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सुख-दुख

वीरेंद्र जी उस पीढ़ी के अक्खड़ लिक्खाड़ थे जिनकी पेशानी पर लिखा था – “Not for sale”

गौरव शर्मा-

एक गार्जियन सम्पादक का जाना

वर्ष 2011 की अलसाई जनवरी रही होगी। 2010 में नोएडा के सेक्टर 6 स्थित दैनिक जागरण इंस्टिट्यूट Jimmc Noida में पोस्ट ग्रेजुएट में मास कॉम में दाखिला लिया। इसी के बिल्कुल सामने मिड डे अखबार डीएलए का दफ्तर था। इसी से नाम डोरी लाल अग्रवाल जी (अमर उजाला के संस्थापकों में से हैं) का जुड़ा था। उसी नाम की वजह से मुझ जैसे नवागत पत्रकार डीएलए में काम करने के लिए उत्सुक रहते थे। मास कॉम का कोर्स लगभग कम्पलीट होने को था, तो नौकरी की फिक्र भी रही।

जानकारी हुई कि सम्पादक वीरेंद्र सेंगर जी हैं। अमर उजाला समेत कई बड़े अखबारों में काम कर चुके हैं। सोर्स लगाई, इंटरव्यू लिया। खबर ढंग से नहीं लिख पाए, फिर भी सिखतर के तौर पर पास कर दिए गए। 6 महीने केवल काम भर सीखना था। पैसा एक रुपया नहीं मिलना था। हर दिन जानकारी वीरेंद्र सेंगर सर को देनी, वो अपडेट करते। बताते कि खबर लिखने और खोजने में कमजोर बहुत हो, मेहनत बहुत अधिक करनी है। दिल्ली की सड़कों पर बेशक दौड़ लो, बिना न्यूज सेंस के अच्छे पत्रकार नहीं बन पाओगे।

दिन भर दौड़ता, भागता, लेकिन खबर के नाम सिर्फ विज्ञप्तियां मिलती। सेंगर सर के आदेशानुसार खबरों पर काम करते, खबरें थोड़ी बहुत लिखनी आ गई थीं। राहुल गांधी तब उरोज पर थे। हरि राम गुप्ता क्राइम रिपोर्टर रहे। उसी बीच खबर आई कि वर्ष 2011-12 में राहुल गांधी का पर्स खो गया। खबर सभी को सामान्य लगी। तवज्जो भी अधिक नहीं दी गई। सेंगर सर के पास भी इनपुट पहुंचा तो उन्होंने कहा कि देश में कांग्रेस का शासन है। उसके ही लगभग मुखिया का पर्स खो या चोरी हो जाये तो क्या ये खबर नहीं है?

मिड डे अखबार के लिए और क्या चाहिए। पर्स में राहुल गांधी की बहुत महत्वपूर्ण जानकारियां होंगी। एक झटके में किसी ने गायब कर दी। उनका मिसयूज होना समझ सकते हो? राहुल गांधी भारत के लिए तब ऐसे ही थे, जैसे आज अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प या एलन मस्क।

सभी को आईडिया भाया और खबर उसी पर तान दी गई। उसके बाद सेंगर सर ने मुझे परमानेंट कराया। सैलरी भी थी 8000 रुपये प्रति महीना.. और मेरी कई खबरें तब डीएलए के फ्रंट पेज पर लीड बनी थी। संस्थानिक तौर पर उन्हें सराहा भी गया। उन दिनों अखबार में साथी प्रशांत अवस्थी भैया, हरि राम गुप्ता, हेमन्त भैया, सूरज सिंह, गौरव भारद्वाज, फ़ोटो ग्राफर राजन राय, पुष्कर व्यास काम कर रहे थे। तब सीखने की अवस्था थी तो सीख रहा था.. आज भी सीख ही रहा हूं।

उसके बाद वर्ष दिसम्बर 2012 से खबरों का ककहरा Shadab Rizvi सर ने सिखाया.. और भी दैनिक जागरण, अमर उजाला, हिंदुस्तान में बॉस और सीनियर, जूनियर साथी साथ रहे.. सबसे प्रेम है और ताउम्र रहेगा..


