सत्येंद्र पीएस-
जाति जनगणना को लेकर अखबारों की आज की हेडलाइन्स देख डालिए। अखबार क्रोध से उबल रहे हैं। मुझे लगता है कि अगर नरेंद्र मोदी सरकार न होती तो इसके खिलाफ उन्मादी जातीय दंगे की स्थिति ला देते अखबार व चैनल वाले! जैसा कि मण्डल कमीशन लागू होने के वक्त हुआ था।
खैर… नेहा राठौर के बहाने कुछ कहना है।
नेहा राठौर कुछ-कुछ ऐसे ही भाजपा सरकार के खिलाफ, आरएसएस के खिलाफ लिखती और गाती रहती हैं। वह अभी तक अन गाइडेड मिसाइल हैं, जो सरकार का विरोध करती हैं। सरकार का विरोध सपा को भी लाभ पहुंचा सकता है, कांग्रेस को भी या जो भी कोई विपक्ष है उसको।
नेहा राठौर ने साझा किया कि उनके खाते में कुछ 600 रुपये हैं। उसमें भी कोई आश्चर्य नहीं है। मेरे भी खाते का यही हाल रहता है, इसलिए इसको स्वीकार करना मेरे लिए मुश्किल नहीं है।
पंडित वीएस पेरियर ने एक बड़ी महत्त्वपूर्ण बात कही कि जो चीजें विपक्ष को लिखनी चाहिए थी और पब्लिक को उसे सिर्फ शेयर करना चाहिए था, उस बातें लिखने पर पब्लिक के खिलाफ एफआईआर हो रहा है! अगर वही बात पार्टियां कहतीं कि सरकार नालायक है, तो जनता मुसीबत में नहीं फंसती। ज्यादा कुछ करना भी नहीं था। अगर विपक्ष के किसी नेता को कोई अक्ल नहीं है तो नरेंद्र मोदी ने मुख्यमंत्री रहते आतंकी हमले होने पर मनमोहन सिंह के खिलाफ जो जो बोला था, वही विपक्षी दल के नेता बांच देते। केवल मनमोहन सिंह की जगह नरेंद्र मोदी रख देना था।
कांग्रेस ने एक सर कटा मानव का फोटो साझा किया। उसके तमाम अर्थ हो सकते थे। वह सरकार का विरोध था। मुझे बिल्कुल समझ में न आया कि कांग्रेस उस पर क्यों माफी मांगने पर उतारू हो गई? क्यों उसको हटा दिया? एक तो ऐसे फोटो जारी नहीं होने चाहिए थे। राजनीति में सीधे बोला जाता है। सीधे बोलते कि प्रधानमंत्री जी ने निकम्मापन दिखाया है, उनकी सरकार को कड़े फैसले लेने चाहिए लेकिन हर हमले के बाद सरकार सिर्फ लफ्फाजी करती है! इतना कहने में क्या डर होना चाहिए?
अभी विपक्ष एकदम लुल्ल टाइप काम कर रहा है। आप आम पब्लिक हैं तो सरकार के खिलाफ बोलकर फंसेंगे और आपका कोई माई बाप नहीं है।
हमको याद है कि 2012 में जब भाजपा ने कम्पेन शुरू किया था तो उसने सोशल मीडिया पर मनमोहन सरकार का विरोध करने वालों से सम्पर्क साधा। मेरे जैसे अदना आदमी से सीधे मुख्यमंत्री मोदी से मिलने का ऑफर था कि अहमदाबाद चलिए, एक बार मोदी जी से मिल लेंगे तो आपकी धारणा बदल जाएगी। मैं नहीं गया क्योंकि उन दिनों मैं नेहा राठौड़ टाइप क्रांन्तिकारी था।
आज जो विपक्ष में हैं उन्होंने सत्ता में रहते क्या किया? जिन लोगों को यूनिवर्सिटी में भरे, उनसे हिसाब लिया कि उन्होंने अब तक समाजवाद या गांधीवाद के लिए क्या किया है? भाजपा तो यूनिवर्सिटी में वीसी रख रही है, उसको भी काम पर लगा रखा है कि कोई मास्टर सरकार के खिलाफ बोले तो उसे तत्काल धमकी दो, नोटिस भेजो। आपने जो प्रोफेसर नियुक्त किए थे, वो क्या कर रहे हैं आपकी विचारधारा के लिए? सत्ता में रहते आपने कोई बौद्धिक प्रकोष्ठ रखा, जिसने लोगों को जोड़ा हो? क्या आपने कोई कल्चरल बैंड या टीम बनाई, जिसमें नेहा राठौड़ जैसों को ससम्मान जोड़ा जा सके? ये सब टीमें आपसे पैसे नहीं मांगती, सेल्फ सस्टनेबल होतीं। नहीं किया।
यह छोड़िए। आज की तारीख में जो लोग सोशल मीडिया या जनता के बीच विपक्ष की डुगडुगी बजा रहे हैं, क्या उन्हें विपक्ष पूछने वाला है? कम से कम उनका एक डेटाबेस ही तैयार करते, उस बंदे को फोन ही करते कि भाई आपके साथ हम हैं, आप अच्छा लिखते हैं।
तो बड़ी कठिन स्थिति है। मोदीजी की टीम हम लोगों के लिखे का भी इस्तेमाल कर लेती है, जिन्होंने ठान रखा है कि अन गाइडेड मिसाइल बने रहेंगे, विपक्ष और उसके समर्थक जितना लतियाएँ गरियाएँ, हमको मोदीजी के साथ नहीं जाना है!


