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सियासत

मीडिया की स्वतंत्रता पर सेंसर की स्याही क्यों?

मनोज अभिज्ञान-

25 जून 1975 को आधी रात के बाद जब राष्ट्रपति ने आपातकाल की अधिसूचना पर हस्ताक्षर किए, तो दिल्ली की सड़कों पर पुलिस और सीबीआई की गाड़ियों की सरगर्मी तेज हो गई। सैकड़ों विपक्षी नेता, बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ता और छात्र नेताओं को रातोंरात उठा लिया गया। लेकिन जो सबसे पहले निशाने पर आया, वह था — प्रेस। और यह संयोग नहीं था, बल्कि सत्ता की सोची-समझी रणनीति थी। अगर किसी लोकतंत्र की आत्मा को चुप कराना हो, तो सबसे पहले उसकी आवाज़ को खामोश करना पड़ता है — और उस समय भारत की आवाज़ अखबारों में बसती थी।

दिल्ली के सभी बड़े अखबारों की बिजली काट दी गई। The Indian Express, The Times of India, Hindustan Times, Navbharat Times, Patriot — सब अंधेरे में थे। ये वही अखबार थे जिनसे देश जागता था, जिनके जरिए लोगों तक सूचना, आलोचना और चेतावनी पहुँचती थी। पर आज वे खुद बेजान हो गए थे। अगले दिन की सुबह जो अखबार छपे, उनमें ना तो इमरजेंसी की सच्चाई थी, न गिरफ़्तार लोगों की सूची, न चेतावनी — सिर्फ सरकार का तैयार किया हुआ घोषणापत्र।

सेंसरशिप लागू कर दी गई। सभी अखबारों को आदेश था कि कोई भी खबर, संपादकीय, कार्टून, या लेख तब तक नहीं छपेगा, जब तक सूचना मंत्रालय से अनुमति न मिले। सरकार ने प्रेस सेंसरशिप गाइडलाइंस जारी कीं — जिनमें ‘राष्ट्रीय एकता’, ‘शांति व्यवस्था’, और ‘जनहित’ जैसे मुलायम शब्दों में अखबारों को बंदी बनाने का तरीका लिखा गया था। संपादकों को बुलाकर व्यक्तिगत रूप से निर्देश दिए गए — जो नहीं मानेंगे, वे छप नहीं पाएँगे।

और फिर शुरू हुआ भारतीय प्रेस का आत्मसमर्पण।

Times of India ने अपने संपादकीय में इमरजेंसी को “unavoidable” बताया। Hindustan Times ने “necessary correction” शब्द का प्रयोग किया। अधिकांश हिंदी अखबारों ने तो पूरे उल्लास से इसे “अनुशासन पर्व” करार दिया। कुछ पत्रकारों ने इस सेंसरशिप को ‘राष्ट्रहित में आवश्यक’ कहकर अपनी अंतरात्मा को माफ कर दिया। न कोई जांच रिपोर्ट छपी, न कोई विपक्ष की बात — सिर्फ सरकारी विज्ञप्तियाँ, सरकारी योजनाएँ और सरकारी बयान।

लेकिन इस घने अंधकार में कुछ टिमटिमाती मशालें थीं — जो यह मानती थीं कि जब बाकी सब चुप हों, तो चुप रहना गुनाह है।

The Indian Express ने जब संपादकीय लिखने की अनुमति नहीं मिली, तो उसने संपादकीय कॉलम को खाली छापा। उस सफेद कोरे कॉलम ने सरकार के खिलाफ जितनी बात कही, वह हजार शब्दों से ज़्यादा असरदार थी। यह मूक प्रतिरोध इतिहास बन गया। The Statesman (कोलकाता) के संपादक C.R. Irani ने सेंसरशिप के नियमों के बावजूद आलोचनात्मक खबरें छापीं, और अंतरराष्ट्रीय प्रेस को भारत की स्थिति से अवगत कराया।

साप्ताहिक पत्रिकाएँ जैसे Mainstream (निखिल चक्रवर्ती), Himmat (राजमोहन गांधी) और Economic and Political Weekly (Krishna Raj) लगातार सीमाओं में रहते हुए भी चेतावनी देती रहीं। उन्होंने सरकार को खुश करने की बजाय पाठकों को जगाने का काम किया। और उसका नतीजा यह हुआ कि Himmat का लाइसेंस रद्द कर दिया गया, Mainstream पर दबाव बढ़ा और उनके संपादकों को पूछताछ के लिए बुलाया गया।

