Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

प्रिंट

आज के अखबार : राष्ट्रपति के बहाने सरकार के बचाव में आये धनखड़, परमाणु मिसाइल के रूप में पेश किये गये

अखबारों ने नहीं लिखा है कि सरकार अपना वक्फ संशोधन कानून सुप्रीम कोर्ट में पास नहीं करवा पाई। इसके साथ जो हिन्दू मुसलमान शुरू हुआ था वह चलता रहेगा या तेज ही हो गया है। इस तरह कानून पास हो या नहीं, सरकार का राजनीतिक स्वार्थ सध रहा है। सुप्रीम कोर्ट पूरी तरह रोक लगा दे तो यह रोना रोया जा सकेगा कि सुप्रीम कोर्ट ने कानून नहीं बनाने दिया भले ऐसा संबंधित कानून के संविधान के अनुकूल न होने के कारण हो। कुल मिलाकर, सरकार अपने मामले में जनादेश को सर्वोपरि मानना चाहती है लेकिन विपक्षी सरकारों पर लागू नहीं होता। इसे संवैधानिक प्रक्रिया से तो नहीं ही हासिल किया जा सकता है इसलिए तानाशाही की वकालत कर रहे हैं उपराष्ट्रपति।

संजय कुमार सिंह

वक्फ कानून पर सुप्रीम कोर्ट में जो हुआ उसमें सरकार की इज्जत बच गई है। वरना सरकार ने एक असंवैधानिक कानून बनाया है और इसे पहली नजर में खारिज किया जा सकता था। सरकार ने पहले कैवियेट डालकर, फिर समर्थक सरकारों से याचिका दायर करवाकर और आखिरकार सोसिसिटर जनरल से समय मंगवाकर फैसले को पांच मई तक टलवाया है और संभव है फैसला वैसा नहीं आये जैसा आना चाहिये था और इसके लिए सुप्रीम कोर्ट पर सरकार का दबाव स्पष्ट है। मैं नहीं जानता यह कितना सही या गलत है और इसके लिए सरकार पर कार्रवाई होनी चाहिये कि नहीं लेकिन कानून अगर असंवैधानिक है, सरकार के पास सुप्रीम कोर्ट के सवालों का जवाब नहीं है तो बिला वजह देश में हिन्दू-मुसलमान की स्थिति पैदा करने के लिए सरकार के खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिये क्योंकि सत्तारूढ़ दल को इसका अपेक्षित लाभ अगर होना होगा तो हो ही सकता है और इसमें जनादेश का दुरुपयोग तथा गलत ढंग से जनमत हासिल करने की कोशिश जैसे मामले हैं। दुर्भाग्य यह कि समस्या इतनी ही नहीं है। सरकार के पक्ष में और संविधान के खिलाफ बैटिंग करने के लिए उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ स्वयं उतर आये हैं। उपराष्ट्रपति का काम सरकार की वकालत करना नहीं है लेकिन वे सरकार के चीयर लीडर के रूप में काम करते रहे हैं। कांग्रेस पार्टी ने बहुत पहले कहा था, ‘राज्यसभा के सभापति अंपायर और रेफरी होते हैं, चीयर लीडर नहीं’। इसके बावजूद, जय बच्चन जब बार-बार खुद को जया अमिताभ बच्चन बुलाये जाने से नाराज हो गईं तो उन्होंने राज्यसभा में उपराष्ट्रपति के लहजे पर एतराज किया था। उन्होने कहा था, … मैं कलाकार हूं और बॉडी लैंग्वेज समझती हूं। सर मुझे माफ करना, मगर आपका लहजा स्वीकार्य नहीं है, आप सभापति की कुर्सी पर हैं। इसके बाद सभापति ने कहा कि जया जी, आप अपनी सीट पर बैठिए। जया जी, आपने अच्छी प्रतिष्ठा अर्जित की है, लेकिन आप जानती हैं कि एक्टर डायरेक्टर के मुताबिक काम करता है। आप वो नहीं देख सकती जो मैं यहां से रोज देखता हूं।  शिष्टाचार तो आपको समझना पड़ेगा। नहीं, मैं ये बर्दाश्त नहीं करूंगा। ऐसा मत लगने दीजिए कि केवल आपकी प्रतिष्ठा है, हम यहां सब प्रतिष्ठा के साथ आए हैं।

