नई दिल्ली। पत्रकारिता जगत में दो वर्ष पूरे कर चुकीं रितिका सिंह ने अपनी प्रोफेशनल यात्रा की दास्तान साझा करते हुए कहा कि यह दो साल केवल नौकरी के नहीं, बल्कि एक अधूरे से सपने को साकार करने के थे।
LinkedIn पर साझा की गई अपनी पोस्ट में रितिका ने लिखा कि इस सफलता तक पहुंचने का रास्ता आसान नहीं था—यह अस्वीकार, असमंजस और आत्मसंघर्ष से भरा रहा।
उन्होंने बताया कि उन्होंने देश के एक प्रतिष्ठित संस्थान से मास कम्युनिकेशन और पत्रकारिता की पढ़ाई की थी और उम्मीद थी कि डिग्री के साथ ही उन्हें बड़ी ब्रेक मिलेगी, लेकिन हकीकत इसके बिल्कुल उलट रही। कई बार कंपनियों ने सिर्फ इसलिए ठुकरा दिया क्योंकि वह रात की शिफ्ट नहीं कर सकती थीं, और कई बार उन्हें यह कहकर रिजेक्ट कर दिया गया कि वह ‘फिट’ नहीं बैठतीं।
रितिका बताती हैं कि वह हमेशा अपनी पूरी क्रिएटिव एनर्जी के साथ इंटरव्यू में जाती थीं, लेकिन फिर भी कुछ अधूरा सा लगता था। इसके बाद उन्होंने मुख्यधारा से हटकर ब्रांडेड कंटेंट और इवेंट्स के क्षेत्र में कदम रखा। उन्होंने वह नौकरी खुद खोजी जिसे लेकर कई लोगों ने उन्हें चेताया कि वह संगठन उनके विचारों से मेल नहीं खाता।
लेकिन यहीं से उनकी कहानी ने मोड़ लिया। उस संस्था ने उन्हें रणनीति बनाने, यात्रा करने, और अपनी रचनात्मकता के साथ स्वतंत्र रूप से काम करने का अवसर दिया। उनका विकास उम्मीद से कहीं अधिक तेजी से हुआ।
रितिका अब देश के बड़े मीडिया समूह ‘द टाइम्स ग्रुप’ में काम कर रही हैं और कहती हैं कि उन्होंने यह नौकरी अपने कौशल और मेहनत के दम पर हासिल की है। वह लिखने, प्रेजेंट करने और खुद को व्यक्त करने जैसे कार्य कर रही हैं, जिनसे उन्हें बेहद लगाव है।
अपने अनुभव साझा करते हुए वह कहती हैं, “कभी-कभी अस्वीकृति अंत नहीं होती, बल्कि ब्रह्मांड द्वारा आपको सही दिशा में मोड़ने का जरिया होती है।”
उन्होंने यह भी जोड़ा कि जब आप सब कुछ खुद से बनाते हैं, तो हर उपलब्धि विशेष बन जाती है। “भीड़ के साथ नहीं, अपनी अलग पहचान के साथ चलो,”—रितिका का यह संदेश उनके पूरे पोस्ट का सार है।
रितिका सिंह की मूल पोस्ट यहां पढ़ें…




