबें भरने में उपयोग करते हैं।

सहारा की इमेज मार्केट में इतनी गिर चुकी है कि हमारे जुनियर्स अगर बाहर कहीं किसी चैनल, किसी अखबार में जॉब खोजने के लिए जा भी रहे हैं तो सहारा के नाम पर उनकी CV उलट कर रख दी जाती है। सोचें जरा कि सहारा के नाम पर हमें कोई नौकरी नहीं दे रहा। हमारी जेबें काटने की जगह अपने हेड्स की जेबें काटिये। ये दो से तीन लाख सैलरी लेते हैं और ऑउटपुट जीरो होता है। सारा दिन हम ऑफिस में मरते हैं और हमारे उपर ही तलवार चला दी जाती, आपको ये कुर्सी अब शोभा नहीं देती। 

सुमित रॉय जी, आपको ये कुर्सी दी गई है लोगों की समस्याओं का समाधान निकालने के लिए, ना कि हीरो बनकर अपने ऑफिस के इर्द-गिर्द घूमने के लिए और ऑफिस परिसर में ही बैडमिंटन खेलकर समय बिताने के लिए।

भड़ास को एक पत्रकार द्वारा भेजी गई पीड़ा पर आधारित

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
1 Comment

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  1. राधेश्याम

    December 4, 2024 at 11:08 am

    सबसे बदतर स्थिति पटना युनीट का है। यहाँ का संपादक संजय त्रीपाठी खुलेआम रासलीला में मगन है। विशाखा दो घंटे के लिए आफिस आती है और पुरा हाज़िरी बनता है। अंजली (मल्टी विटामिन) महिने में चार दिन आफिस आती है और पुरा हाज़िरी बनता है। कई बार इन लोगों को आफिस के अंदर और बाहर अशोभनीय तरीके से मिलते हुए पाया गया है।
    बिजनेस लगातार गीरते जा रहा है परन्तु इसकी चिंता इन्हें नहीं है। बस काम करने वाले लोगों को हटाने में ब्यस्त हैं। और थर्ड पार्टी से आफिस स्टाफ को गाली दिलवाते हैं।
    आफिस में चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों को अभद्र भाषा का प्रयोग किया जाता है।
    बाल्टी बाबा के नाम से मशहूर संजय त्रीपाठी एक बार में पांच कप चाय (बढका मग में) पिता है। और दुसरे को सलाह देता है कि चाय का खर्च कम करो।
    यह खुद ही कहता है कि मैं सहारा के ताबूत में अंतिम किल ठोक दुंगा। कारण कि मुझे सहारा में दुबारा इंट्री मीला है।
    यही हाल हो गया है सहारा पटना युनीट का।

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