सर्जना शर्मा-

संडे मेल में मेरे पूर्व सहयोगी वरिष्ठ पत्रकार वीरेंद्र सेंगर जी की तबियत पिछले कुछ वर्षों से खराब रहती थी लेकिन अपने कठोर संयम और अनुशासन से वे ठीक भी हो जाते थे। अभी मेरे जन्मदिन पर उनका फोन आया था शुभकामना के लिए। हर बार सबसे पहले सेहत की बात करते थे जैसा कोई अपना अभिभावक समझाता है सेहत का ध्यान रखो, ज्यादा भागदौड ना करो। उनका चले जाना केवल एक बेहतरीन मित्र का जाना नहीं है बल्कि एक अभिभावक, मार्ग दर्शक शुभचिंतक का चला जाना है।

एक ऐसा व्यक्ति जो हमारे दुख में दुखी सुख में सुखी रहता हो वो भी दिल्ली जैसे शहर में जहां सारे रिश्ते, दोस्तियां स्वार्थ, दौलत शोहरत पावर पर टिके हैं। जहां कोई आपसे बिना मतलब बात करना भी पसंद नहीं करता फोन या तो उठाते नहीं लोग या फिर कहते हैं मैं आपको अभी काल बैक करता हूं और कॉल बैक कभी नहीं आता।

वीरेंद्र सेंगर जी संडे मेल की नौकरी के दौरान मुझे वरिष्ठ सहकर्मी के रूप में मिले थे। उनका मेरे प्रति हमेशा बहुत स्नेह रहता था 1991 से लेकर उनकी अंतिम सांस तक उनका स्नेह मुझ पर बना रहा। अब कुछ वर्षों से उनका नौकुचिया ताल और नोएडा के बीच आना जाना लगा रहता था लेकिन फोन पर निरंतर संपर्क खैर कुशल जानते रहना मेरी नहीं मेरे पूरे परिवार की भी उनकी आदत थी। सेंगर जी के जाने से मैंने ही नहीं मेरे पूरे परिवार ने एक शुभचिंतक एक सच्चा हमदर्द हमेशा के लिए खो दिया है।

एक सहकर्मी के रूप में केवल मैं ही नहीं पूरा संडे मेल उनके विनम्र, शांत, धीर गंभीर व्यक्तित्व से प्रभावित रहता था। कभी किसी से झगड़ा नहीं किसी से प्रतिस्पर्धा नहीं। एक सच्चे निर्भीक पत्रकार। उनकी पत्नी रीता भदौरिया जी उत्तर प्रदेश सरकार में श्रम आयुक्त जैसे महत्वपूर्ण पद पर रहीं लेकिन सेंगर जी ने कभी न तो अपने पत्रकार होने का न ही पत्नी के बड़े ओहदे पर होने का फायदा उठाया।

कांग्रेंस, समाजवादी पार्टी, भाजपा नेताओं के साथ उनके संबंध बहुत अच्छे थे। लेकिन अपने संबंधों का उन्होंने कभी दिखावा नहीं किया। यहां तक कि अपनी बेटी के विवाह में उन्होंने एक भी नेता को नहीं बुलाया। बहुत कम लोगों को बुलाया केवल उनके करीब आत्मीय लोग वीरां की शादी में आए थे। उनके साथ मेरी ये तस्वीर वीरां की शादी की है। मुलायम सिंह यादव, अमर सिंह, कल्याण सिंह, नारायणदत्त तिवारी, शरद यादव, केसी त्यागी जैसे वरिष्ठ नेताओं के साथ उनके बहुत अच्छे रिश्ते थे।

केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ जी के साथ उनके संबंध इतने आत्मीय और मधुर थे कि पूछिए ही मत। दोनों में गजब की दोस्ती थी। एक बार तो दोनों का गुजरात में बहुत भयंकर एक्सीडेंट हुआ था। दोनों एक ही कार में थे।

अपने रिश्तों को सेंगर जी राजनैतिक विचारधारा से बिल्कुल अलग रखते थे। वरना मेरे जैसे कट्टर संघी और राजनाथ सिंह जी जैसे भाजपाई और स्वयं सेवक से उनके मधुर संबंध कैसे निभ सकते थे। मेरे पापा जी के साथ उनकी खूब राजनीतिक चर्चाएं होती थीं लेकिन कभी कटुता या कड़ा विरोध नहीं करते थे। झगड़ना, ऊंचा बोलना, गुस्सा करना उनके स्वभाव में ही नहीं था। दिखावा करना तो बिल्कुल उनकी आदत में नहीं था। जहां जिसके काम आ सकते थे आते थे बिना कोई एहसान दिखाए। उनको पता था कि मैं बहुत जल्दी लोगों पर भरोसा कर लेती हूं मुझे समझाया करते थे — देखो किसी भी इंसान की फितरत नहीं बदलती कुछ दिन वो दिखावा कर सकता है अच्छा होने का लेकिन फितरत सामने आती है ऐसा नहीं हो सकता एक व्यक्ति क के साथ खराब है ख के साथ ठीक है तो वो ठीक है। और फिर चार बार ये भी कहते थे समझी ना।

