संजय सिन्हा-
मैं ट्रेन से पटना से दिल्ली लौट रहा था। एसी टू टायर के कोच में था। किसी स्टेशन पर अख़बारवाला आया। पहली ही खबर पर नज़र गई- “एसपी सिंह नहीं रहे।“ एसपी सिंह यानी सुरेंद्र प्रताप सिंह।
“देखते रहिए आज तक, इंतज़ार कीजिए कल तक।” ‘आज तक’ अपने आरंभिक दिनों में ही एसपी सिंह का चेहरा बन गया था।
मैं उन दिनों ‘जनसत्ता’ में था। रात के बुलेटिन में जब एसपी सिंह आते थे, तो वह एक बेहद साधारण चेहरा (बिलकुल भी चमकदार नहीं), मगर बोलता चेहरा होता था और लोग उन पर यक़ीन करते थे।
पत्रकार होने के नाते, एसपी सिंह से मेरी दो-एक बार मुलाकात हो चुकी थी। मुझे वो आकर्षक नहीं लगे थे। तब प्रभाष जोशी और बनवारी का कद मुझे अधिक प्रेरक लगता था।

मैंने भारत में टीवी पत्रकारिता को उठते और गिरते देखा है। जब कभी उस पर कुछ व्यक्तिगत संस्मरण लिखूंगा, तब लिखूंगा। अभी मैं एसपी सिंह को सिर्फ इसलिए याद कर रहा हूं, क्योंकि चलती ट्रेन में, जब मैंने उनके निधन की खबर पढ़ी (उन्हें ब्रेन हैमरेज हुआ था, यह खबर पहले से थी) तो मन बहुत विचलित हुआ।
इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि बहुत कम समय में एसपी सिंह ने ‘आज तक’ से टीवी पत्रकारिता को एक नई पहचान दी थी। बिलकुल वैसे ही जैसे प्रभाष जोशी ने ‘जनसत्ता’ से हिंदी अखबार को दी थी। दोनों का योगदान भाषा के स्तर पर भी था, और ख़बरें प्रस्तुत करने के स्तर पर भी।
‘जनसत्ता’ आया था – सबकी ख़बर लेने और सबको ख़बर देने। ‘आज तक’ आया था – सुबह छपकर आने वाली ख़बरों को रात में ही घर -घर पहुंचा देने। मतलब, जो ख़बर अगले दिन के अख़बार में छपने वाली होती थी, वह रात 9 बजे ही लोगों को ‘आज तक’ पर मिल जाती थी। खबरों के लिए फिर इंतज़ार करना होता था – “कल तक”।
जैसे ही मैंने अखबार में एसपी सिंह के निधन की खबर पढ़ी, मैंने अखबारवाले से और कई अख़बार ले लिए। सभी में यह खबर बेहद प्रमुखता से छपी थी। मेरे सहयात्री, जो पत्रकार नहीं थे, उन्होंने भी यह खबर पढ़ी। बात से बात निकली। उन्होंने मुझसे पूछा, “क्या एस पी सिंह ‘आज तक’ के मालिक थे?”
मैंने जवाब दिया, “नहीं, वो पत्रकार थे। संपादक थे। एंकर थे, आधे घंटे के न्यूज़ बुलेटिन के।” मेरे सहयात्री को शायद ‘आज तक’ या एसपी सिंह के बारे में ज्यादा पता नहीं था, लेकिन सभी अखबारों में एस पी सिंह के निधन की खबर को मिली प्रमुखता और प्रतिक्रियाओं को देखकर वे हैरान थे। उन्होंने पूछा, “किसी कर्मचारी के बारे में इतना कुछ छप सकता है? इतनी चर्चा? इतनी सुर्ख़ियां?
