हफ़ीज किदवई-
एक बात इनके बारे में कहनी थी, जो शायद मौजूदा वक़्त में किसी में नहीं है। किसी में मतलब किसी में नहीं है, यह अकेले हैं जो कर रहे हैं। लखनऊ में अगर आप हैं, तो मेरी बात की तस्दीक कर सकते हैं। अभी नया साल गुज़रा है, यानि 1 जनवरी, आप मेरे कहने से एक बार उधर से गुज़रिये, जिधर यह दिनभर रहते हैं। फिर देश के हर बड़े दल का कार्यालय भी झांक आए, तब आपको एक फ़र्क़ दिखेगा।
युवाओं की भीड़ जिस अंदाज में इनके पास नये साल की बधाई देने पहुँच रही है। इसका कोई मुकाबला नहीं कर सकता है। यह हर एक से मिल रहे हैं, कोई फूल ला रहा, कोई फल, कोई तस्वीर, तो कोई किताब। हर एक इनके नज़दीक जाने को बेताब नज़र आएगा मगर मैं यह सोचता हूँ, ऐसा दूसरे लोग क्यों नहीं कर रहे। सत्तारूढ़ दल भी है और तमाम दूसरे दल, इनके यहाँ यह भीड़ क्यों नदारद है। ऐसा उल्लास उधर क्यों नहीं है। उत्साह और अपनापन क्यों नहीं उनकी तरफ दिखता है।
तब एक बात समझ आती है कि अपने लोगों से जुड़ना भी एक कला है। जो हर एक को नहीं आती। आप इन्हें अपने लोगों से तफ़रीह करते, बात करते, समझाते, नाराज़ होते, उत्साह बढ़ाते, घर का हालचाल पूछते, ज़िन्दगी के मसले पर बात करते देख सकते हैं। भीड़ की भीड़ को यह यक़ीन है कि वह इनसे मिल लेगी और अपनी बात कह लेगी। भईया जब भी उसे सुनेंगे, तो कुछ तो करेंगे। हमने यह विश्वास हज़ारों आंखों में देखा है।
कभी-कभी सोचता हूँ कि इसी लखनऊ में सभी महत्वपूर्ण दलों के मुख्य लोग रह रहे हैं। वह अपने लोगों से जब नहीं मिलते, तो दूसरों से क्या ही मिलेंगे। सत्ता में जो लोग मौजूद हैं, उनसे मिलने का ख्याल, उनके ही लोगों में नहीं आता। हाथ मिलाना और बात करना तो उन्हें सपने में भी नहीं आता।
सैकड़ों बार शादियों में देखा है, एक भीड़ अचानक इनके पास पहुँचती है। इनसे मिलकर खुश होती है। तस्वीरें खींचती है और चुपके से कहते हुए निकल जाती है कि भइया की यही ख़ासियत है। मिलते ही पहचान लेते हैं। हम अक्सर सोचते हैं कि लोगों से मिलना इतना कठिन क्यों है। क्यों नहीं बड़े लोग हर एक से मिलने की कोशिश भी नहीं करते। आख़िर अपनों से मिलने में क्या घट जाता है।
इसीलिए इनके प्रति एक दीवानगी देखी है। कोई त्यौहार हो, नया साल हो या कोई भी महत्वपूर्ण अवसर, इनके इर्द गिर्द एक भीड़ आ जाती है। जो सिर्फ मिलना चाहती है और मिल लेती है। हम वह मदद खासकर आर्थिक मदद के बारे में नहीं बताएंगे। जो यह रोज़ ही आने वाले परेशान लोगों की करते हैं। अगर वह बातें लिखें तो बहुत कुछ कहना पड़ेगा। बस हम दिल से मानते हैं कि इनके इतना मददगार भी हमने किसी दूसरे को नहीं देखा। आप एक बार मदद पाए हुए व्यक्ति की आंखों में झाँककर देखिये, तब एहसास होगा कि खामोशी से यह लोग कितना कुछ कर जाते हैं।
यह आज इसलिए कह रहे हैं क्योंकि दिन ब दिन हमारे बीच से बड़े लोग घट रहे हैं। बड़े लोगों से मतलब उनसे है, जिनके नज़दीक आप जाकर बैठ जाएं। जो आपकी तक़लीफ़, खुशी और ज़िन्दगी को झाँककर देख सके। जो आपको एहसास दिलाएं कोई है, जिनके पास खुशी, ग़म या फिर तमाम मौकों पर जाया जा सकता है। इनका मिजाज़ वही है, एक कप चाय पीकर आप इनसे कह सकते हैं। हैप्पी न्यू ईयर भईया और उधर से जवाब भी आ सकता है, कहाँ टहल रहे हो, क्या कर रहे हो….
सियासत अपनी जगह, काम अपनी जगह मगर बतौर इंसान और ख़ुलूस यह बहुत ऊंचाई पर हैं और बहुतों से अलग हैं। हमने नये साल पर युवाओं को, प्रोफेशनल्स को, अधिकारियों को, बुज़ुर्गों को, कलाकारों, रचनाकारों को, खिलाड़ियों को, बच्चों को सब तरह के लोगों को इधर जाते देखा है। जो सिर्फ नये सालपर इनसे मिलने आए थे। ज़िन्दगी में आपकी सबसे बड़ी कमाई ही यही है कि साल की शुरुआत… कोई तो है, जो आपसे मिलकर करना चाहता है।
जिनके हिस्से में यह होता है। वह वाकई बड़े लोग होते हैं। नये साल पर आपसे मिलने की ख्वाहिश रखे लोग, वह भी जब आपके पास ताक़त न हो। तब आपके किरदार की गवाही तमाम मुस्कुराहटें देती हैं। यह इंसान इस मामले में बहुत ऊंचा है, तारीफ तो बनती है…