कुलदीप नैयर, जो तब इंडियन एक्सप्रेस में थे, जेल भेजे गए। प्रभाष जोशी जैसे पत्रकारों पर नजर रखी गई। पचास से ज़्यादा छोटे और स्वतंत्र प्रकाशनों को निलंबित कर दिया गया या बंद करा दिया गया। और जब पत्रकारों ने विरोध जताया, तो सरकार ने प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया को ही भंग कर दिया — ताकि कोई संस्था यह न पूछ सके कि क्या सही है और क्या ग़लत।

इसी समय आया वह मुकदमा जिसने भारतीय न्यायपालिका की रीढ़ की परीक्षा ली — ADM जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला। सवाल था: क्या सरकार किसी को बिना कारण बताए हिरासत में रख सकती है और व्यक्ति अदालत में जाकर न्याय मांग सकता है? सुप्रीम कोर्ट ने कहा — नहीं।

चार न्यायाधीशों ने माना कि जब आपातकाल लागू हो, तो नागरिकों के पास जीवन और स्वतंत्रता का कोई दावा नहीं रह जाता। वे सरकार की मर्ज़ी पर जीवित रहेंगे या जेल में होंगे, यह सरकार तय करेगी। सिर्फ एक न्यायाधीश — एच.आर. खन्ना — ने असहमति जताई और कहा कि जीवन और स्वतंत्रता जैसे अधिकार संविधान से पहले के हैं, और उन्हें कोई सरकार छीन नहीं सकती। इसी असहमति के चलते उन्हें भारत का मुख्य न्यायाधीश नहीं बनाया गया।

यह न सिर्फ रोचक कानूनी मोड़ था, नैतिक पतन का चरम भी था — जब देश की सर्वोच्च अदालत ने भी सत्ता के सामने झुकने में शर्म नहीं की।

समय बदला, सरकार बदली, और 1978 में संसद ने 44वाँ संविधान संशोधन पारित किया। इसमें यह साफ कर दिया गया कि अनुच्छेद 21 — जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता — कभी भी निलंबित नहीं किया जा सकता, चाहे कैसा भी आपातकाल हो।

पर इतिहास ने अपना अंतिम संशोधन 2017 में किया — जब के.एस. पुट्टस्वामी केस में सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा कि निजता मौलिक अधिकार है। और उसी फैसले में जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ ने साफ शब्दों में ADM जबलपुर को असंवैधानिक, अनुचित और लोकतंत्र विरोधी घोषित किया। उन्होंने लिखा कि वह फैसला ‘कानून का गला घोंटने जैसा था।’ यह उस पिता के निर्णय का खंडन था, जो खुद ADM जबलपुर के बहुमत में शामिल थे — वाई.वी. चंद्रचूड़।

यह केवल निर्णय नहीं था — यह आत्मशोधन था, ऐतिहासिक पश्चाताप। लेकिन पश्चाताप तभी सार्थक होता है जब समाज याद रखे कि क्या हुआ था।

प्रेस की स्वतंत्रता कोई स्थायी गारंटी नहीं है। वह हर पीढ़ी को अपनी कलम, अपने काग़ज़ और अपनी रीढ़ से कमानी पड़ती है। क्योंकि अगर अगली बार फिर कोई सत्ता कहे — “मत छापो”, और संपादक फिर कहे — “ठीक है”, तो फिर लोकतंत्र केवल इतिहास की किताबों में मिलेगा।

इसलिए आज जब भी कोई अख़बार चुप रहता है, जब चैनल सरकारी प्रवक्ता बनते हैं, जब आलोचना को राष्ट्रद्रोह कहा जाता है, तो 1975 की याद ज़रूरी हो जाती है।

वह याद सिर्फ अंधेरी रात नहीं थी — वह चेतावनी थी।
कि अगर हम फिर चुप हो गए,
तो यह देश फिर अंधेरे में चला जाएगा —
बिना बिजली काटे,
बिना कोई अधिसूचना जारी किए।

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