आज की खबरें सरकार की प्रतिष्ठा बचाने वाली तो हैं लेकिन सुप्रीम कोर्ट पर उपराष्ट्रपति ने उंगली उठाई है और उसे खूब प्रचार मिला है। अमर उजाला में यह खबर टॉप पर आठ कॉलम में है। शीर्षक है, “राष्ट्रपति को आदेश नहीं दे सकतीं अदालतें, सुपर संसद जैसे काम कर रहे जज : धनखड़”। लगभग यही शीर्षक दि एशियन एज में तीन कॉलम की खबर का है। दो लाइन के शीर्षक के साथ एक लाइन का उपशीर्षक है, शीर्षक है, “राष्ट्रपति को आदेश नहीं दे सकतीं अदालतें, सुपर संसद जैसे काम कर रहे जज : धनखड़”। नवोदय टाइम्स में यह खबर दूसरे पहले पन्ने पर लीड है। शीर्षक लगभग यही है। फ्लैग शीर्षक है, धनखड़ बोले सुपर संसद के रूप में कार्य कर रही है न्यायपालिका। इंडियन एक्सप्रेस में इस खबर का फ्लैग शीर्षक है, जली नकदी के विवाद में एफआईआर क्यों नहीं? उपशीर्षक है, अनुच्छेद 142 लोकतांत्रिक ताकतों के खिलाफ न्यूक्लियर मिसाइल बन गया है। इसी तरह, मुख्य शीर्षक है – धनखड़ ने न्यायपालिका पर हमला बोला : राष्ट्रपति को निर्देश नहीं दे सकते या सुपर संसद की तरह काम नहीं कर सकते। हिन्दू में इस खबर का शीर्षक है, न्यायपालिका लोकतंत्र की शक्तियों पर हमला नहीं कर सकतीं। कहने की जरूरत नहीं है कि अगर ऐसा हो जाये और धनखड़ जैसों की चले तो भारत में पर्याप्त तानाशाही चल रही है। हालांकि वह अलग मुद्दा है। टाइम्स ऑफ इंडिया में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है। उसकी जगह नासिक में दरगाह को ध्वस्त किये जाने के कुछ घंटे बाद सुप्रीम कोर्ट ने स्टे जारी किया शीर्षक से एक खबर है। कहने की जरूरत नहीं है कि अदालत में जब सरकार के खिलाफ ही मामले होंगे तो जनता के मामले छूट ही जायेंगे। हालांकि आज की खबर के अनुसार, दरगाह को बुधवार को ध्वस्त किया गया। बांबे हाईकोर्ट ने इस मामले में समय पर सुनवाई नहीं की। शीर्ष अदालत ने इस संबध में हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल से रिपोर्ट मांगी है। कुल मिलाकर, केंद्र सरकार और डबल इंजन वाली राज्य सरकारें यह दिखाने, बताने और यकीन दिलाने में लगी हैं कि वे मुसलमानों के खिलाफ हैं और सारी कार्रवाई इसी पर केंद्रित है क्योंकि उसे इसी से (बंपर) वोट मिलने की उम्मीद है। कहने की जरूरत नहीं है कि देश में इसकी शुरुआत बाबरी मस्जिद गिरने से हुई थी और तमाम सबूत,वीडियो, बयान, तस्वीर होने के बावजूद किसी को सजा नहीं हुई। अब उपराष्ट्रपति कह रहे हैं कि अदालतें सुपर संसद की तरह काम नहीं कर सकती। भले उनका ऐसा कहना सरकार का प्रचारक होना लगता है।   

आज के अखबारों से पता चल रहा है कि उपराष्ट्रपति को सुप्रीम कोर्ट की कार्यशैली से एतराज है और उन्होंने कहा है कि सुपर संसद की तरह काम कर रहे हैं जज। इसके साथ ही सवाल उठता है कि क्या उपराष्ट्रपति चीयर लीडर होने के बाद प्रचारक होने की तरह काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा है कि अदालतें राष्ट्रपति को आदेश नहीं दे सकतीं। पर मुद्दा यह है कि तमिलनाडु के राज्यपाल के मामले में अदालत का आदेश सही था तो उसी क्रम में राष्ट्रपति को संबंधित सलाह गलत कैसे है और अगर है तो राष्ट्रपति खुद क्यों नहीं कह सकतीं। अगर उपराष्ट्रपति कह रहे हैं तो उन्हें राज्यपाल के आचरण पर भी बोलना चाहिये जिसपर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त कार्रवाई की है। यही नहीं, दिल्ली हाईकोर्ट के जज के घर नकदी मिलने की खबर के तुरंत बाद उपराष्ट्रपति ने सर्वदलीय बैठक बुलाकर न्यायपालिका पर चर्चा की थी। धनखड़ का कहना है कि यह मामला सिर्फ कोर्ट का नहीं है। यह संसद के लिए भी जरूरी है। संसद सबसे ऊपर है और उसकी बात मानी जानी चाहिए। मैं इससे सहमत नहीं हूं। मेरा मानना है कि कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका तीनों स्वतंत्र हैं और बराबर हैं। कार्यपालिका को विधायिका से स्वतंत्र किये जाने की जरूरत है तो उल्टे न्यायपालिका को सरकार के नियंत्रण में लाने की कोशिश की जा रही है। सरकार करे तो करे, उपराष्ट्रपति सहयोग कर रहे हैं। इससे प्रधानमंत्री तानाशाह बन जायेंगे। वरना संसद को जो चाहिये वह विधानसभाओं को बिना मांगे मिलना चाहिये।  