बस, यही थी संजय सिन्हा की आज की कहानी।
जब एसपी सिंह का निधन हुआ, तो आम जनमानस के मन में एक ही छवि बनी – “एसपी सिंह ही आज तक हैं।” नेताओं में होड़ लग गई थी शोक संदेश छपवाने की। खुद को उनका नजदीकी बताने की। उनकी निष्पक्षता का गुणगान करने की।
मैंने भले पहली मुलाक़ात में एसपी सिंह को बहुत आकर्षक न पाया हो, लेकिन वो मेरा नज़रिया था। सच तो यही है कि मीडिया जगत में उनका नाम किसी शहंशाह (अमिताभ बच्चन) या बादशाह (शाहरुख़ ख़ान) से कम नहीं था। और मर कर तो वो हिंदी मीडिया के सुपरस्टार राजेश खन्ना बन गए थे।
और क्योंकि अब वो इस संसार में नहीं हैं, उनकी यही छवि अमर हो गई। उन्हें वह अंत कभी नहीं मिलेगा, जो एक आम संपादक को मिलता है, जो पूरी ज़िंदगी मेहनत से नौकरी करता है, और फिर रिटायर होकर गुमनामी में जीता है- और एक दिन किसी की चाहत और किसी की नफरत का शिकार होकर चुपचाप दुनिया से चला जाता है।
(मेरे छोटे भाई के निधन पर उसके बेटे ने कहा था, “पापा, आप कभी बूढ़े नहीं होगे। आपकी छवि सदैव जवान रहेगी हमारी आंखों के सामने।” यही होता है जब कोई प्रिय व्यक्ति असमय चला जाता है।) एसपी सिंह भी असमय चले गए थे। पचास पार होने से पहले।
संजय सिन्हा की कहानी आज यहीं रुक सकती थी।
उन दिनों सोशल मीडिया नहीं था। अख़बार थे। उस दिन जितना एसपी के नहीं रहने पर उनके बारे में छपा था, मुझे नहीं लगता कि वो दर्जा राजेंद्र माथुर, प्रभाष जोशी, या एस. सहाय (मेरे प्रिय संपादकों) को उनके इस संसार से जाने पर मिला। (यह बिल्कुल मेरा व्यक्तिगत मानना है कि राजेंद्र माथुर, प्रभाष जोशी और एस सहाय का कद एसपी सिंह से बड़ा था।)
छोड़िए, जो अब इस दुनिया में नहीं, उसकी कहानी लिखते वक्त बहुत सावधानी रखनी पड़ती है। वो अपना पक्ष रखने नहीं आ सकते, इसलिए मेरी हर राय बेमानी है। और किसी की क़द-काठी निजी राय से तय नहीं होती।
हां, इतना ज़रूर कहूँगा, प्रभाष जोशी ने ‘जनसत्ता’ के आरंभ में जो टीम बनाई थी, उसमें हर व्यक्ति को परख कर रखा था। लेकिन उनकी एक आलोचना ये रही कि वो योग्य लोगों को तो हायर करते थे, मगर उन्हें बहुत आगे बढ़ने नहीं देते थे।
एसपी सिंह ने उल्टा किया (मेरी व्यक्तिगत राय), अयोग्य लोगों को हायर किया, उन्हें संस्थान के भीतर खूब बढ़ने का मौका दिया। इस तरह (मेरी दृष्टि में) दोनों ने ही अपनी ‘महानता’ के बावजूद संस्थान को चाहे जहां पहुंचाया, भारतीय हिंदी पत्रकारिता का नुकसान ही किया।
दोनों ही अपने समय के ‘भीष्म’ थे, जिन्होंने हस्तिनापुर (मीडिया जगत) को नई दिशा देने के बावजूद राज्य का भला नहीं किया।
जब एसपी सिंह के निधन पर इतनी ख़बरें छपीं – इतनी कि उसके बाद शायद भविष्य में कोई संस्थान यह जोखिम न उठाता कि कोई कर्मचारी संस्थान पर इतना हावी हो जाए कि लोग पूछने लगें, “मालिक थे क्या?” वैसे भी कहा जाता है- संस्थान किसी भी व्यक्ति से ऊपर होता है (होना भी चाहिए)।
ये सच्चाई है कि मुलाजिम जब ऊंचा उठता है, तो मालिक को धौंस देने लगता है। ‘अमावस’ की तरह।
(मिथुन चक्रवर्ती की एक फिल्म थी, जिसमें वो एक एमएलए का दास होता है। जब एमएलए को अगली बार पार्टी से टिकट नहीं मिलता, तो वह अमावस को टिकट दिलवा देता है, सोचता है कि अमावस तो हमेशा उसके नीचे रहेगा। पर ऐसा कहाँ होता है? अमावस जीत जाता है। सबसे पहले पुराने मालिक को ठिकाने लगाता है। बाकी कहानी आप जानते हैं।)
ओह! संजय सिन्हा लिखते-लिखते कितना भटक जाते हैं।
मूल बात थी – ट्रेन में अख़बार में छपी उस खबर की। साल था 1997, महीना जून। मैं दिल्ली पहुंचा। दोपहर में ऑफिस गया। वहां भी एसपी सिंह की ही चर्चा थी।
मैं हैरान था। इंडियन एक्सप्रेस के मालिक रामनाथ गोयनका 1991 में मरे थे। लेकिन उन्हें भी वो सुर्खियां नहीं नसीब हुई थीं। जिनका योगदान इंदिरा और राजीव गांधी के खून के आंसू से जुड़ा था, जिनके नाम पर सरकार थर्राती थी, जो एक समानांतर सत्ता का मालिक था, उसके मरने के बाद भी यहां एक मुलाजिम की मौत पर अधिक हलचल हुई थी।

मुझे लगता है- अगर आज एसपी सिंह जीवित रहते, तो टीआरपी की दौड़ में कुछ समय बाद फीके पड़ जाते। मगर वो जल्दी चले गए और अमर हो गए।
अब मूल प्रश्न – संजय सिन्हा आज ये कहानी क्यों लिख रहे हैं?
