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सुख-दुख

विक्रम राव लिखा पसंद आने पर प्रतिक्रिया देने में कंजूसी नहीं करते थे!

उमेश चतुर्वेदी-

साल 2011 की बात है..जनसंदेश टाइम्स लखनऊ से निकलने लगा था..भाई Hareprakash Upadhyay संपादकीय और फीचर पेजों के प्रभारी थे..उन्होंने मेरे कुछ लेख छापे..याद नहीं, किस विषय पर लेख था..एक रात को फोन की घंटी बजी..शायद दस बजे के आसपास का समय था.

दूसरे छोर पर गुरू गंभीर आवाज गूंजी…पंडित क्या गजब लिखा है.. धन्यवाद कहते हुए मैंने उस स्वर को प्रणाम किया और उनका परिचय पूछा..दूसरे छोर से आवाज गूंजी.. विक्रम राव.. के विक्रम राव.

के विक्रम राव उसके बाद मेरे घरेलू बन गए..जब किसी बड़े अखबार में लेख छपा और उन्हें पसंद आया… कि उनका फोन आ जाता..मोबाइल के जरिए कानों में आवाज गूंजती..पंडित क्या गजब लिखा..अच्छा होता एक और प्रसंग तुम जोड़ देते…और प्रसंग भी बताते..

जब कभी किसी राजनीतिक घटना की असल और तफसील से जानकारी चाहिए होती है, मैं दो ही लोगों से संपर्क करता रहा हूं.. हमारा सौभाग्य है कि अच्युतानंद मिश्र जी हमारे बीच अब भी हैं.. और दूसरे के विक्रम राव..

राजनीति की दुनिया के तथ्यों की तसदीक के लिए दो राजनेताओं से भी संपर्क करता रहा हूं.. उनमें भी एक अब नहीं रहे.. दूसरे अब भी हैं और भगवान करे कि दशकों तक हमारे बीच रहें..

विक्रम राव उस पीढ़ी के पत्रकार थे, जो लिखा पसंद आने पर प्रतिक्रिया देने में कंजूसी नहीं करते थे.. आज तो ऐसी बौनी पीढ़ी आ गई है, जिसे अच्छी चीजों पर भी प्रतिक्रिया देने से हिचक होती है…ऐसा करने में भी उसे अपना अपना स्वार्थ दिखता है..

भारतीय काव्य शास्त्र में एक सूत्र वाक्य व्यंजना में पढ़ाया जाता है, ‘अहो रूपम्, अहो ध्वनिं.’ अब लेखन पर प्रतिक्रियाएं इसी अंदाज में आती हैं..यानी तुम मेरी पीठ खुजलाओ और मैं तुम्हारी..

अगर आप ऊंचे ओहदे पर हों, अपने खेमे में हों…कूड़ा भी लिखेंगे..आह और वाह जैसी प्रतिक्रियाओं से आपका फोन गूंजता रहेगा, आपके सोशल मीडिया की वाल पट सकती है.. ऐसे माहौल में विक्रम राव जी पत्रकारिता की आश्वस्ति थे..

आज रील पत्रकारिता का दौर है…रील वाले पूजे जा रहे हैं..टीवी पर अल्लबल्ल बोलिए और नाम और दाम दोनों कमाइए..लिखना आज की पत्रकारिता की जरूरत नहीं रहा..ऐसे माहौल में विक्रम राव जी का अनवरत लेखन पत्रकारिता की लेखन परंपरा या कहें कि मूल का बोध कराता रहता था..वे गजब के लिक्खाड़ थे..पत्रकारिता में भाषा का खेल उनसे सीखने की हमने बहुत, लेकिन नाकाम कोशिश की..12 मई को निधन के कुछ घंटे पहले तक उन्होंने लिखा और बता कर गए कि पत्रकारिता के लिए लेखन पहली और आखिरी ही नहीं, अनिवार्य शर्त होनी चाहिए..

इन्हीं राव साहब की याद में 12 जुलाई के दिन दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में श्रद्धांजलि सभा रखी गई थी..इस दौरान उनके विविध रूपों, व्यक्तित्व के आयामों को लेकर लोगों ने अपनी राय रखी..तब पता चला कि वे कितने विराट थे…लेखन में, रिपोर्टिंग और पत्रकारिता यूनियन की राजनीति में…

ऊपर तस्वीर उसी वक्त की है…

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