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“राष्ट्रीय सहारा” का बंद होता “हस्तक्षेप” : पत्रकारिता के एक युग का अंत!

यशवन्त सिंह-

“राष्ट्रीय सहारा” का वह महत्वपूर्ण परिशिष्ट ‘हस्तक्षेप’, जो हर शनिवार को प्रकाशित होता था, फिलहाल बंद कर दिया गया है। सहारा इंडिया मास कम्युनिकेशन के इस प्रमुख प्रकाशन का यह अति-महत्वपूर्ण परिशिष्ट कंपनी की वर्तमान हालत को देखते हुए निकट भविष्य में दोबारा शुरू होने की संभावना बेहद कम है।

यह परिशिष्ट “राष्ट्रीय सहारा” की शुरुआत से ही प्रकाशित होता रहा है और इसने हिंदी पत्रकारिता की दुनिया में एक नया मानदंड स्थापित किया था। देश-विदेश में आज भी इसके पाठकों की एक बड़ी संख्या मौजूद है। लेकिन कंपनी की बिगड़ती आर्थिक स्थिति, मालिकों के बीच वर्चस्व की लड़ाई, संपत्तियों में लूट-खसोट, और अखबार के प्रबंधन द्वारा चाटुकारिता और मनमानी के चलते यह महत्वपूर्ण परिशिष्ट बंद होने को मजबूर हो गया।

वर्तमान में “राष्ट्रीय सहारा” में 65 से 70 वर्ष की उम्र के सेवानिवृत्त लोगों की एक बड़ी संख्या ‘रिटेनर’ के रूप में कार्यरत है, जो ग्रामीण संवाददाताओं से अवैध वसूली में लगे हुए हैं। कुछ यूनिटों में तो इन बुज़ुर्ग रिटेनरों के माध्यम से प्रबंधकगण ‘ईमानदारी’ का दिखावा करते हुए निजी लाभ उठा रहे हैं।

मीडिया हेड सुमित राय स्वयं 60 वर्ष से अधिक आयु के हैं, और संभवतः इसी कारण इन थके हुए और सेवानिवृत्त रिटेनरों को हटाने में असमर्थ हैं। इनका एकमात्र उद्देश्य अपने रिटेनर शुल्क की वसूली है, जबकि दूसरी ओर सैकड़ों सेवानिवृत्त पत्रकार अपने बकाया भुगतान के लिए “राष्ट्रीय सहारा” के कार्यालयों के चक्कर काट रहे हैं।

इन परिस्थितियों के चलते “राष्ट्रीय सहारा” की सभी यूनिटों में कार्यरत मीडिया कर्मियों की स्थिति दिन-ब-दिन दयनीय होती जा रही है। पिछले 14–15 वर्षों में कर्मचारियों के वेतन में कोई वृद्धि नहीं हुई, और अब समय पर वेतन मिलना भी दुर्लभ हो गया है।

वरिष्ठ पदों पर आसीन अधिकारी केवल अपने और अपने करीबी लोगों के बकाया भुगतान में लगे हैं, जबकि निम्न पदों पर कार्यरत कर्मियों की कोई सुध नहीं ले रहा। आने वाले समय में हालात और बिगड़ने की पूरी आशंका है। यह एक पत्रकारिता संस्था के पतन की दुखद कहानी है, जो एक समय अपनी निर्भीकता और गुणवत्ता के लिए पहचानी जाती थी।

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