वीरेंद्र सेंगर जी पत्रकारों की उस पीढ़ी से थे जिनकी कलम में धार थी जिनकी भाषा पर पूरी पकड़ थी जो देश की राजनीति और नेताओं को अच्छे से समझते थे। जो सत्ता के करीब हो कर भी उससे उचित दूरी बना कर रखते हैं। जो नेताओं से अपने रिश्तों को लोगों के बीच अपनी धाक जमाने के लिए इस्तेमाल नहीं करते। अपनी बेटी की शादी में उन्होंने अपने बहुत पुराने और निकट राज नेताओं को भी नहीं बुलाया उन्होंने कहा — नेताओं मंत्रियों के आने से निजी समारोह बहुत औपचारिक हो जाता है। नाते रिश्तेदार और दोस्त सहज नहीं रह पाते। बताइए आज कौन ऐसा पत्रकार होगा जो नेताओं से अपनी नज़दीकियों की नुमाइश नहीं लगाना चाहेगा। फेस बुक पर पावरफुल लोगों के साथ अपनी तस्वीरें डाल कर रुतबा कायम नहीं करना चाहेगा।

दिल्ली के बारे कहा जाता है ये — city of whose who है। या तो आप दौलत मंद हो या शोहरत मंद हो या आपके पास राजनीतिक ताकत या फिर आप उनके किसी काम के हो तभी लोग आपसे बात करते हैं। इसका अनुभव दिल्ली में आ कर मैंने बहुत किया है। वीरेंद्र सेंगर जी दिल्ली के उन गिने चुने चंद मित्रों आत्मीयों में से एक थे जिनके साथ पिछले 24 साल से धूप में छाया में दुख में सुख में खुशी में गम में मैं चाहे नौकरी में हूं नहीं हूं, मैं अर्श पर हूं या फर्श पर उनको कभी इससे अंतर नहीं पड़ा। उनकी पत्नी रीता भदौरिया चाहे जितने भी बड़े पद पर थी जब भी उनके घर गयी मैं रीता ने अपने हाथ से खाना बना कर खिलाया।

सेंगर जी का चले जाना एक आत्मीय का चले जाना है। एक ऐसे फैमिली फ्रेंड का चले जाना है जिससे अपने घर परिवार की हर बात साझा करके दिल हल्का किया जा सकता था। क्योंकि दिल को पूरा भरोसा रहता था कि वे किसी से बात नहीं करेंगे इस बारे में। जब कभी उनसे अपनी समस्याएं साझा की तो वे कभी जजमेंटल नहीं हुए, कभी उपदेश नहीं दिया। वो जानते थे कि जब कोई इंसान दुखी होता है उसका दुख कैसे बांटा जाए।

जितने भी लोग पत्रकारिता जगत में उन को जानते हैं उन सबका दुख मैं फेसबुक पर देख रही हूं। भगवान वीरेंद्र सेंगर जी की आत्मा को अपने चरणों में स्थान दे। रीता और वीरां को दुख सहने की ताकत दे। सेंगर जी जैसा आत्मीय शुभचिंतक बहुत भाग्य से मिलता है। हिंदी पत्रकारिता ने भी एक बहुमूल्य हीरा खो दिया है। आप इतनी जल्दी चले जाओगे ये सोचा नहीं था सेंगर जी आप जहां भी रहना खुश रहना अपने दोस्तों की ऐसे ही चिंता करते रहना जैसे जीते जी करते थे।

{सेंगर जी की बेटी की शादी में ये तस्वीर पत्रकार ममता सिंह ने खींची थी आज ही ममता ने मुझे भेजी}


गणेश ज्ञानार्थी-

प्रखर वरिष्ठ पत्रकार सर्जना शर्मा जी की पोस्ट से हृदय विदारक समाचार मिला कि पत्रकारिता के शलाका पुरुष आदरणीय वयोवृद्ध यशस्वी तेजस्वी वीरेंद्र सेंगर हम सब को छोड़ कर अनंत यात्रा पर निकल लिए।

