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शुगर इंडस्ट्री ने रिसर्चों पर खूब पैसा खर्चा- ताकि घी/फैट को दोषी और खुद को बेगुनाह दिखा सके!

प्रदीप चौधरी-

मैं भोजन में किसी बड़े और कृत्रिम बदलाव का पक्षधर नहीं रहा हूँ। न मैं कभी हाई प्रोटीन डाइट का समर्थक रहा, न व्हे प्रोटीन का, न क्रिएटिन का, और न ही उन सप्लीमेंट्स का जो आजकल सेहत के नाम पर परोसे जा रहे हैं।

कारण?.. क्योंकि इतिहास में पहली बार किसी देश ने बेहद संगठित और सरकारी स्तर पर अपने भोजन के पैटर्न को बदला था — और वो था अमेरिका।

साल था 1977 “The McGovern Report”, या आधिकारिक नाम — “Dietary Goals for the United States” इस रिपोर्ट के ज़रिये अमेरिका ने अपने नागरिकों को भोजन के संबंध में एक नई दिशा दी। उद्देश्य था:-

  • दिल की बीमारियों को रोकना
  • मोटापे से लड़ना
  • स्वास्थ्य बेहतर बनाना

लेकिन सलाह क्या थी?

  • फैट कम करो (घी, मक्खन, अंडा, मांस सब सवालों के घेरे में आ गए)
  • मीट कम खाओ
  • ज्यादा अनाज (grains), कार्बोहाइड्रेट और वेजिटेबल ऑयल्स खाओ
  • और शक्कर?

बस इतना कहा गया: “मिठाई कम खाएं” — कोई ठोस चेतावनी नहीं दी गई। शक्कर को कैसे बचा लिया गया? 1960s और 70s में शुगर इंडस्ट्री ने कई रिसर्च को फंड किया, ताकि दिल की बीमारी के लिए घी और फैट को दोषी बताया जाए, और शुगर को बेगुनाह दिखाया जाए। यह कुछ ऐसा था जिसे आज “कॉर्पोरेट साइंस” कहा जाता है — जहाँ तथ्यों से ज़्यादा चलता है पैसा। और हुआ क्या? लोग फैट से डरने लगे। लेकिन खाने लगे low-fat, high-sugar प्रोसेस्ड फूड:-

  • Low-fat yogurt (but high sugar)
  • Low-fat snacks (loaded with corn syrup)
  • Breakfast cereals (marketed as “heart healthy” but full of sugar)

नतीजा: एक खाद्य त्रासदी। फैट घटा, पर शक्कर का सेवन आसमान छूने लगा। और इसके साथ बढ़े:-

  • टाइप 2 डायबिटीज
  • इंसुलिन रेसिस्टेंस
  • लिवर फैट (NAFLD)
  • मेटाबॉलिक सिंड्रोम
  • और हाँ, मोटापा — जो 1980 में 15% था, और अब 42% से ऊपर है

यह गलती वैचारिक भी थी। यह कहानी सिर्फ स्वास्थ्य की नहीं, सोच के प्रदूषण की भी है। जैसे हमें स्कूलों में पढ़ाया जाता है कि: पानी गंदा होता है क्योंकि—

  • लोग नहाते हैं,
  • जानवर नहलाते हैं,
  • कपड़े धोते हैं,
  • फूल बहाते हैं,
  • और… फैक्ट्री का केमिकल भी बहाया जाता है।

और फिर सबको बराबर दोषी बता दिया जाता है। लेकिन क्या कोई सोचता है कि एक इंसान का नहाना और फैक्ट्री का हज़ारों लीटर ज़हरीला केमिकल छोड़ना बराबर है?

यही हुआ फैट और शुगर के साथ। घी, मक्खन, नारियल तेल — जो पीढ़ियों से शरीर को ऊर्जा और ताकत देते आए — उन्हें भी उसी पंक्ति में खड़ा कर दिया गया जहाँ असली अपराधी रिफाइंड शुगर और कॉर्न सिरप थे। हमें फर्क समझना होगा-

  • नहाना “प्राकृतिक” है — प्रदूषण तब होता है जब कोई फैक्ट्री इंडस्ट्रियल वेस्ट बहा देती है।
  • वैसे ही, घी या प्राकृतिक फैट शरीर के लिए ज़रूरी हैं — और शक्कर, जो हर चीज़ में छुपी है, असली ज़हर है।

भोजन विज्ञान नहीं, बुद्धिमत्ता है। परंपरा में जवाब है — प्रयोग में अक्सर धोखा। जो दुनिया 1977 में एक संगठित भूल कर चुकी है, कहीं हम फिर इन नए-नए उत्पादों के ज़रिए फिर 1977 को रिपीट तो नहीं कर रहे?

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