मुझे लगता है कि उपराष्ट्रपति को देश, सरकार और लोकतंत्र की चिन्ता है तो चुनाव आयुक्त की नियक्ति करने वाले पैनल से सीजेआई को हटाकर सरकारी पैनल बना लिये जाने पर भी बोलना चाहिये (था) और अदालत में उस मामले पर सुनवाई नहीं हो रही है तो उसपर भी चिन्ता जताना चाहिये। इसी तरह, उपराष्ट्रपति जज के यहाँ नोट मिलने की जांच पर तो जोर दे रहे हैं लेकिन राज्यसभा की सीट पर मिले नोटों की बात नहीं कर रहे हैं या उसकी जांच का क्या हुआ नहीं बता रहे हैं। जज के यहां नोट मिलने की जांच बिल्कुल होनी चाहिये, क्यों नहीं हो रही है? लेकिन होगी कैसे जब पुलिस ने मौका ए वारदात को सील नहीं किया, जले हुए नोट जब्त नहीं किये। यह माना जा सकता है कि नकदी मिलने की जांच अनुमति नहीं मिलने के कारण नहीं हो रही है लेकिन जिन अधिकारियों ने सुप्रीम कोर्ट के जज को खबर दी उन्होंने अखबारों को क्यों नहीं दी और नहीं दी तो एक हफ्ते बाद कैसे लीक हुई और हुई तो एक अधिकारी ने क्यों कहा कि नकदी जब्त नहीं हुई (या की)। और उसके खिलाफ कार्रवाई के लिए कौन सी अनुमति चाहिये या किसकी चाहिये और नहीं चाहिये तो कौन सी कार्रवाई हुई है। उपराष्ट्रपति को इसकी चिन्ता क्यों नहीं है? जहां तक राष्ट्रपति की बात है, मुझे लगता है कि वे अपनी बात रखने में सक्षम हैं।  सरकार ने उन्हें राष्ट्रपति बनाया है तो उनके सम्मान, अधिकार की चिन्ता सरकार को करनी चाहिये और यह चिन्ता पूरे देश की है। लेकिन उपराष्ट्रपति को सुप्रीम कोर्ट को विवाद में घसीटने का कोई अधिकार है, इसकी जानकारी मुझे नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट सरकार (असल में संसद) से ऊपर न हो नीचे भी नहीं है। उसे कानून और संविधान की व्याख्या करनी है। इस मामले में वही किया है। तीन बुनियादी सवाल पूछे हैं उसका जवाब तैयार होना चाहिये था लेकिन उसके लिये समय मांग लिया गया – एक नहीं दो बार। मुझे तो लगता है कि यह सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट पर दबाव बनाया जाना है और इस तरह समय लेकर इस सरकार ने कितने ही कानून का दुरुपयोग किया है। पीएमएलए कानून इनमें एक है। ऐसे कानून और जजों को ईनाम देने का मामला अलग है। पर यह सब तो फिर भी सरकार का हथियार है। बिलकिस बानो गैंगरेप केस में 11 दोषियों की रिहाई के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में 9 मई 2023 को सुनवाई हुई थी। तब एक आरोपी कोर्ट में पेश नहीं हुआ था, उसने दावा किया था कि उसे मामले का नोटिस नहीं मिला। इस पर कोर्ट ने आरोपियों के वकील को फटकार लगाते हुए कहा था- आप नहीं चाहते कि बेंच इस मामले की सुनवाई करे। अगर नोटिस नहीं मिला तो अखबार में छपवा दीजिए, लेकिन कोर्ट इस वजह से बार-बार सुनवाई टाल नहीं सकती। मामला बिलकिस बानो ने दायर किया था और अपनी याचिका में गुजरात सरकार पर दोषियों को समय से पहले रिहा करने का आरोप लगाया था। उन्होंने 11 दोषियों को रिहा किए जाने के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। इस मामले में गुजरात सरकार ने तो मनमानी की ही थी। तब किसने आवाज उठाई थी? कहीं ऐसा तो नहीं है कि प्रधानमंत्री, उनकी सरकार के खिलाफ नहीं बोलना है और उनके खिलाफ जो बोले उसे नहीं छोड़ना है। दिख तो यही रहा है। 