सचमुच एक विशालकाय व्यक्तित्व के धनी होकर भी सरलतम और साधारणतम रहन सहन कोई संत प्रवृत्ति का मनस्वी और तपस्वी ही धारण कर सकता है। इतनी मुश्किलों के बाद भी लोकतंत्र का जो आज स्वरूप बचा हुआ है,उसमे दादा वीरेंद्र जी का भी बहुत बड़ा योगदान है, जो उनके न झुकने, न बिकने के कारण भी संभव हुआ है।

वे उस पीढ़ी के अक्खड़ लिक्खाड़ रहे जिनकी पेशानी पर लिखा था,”Not for sale”. वे हम लोगों के आदर्श दिशा निर्देशक रहे। वे वह अंतिम पीढ़ी थे,जो मालिक से घबराते नहीं थे,बल्कि अखबार मालिक लोग उनके रुख को देख कर उनसे बात करते थे। विज्ञापन सुविधाओं और मालिकों के व्यवसायों के लिए सत्ताधीशों और नौकरशाहों के दरबार में उन्होंने कभी हाजरी नही दी। उन्होंने अपना जीवन स्वाभिमान से जिया और पत्रकारिता के मान सम्मान की रक्षा में खुद का होम किया।

उनसे मेरी पहली मुलाकात 1984 में मशहूर लेखक सुरेंद्र मोहन जी के साथ हुई। उसके बाद 1986 में डॉक्टर वेद प्रताप वैदिक जी के साथ उन्ही की गाड़ी में उनके साथ चंद्र शेखर जी के भुवनेश्वरी आश्रम जाते और दिल्ली वापस आते समय वीरेंद्र जी का साहचर्य मिला तो उनके क्लिष्ट व्यक्तित्व की विराटता का आभास हुआ। फिर इंडिया इंटरनेशनल सेंटर, मावलंकर हॉल के कार्यक्रमों और संसद की कैफेटेरिया में उनसे मुलाकात होती रही। एक बार प्रिय आलोक तोमर के साथ और दो बार रविंद्र शर्मा और अतुल अंजान के साथ उनसे बात चीत हुई। 1992 में कमांडर अर्जुन सिंह भदौरिया ने नीव के पत्थर लिखने में मुझे जब सहयोगी बनाया तो उसी दौर में वीरेंद्र जी के पास कुछ दस्तावेज लाने ले जाने के दौर में परिचय प्रगाढ़ होता गया। जब इस किताब का विमोचन डॉक्टर शंकर दयाल शर्मा ने तीन मूर्ति भवन में किया तो उससे पूर्व और बाद में उनसे वार्ता का अवसर मिला। इसके अतिरिक्त गांधी शांति प्रतिष्ठान में प्रातः स्मरणीय अनुपम मिश्रा जी के साथ उनसे वार्ता का एक संयोग एक समारोह में मिला। इंडियन न्यूज पेपर्स सोसाइटी आई एन एस के दफ्तर से प्रेस क्लब भवन के बीच अक्सर उनके चरण स्पर्श का सौभाग्य मिलता रहा।

उनके शब्द,उनकी शैली,उनकी सरलता, सादगी और अपने उद्देश्य के प्रति ईमानदारी और समर्पण भाव से बहुत कुछ सीखा जा सकता था। अपने आचरण से सिखाने में उन्होंने कोई कसर नही रखी। विभिन्न पत्रों में उनका लेखन प्रेरक और प्रभावी रहता था। उन्होंने अपने त्याग से जी बोया है,उसकी झलक नीचे सर्जना ही के लेखन में भी मिलेगी। लिखने कहने जी बहुत है,फिलहाल बस यही कि उनके जाने के बाद भी हम उन जैसे महान व्यक्तित्व के आदर्शों को भुलाएं नहीं और अनुसरण की कोशिश करते रहें,तो संभव है,की पत्रकारिता और से जन सामान्य के विश्वास की दीवार को ढहने से बचाया जा सके और लोकतंत्र की रक्षा में कलमकारों की अगली समर्पित पीढ़ी भी तैयार हो सके।

उनकी पावन स्मृति में विनम्र श्रद्धांजलि। ॐ शान्ति! शान्ति!! शान्ति!!!

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