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यह कवर पेज वह ही बना सकता है, जो समझता है कि मनमोहन जी क्या थे…

हेडिंग सौजन्य- सुरेंद्र राजपूत


नवेद शिकोह-

आलोचक पत्रकार को अवार्ड देने के जिगर वाला प्रधानमंत्री

धीमी सी आवाज़ में बोलने वाले पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय मनमोहन सिंह ने अपने कार्यकाल में पत्रकारिता की आवाज को बुलंद रखा था। वो अक्सर देश के पत्रकारों/संपादकों के साथ प्रेस मीट रखते थे। जिसमें तत्कालीन प्रधानमंत्री के साथ टेबिल पर बैठकर पत्रकार उनकी सरकार की कर्मियों -खामियों पर सवाल पूछते थे।

मनमोहन के दौर तक ही देश में प्रधानमंत्री की प्रेस कांफ्रेंस का सिलसिला भी बरकरार था। आलोचकों को उनकी खुलेआम आलोचना करने की छूट थी। विपक्ष और विरोधियों के फर्जी आरोपों के आधार पर मनमोहन सरकारों को मीडिया में घोटालेबाज लिखा गया। जो सब के सब आरोप अंततः फर्जी और झूठे साबित हुए थे।

सौम्य, सरल, ईमानदार और बेहद पढ़े लिखे मनमोहन सिंह जी पर निजी भद्दी टिप्पणियों को भी पूरी आजादी थी। कोई उन्हें कठपुतली कहता था कोई मौनी बाबा तो कोई कुछ ना बोलने वाला गूंगा प्रधानमंत्री। आजतक उनके खिलाफ निजी और अशोभनीय, अमर्यादित टिप्पणी करने वाले किसी एक भी आलोचना के खिलाफ कोई कार्रवाई कभी नहीं हुई।

लम्बे समय तक लखनऊ में पत्रकारिता करने वाले दयाशंकर शुक्ल सागर लिखते हैं कि हिन्दुस्तान अखबार में उन्होंने मनरेगा में हो रही गड़बड़ी से जुड़ी खबर लिखी। ये खबर असरदार रही और केंद्र सरकार ने योजना की खामियों को स्वीकार कर तत्काल कुछ सुधार किए।

दिलचस्प बात ये है कि मनमोहन सरकार में मनमोहन सिंह द्वारा शुरू की गई मनरेगा योजना की खामी बयां करने वाली खबर को उत्कृष्ट खबर माना गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मनरेगा की खामी बयां करने वाली खबर को लेकर उसे लिखने वाले पत्रकार दयाशंकर शुक्ल सागर को सम्मानित किया, अवार्ड दिया।

सागर लिखते हैं कि मनरेगा पर लिखी खबर अवार्ड के लिए एनाउंस की गई तो मनमोहन सिंह जी सागर की तरफ देखकर मुस्कुराए। अवार्ड देते हुए मनमोहन जी ने आलोचक पत्रकार को शुभकामनाएं,शाबाशी और बधाई देते हुए प्रोत्साहित किया।
ऐसे थे मनमोहन। मन मोहने वाले।

  • नवेद शिकोह
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