शंभुनाथ शुक्ला-
अमर उजाला छोड़े भी अब कोई 12 साल हो चुके हैं। वहाँ पर मेरा कुल कार्यकाल भी मात्र दस वर्ष का ही रहा पर फिर भी उसके मालिक की स्मृति मात्र से आँखें छलक आती हैं।
दिवंगत अतुल माहेश्वरी को गए 14 वर्ष हो चुके मगर आज भी लगता है कि अचानक या तो वे मेरे केबिन में आ जाएंगे अथवा उनका फोन आ जाएगा ‘अरे शुक्ला जी जरा आप यह पता कर लेते तो बेहतर रहता’। इतनी विनम्रता और संकोच शायद ही किसी मालिक में रहा होगा।
साल 2002 की अगस्त में मैंने कानपुर में संपादक के तौर पर अमर उजाला ज्वाइन किया था और 2011 की तीन जनवरी को वे नहीं रहे पर इतने ही वर्षों में उन्होंने ऐसी अमिट छाप छोड़ी जो दुर्लभ थी।
वे अपना बुरा चाहने वालों का भी भला चाहते थे। स्वयं का नुकसान उठाकर दूसरों का भला करने में भरोसा करते थे और अपने कर्मचारियों को अपना सहकर्मी समझते थे।
संपादकीय विभाग के लिए वे एक पत्रकार पहले थे मालिक बाद में। हारी-बीमारी में मदद करने के लिए उनका हाथ सदैव खुला रहता और अपना दिया पैसा वापस लेने में वे उतना ही संकोच करते। अमर उजाला के स्मृतिशेष ऐसे मालिक को मेरा कोटिश: प्रणाम।
पारस अमरोही-
आज तीन जनवरी है। अमर उजाला को नवजीवन देने वाले अतुल माहेश्वरी जी का समर्पण व स्मरण दिवस। अतुल जी की शख्सियत बेजोड़ थी। हमारे दौर में तो बड़े माहेश्वरी जी, अशोक अग्रवाल जी,अनिल अग्रवाल जी , अतुल माहेश्वरी जी, राजुल माहेश्वरी जी, सभी थे। मुरादाबाद में अमर उजाला, बरेली से छपकर मुरादाबाद पहुंचता था।
सन 1980 के सांप्रदायिक दंगों के बाद तो अमर उजाला को ऐजेंट की जगह अपना डिपो खोलना पड़ा। बिक्री करीब ढाई हजार से रोजाना तीस हजार प्रतियां की उल्लेखनीय बिक्री शुरू हुई। तीन महीने के कर्फ्यू और अशांति काल के दौरान वरिष कैरे, सुनील छंइया, प्रसार प्रभारी श्याम लाल, विज्ञापन प्रभारी अखिलेश जी ने साथी पवन कुमार के साथ जो रफ्तार पकड़ी, उसी की बदौलत अमर उजाला दिल्ली के दैनिक हिन्दुस्तान, नवभारत टाइम्स, वीर अर्जुन को पछाड़ कर घर घर पहुंच गया।
बाद में मुझे अतुल जी ने मुझे अमरोहा से मुरादाबाद और मुरादाबाद से सुनील छंइया को मेरठ अपने साथ ले गये। मेरठ में भी सांप्रदायिक दंगे में सुनील को मुरादाबाद दंगे की कॉपीग्राफी और रिपोर्टिंग का अनुभव काम आया। इसी के बाद किसान यूनियन और चौधरी महेन्द्र सिंह टिकैत ने मेरठ कमिश्नरी पर बेमियादी आंदोलन करते हुए किसानो को ताकत दी अमर उजाला में चौधरी टिकैत की खबरें अतुल माहेश्वरी जी की देखरेख में पहले पन्ने पर महंगें विज्ञापन हटाकर छापने का दूरदर्शी फैसला और रिपोर्टिंग टीम की पीठ पर शाबाशी का हाथ उस दौर के साथियों को आज भी याद आता है।
बाद में, इन्हीं सद्गुणों को राहुल माहेश्वरी ने अपनाते हुए अखबार का विनम्र विस्तार किया। अतुल जी आज भी यादों में हैं। नमन।