क्योंकि एनडीटीवी की एंकर – निधि कुलपति (पूर्व में ज़ी न्यूज़) के रिटायरमेंट पर सोशल मीडिया पर दो दिनों तक जो चर्चा रही, वह लगभग उतनी ही सुर्ख थी, जितनी सुर्खियां एसपी सिंह को निधन पर मिली थीं।
निधि कुलपति ने 35 साल की नौकरी में शायद ही कभी इतनी सुर्खियाँ बटोरी होंगी, जितनी रिटायर होकर बटोरीं। यही है असली कमाई।

लोग रिटायर होते हैं। समोसा-जलेबी की पार्टी होती है। और पार्टी खत्म होते ही पीठ पीछे बातें – “बहुत उड़ते थे, अब देखते हैं…।” लेकिन निधि जिस गरिमा के साथ रिटायर हुई हैं, हर आदमी सोचने को मजबूर है – “क्या मेरे रिटायरमेंट पर भी ऐसा सम्मान मिलेगा?”
शायद नहीं। असल में, यह कमाई पूरे जीवन की अर्जित पूंजी होती है। इसे कमाना आसान नहीं होता। इसके लिए लगातार स्वयं को भीड़ से अलग बनाए रखना पड़ता है। हर बार साबित करना होता है – “मैं हूं, मैं अलग हूं।”
एसपी सिंह ने वो किया। और उन्हें मरकर अमरता मिल गई। मुझे संदेह है कि अगर एसपी सिंह जीवित रहते, रिटायर होते, तो क्या उन्हें वही सम्मान मिलता, जो निधि कुलपति को मिला?
मैंने आजतक किसी के रिटायर होने पर इतने लेख नहीं देखे। हर लेख – निधि की प्रशंसा में। हर प्रतिक्रिया – सम्मान में।
नोट: संजय सिन्हा मन ही मन प्रसन्न हैं कि उन्हें रिटायर होने का “सौभाग्य” (या दु:ख) नहीं मिला। वरना समोसा-जलेबी खाते-खाते ऑफिस से निकलते ही लोग कहते — “अब देखते हैं…।”
मेरे मामले में देखने को किसी को कुछ मिला ही नहीं। मैं हमेशा नौकरी में ही रहा, और बिना रिटायर हुए खत्म हो गया। शेक्सपीयर की कहानी की तरह – “वो आता है, चला जाता है।” मैं आया, चला गया। किसी को कुछ पता ही नहीं चला। क्या हुआ? क्यों? कैसे? अब क्या?
अंतिम बात: निधि ने रिटायरमेंट के बाद जो अर्जित किया है – वो हर एंकर को (रिपोर्टर और संपादकों को तो शायद कभी नहीं मिले) प्रेरित करना चाहिए कि ऐसी कमाई कैसे की जाती है। बहुत कम लोग जानते हैं कि एंकर किसी प्रोड्यूसर का लिखा हुआ पढ़ते हैं। लेकिन दर्शक एंकर को ही पहचानते हैं।
यश चोपड़ा मरे, तो एक मिनट की ख़बर में निपटा दिए गए। राजेश खन्ना मरे, तो टीवी चैनलों ने कई दिन टीआरपी लूटी। मीडिया में यश चोपड़ा को नहीं, राजेश खन्ना को जगह मिलती है। मतलब जो दिखता है, वो बिकता है।
आज संजय सिन्हा हर एंकर से अनुरोध करते हैं- टेलीप्रॉम्पटर चाहे जो लिखा हो, अपनी छवि को विश्वसनीय बनाएं। झगड़ालू पति, पत्नी या कर्कश पड़ोसी जैसी नहीं, बल्कि भरोसेमंद एंकर की। निधि ने आपके सामने एक प्रतिमान रखा है- आप भी कोशिश करिए।
संजय ज्ञान- बिना मरे महाभारत में स्वर्ग सिर्फ युधिष्ठिर को मिला है। और पत्रकारिता में निधि कुलपति को।
पुन: पहली तस्वीर रामनाथ गोयनका के दिल्ली हवाई अड्डे पर अस्थि दर्शन की है। दूसरी तस्वीर एसपी सिंह की। और तीसरी सदाबहार निधि कुलपति की।
(रिटायरमेंट हो तो इस तरह, नहीं तो…संजय सिन्हा की तरह ग़ायब हो जाइए।)