उपराष्ट्रपति के प्रचारक बनकर उतरने से और वैसे भी वक्फ कानून पर सुप्रीम कोर्ट का आदेश (जो भी है) वैसे नहीं छपा है जैसा मामला है। कुल मिलाकर, सरकार ने एक असंवैधानिक कानून बनाया है। सुप्रीम कोर्ट में उसे चुनौती दी गई तो सुप्रीम कोर्ट ने जो तीन प्रमुख सवाल पूछे उसका जवाब सरकार के पास नहीं है। पहले उसने समय मांग लिया फिर अगले दिन और लंबा समय मांग लिया। सुप्रीम कोर्ट ने इसे तुरंत खारिज करने की बजाय सरकार को समय दिया है और यह पर्याप्त चिन्ता के संकेत हैं। कई मामले ऐसे ही लटके हुए हैं और सरकार मनमानी करती रही है। फिर भी आज यह खबर सरकार को काफी बचाकर छपी है। इंडियन एक्सप्रेस का शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट के सवाल करने पर सरकार ने वक्फ कानून के प्रावधानों को 5 मई तक स्थगित रखा। इंडियन एक्सप्रेस में आज ही खबर है कि हापुड़ में दलितों को प्रधानमंत्री आवास योजना के घर खाली करने के आदेश दिये गये हैं। 9 अप्रैल को एक आवंटी को हापुड़ नगर पालिका से चिट्ठी मिली कि आपका कब्जा अवैध है। ऐसा ही पत्र 1986 से सयाना चौराहा क्षेत्र में रह रहे 40 अन्य घर वालों से कहा गया है। इन 41 घरों में 40 प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत नये बनाये गये हैं। 8 अप्रैल के नोटिस में कहा गया है कि जमीन सरकारी है और वहां तालाब हुआ करता था। लोगों पर अवैध कब्जे का आरोप है और 15 दिन के अंदर कब्जा हटाने के लिए कहा गया है। वक्फ कानून पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अमर उजाला की खबर का शीर्षक है, फिलहाल नहीं बदलेगी वक्फ संपत्ति की स्थिति, नई नियुक्ति भी नहीं होगी। कहने की जरूरत नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट ने रोक दिया कहने की बजाय जो कहा गया है ऐसा कहा गया है जैसे सरकार ही नहीं चाहती हो या सरकार ने स्वेच्छा से यह फैसला किया है। नवोदय टाइम्स का शीर्षक है, वक्फ न नियुक्तियां होंगी, न ही संपत्तियां होंगी गैर अधिसूचित। हालांकि, इसमें फ्लैग शीर्षक है, केंद्र सरकार ने उच्चतम न्यायालय को आश्वस्त किया। द टेलीग्राफ का शीर्षक है,  सरकार ने वक्फ कानून के दोहरे अपमान को रोक लिया। हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड का शीर्षक है, केंद्र का जवाब मिलने तक वक्फ कानून स्थगित। टाइम्स ऑफ इंडिया का शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट का स्टे नहीं क्योंकि सरकार ने वक्फ कानून के प्रमुख प्रावधानों को स्थगित कर दिया। दि एशियन एज का शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम वक्फ आदेश टाल दिया, केंद्र को जवाब देने के लिए एक सप्ताह का समय दिया। उपशीर्षक है, सरकार ने कहा संपत्तियों को डीनोटिफाई नहीं करेगी, अगली सुनवाई 5 मई को। द हिन्दू का शीर्षक है, केंद्र ने कहा सुप्रीम कोर्ट में अगली सुनवाई तक कोई वक्फ डीनोटिफिकेशन नहीं। मुझे लगता है कि इस खबर का शीर्षक होना चाहिये था, सरकार वक्फ कानून पास नहीं करवा पाई, हिन्दू मुसलमान चलता रहेगा। 

Pahad Ki Dada: Hill Mail Uttarakhand
CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन