
डॉ अरविंद मिश्रा-
विश्व सर्प दिवस पर एक उलाहना मिला कि मैंने आज सांपों पर कुछ नहीं लिखा जबकि सर्प विमर्श मेरा पसंदीदा विषय है। हलांकि मैं सांपों पर जन – जागरूकता के लिये प्रायः लिखता ही रहता हूं मगर रस्मी तौर पर आज भी कुछ लिख देना चाहिए इस लिहाज से यह लेख आपके सामने है।
मैंने भारत की पर्यावरण /पारिस्थितिकी तथा सामाजिक विषयों की प्रमुख प्रतिष्ठित पाक्षिक पत्रिका, “डाऊन टू अर्थ” (सेंटर फार साईंस ऐंड एनविरानमेंट, नई दिल्ली) में एक अलग नजरिये का लेख देखा जो सर्प बचावकर्ता (रिस्क्यूअरों) द्वारा सांपों पर किये जा रहे अत्याचार पर फोकस करता है।
दरअसल भारतीय वन्य जीव अधिनियम की अनुसूची एक की प्रजाति के साँपों का सोशल मीडिया पर यूट्यूबर्स / सोशल इनफ्लूयेंसरों द्वारा ‘बचाव’ के बजाय ‘दुर्व्यवहार’ किया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि साँपों को ‘बचाए’ जाने वाले वीडियो विशुद्ध रूप से आर्थिक लाभ के लिए हैं न कि सर्प रक्षा के लिये।
सांपों को उनके रहवास (हैबिटैट) से विस्थापित करना उनके साथ अत्याचार करना है। पारिस्थितिकी विज्ञान में निच /निश (niche) की अवधारणा है जो किसी भी जीव के जैविक कार्यकलाप /व्यवहार और उसके स्थान (पते) का सूचक है। निच ही उनका मूल स्थान है। अब जैसे कोई अजगर किसी धान के खेत में है, वही उसका ‘निच’ है, रिस्क्यू के नाम से वहां से उसे हटाना और किसी नये आक्रामक वातावरण /परिवेश में ले जाकर छोड़ देना उसके लिये मृत्यु का कारण हो सकता है। वह भला रिस्क्यू कहां हुआ?
डाऊन टू अर्थ पत्रिका के अनुसार विशेषज्ञों ने जानवरों पर अत्याचार और वन्य जीवन (संरक्षण) अधिनियम के उल्लंघन के लिए इन कथित ‘प्रभावशाली/बचावकर्ताओं’ की जाँच और उन्हें दंडित करने की माँग की है। सोशल मीडिया पर ऐसे कई कथित ‘बचावकर्ता’ मौजूद हैं। लेकिन वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों को चिंता है कि इन यूट्यूबरों द्वारा बनाए गए वीडियो सर्प रक्षा के बजाय उनके शिकार के समान हैं और वन्य जीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 का उल्लंघन करते हैं।विशेषज्ञों का दावा है कि ऐसे वीडियो अक्सर व्यूज बटोरने, पहुँच बढ़ाने और कमाई करने के लिए बनाए या नाटकीय रूप से प्रस्तुत किए जाते हैं ताकि अधिक से अधिक व्यूअरशिप मिले और कमाई हो। सोशल मीडिया पर साँपों का इस्तेमाल वास्तव में सर्प रक्षा के लिए नहीं बल्कि आर्थिक लाभ के मकसद से है।
मार्केटिंग एजेंसी आईपीएलआईएक्स मीडिया के वरिष्ठ टैलेंट मैनेजर अमन कृष्णा के अनुसार दस लाख व्यूज़ वाला यूट्यूब वीडियो आसानी से 50,000 रुपये से 2 लाख रुपये तक कमा सकता है। एक वीडियो कम से कम विज्ञापनों के साथ भी कम से कम 25,000-50,000 रुपये कमा लेता है। उन्होंने यह भी कहा कि 2 करोड़ या 7.5 करोड़ व्यूज़ वाले वीडियो के लिए, यूट्यूब एल्गोरिथम ज़्यादा विज्ञापन भी दिखा सकता है, जिससे ज़्यादा कमाई हो सकती है।
लुईस ने कहा कि ये कथित बचावकर्ता साँपों को गलत तरीके से संभालते हैं जिन्हें अक्सर वन्य जीव अधिनियम के तहत संरक्षित किया जाता है और जो ‘शेड्यूल एक’ की प्रजाति के रूप में वर्गीकृत हैं, यानि जिन्हें बाघ के बराबर सुरक्षा मिली हुई है। जबकि यूट्यूबर बचावकर्ताओं को नंगे हाथों से साँप को बचाते और फिर उसके साथ मजमा लगाते देखा जा सकता। ऐसे भी कोई आंकड़े नहीं हैं कि बचाए जाने के बाद इन साँपों का क्या होता है। वीडियो में संरक्षण के पहलुओं के बारे में शायद ही कोई जानकारी दी जाती है। अपने मूलावास से विस्थापन( ट्रांसलोकेशन) किसी भी सांप के लिये कितना हानिकर हो सकता है यह यूट्यूबर सामान्यतः नहीं जानते।
एक गैर-लाभकारी संस्था रिलायंस फ़ाउंडेशन के सरीसृप विज्ञानी और प्रमुख वैज्ञानिक, वरद गिरी ने कहा कि साँपों के प्रति भय और जिज्ञासा के कारण साँपों के वीडियो को भारी दर्शक मिल ही जाते हैं। इसके अलावा, साँप को बचाने या उसे संभालने वाले किसी भी व्यक्ति को बहादुर और साहसी माना जाता है। मगर सर्प संरक्षण के लिहाज से इन वीडियो में कुछ नहीं होता।
उचित तो यह है कि जानवर को छुए बिना बचाव किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि कई वीडियो सांपों के प्रति क्रूरता के प्रकृति के होते हैं और उनके साथ दुर्व्यवहार दिखाते हैं। केरल, महाराष्ट्र, ओडिशा और तमिलनाडु जैसे कई राज्यों ने साँपों को बचाने के लिए नियम बनाए हैं। जिसमें साँपों को पकड़ना और उन्हें धनार्जन के मकसद से इस्तेमाल करना गलत इरादा दर्शाता है और यह वन्य जीव अधिनियम का उल्लंघन और प्रजाति के साथ दुर्व्यवहार है।
अजगर यानि इंडियन रॉक पाइथन (पाइथन मोलुरस) और किंग कोबरा (ओफियोफैगस हन्ना) अनुसूची एक के तहत संरक्षित हैं और वन विभाग के अधिकारियों की अनुमति के बिना इन प्रजातियों को पकड़ना, हैंडिल करना एक दंडनीय अपराध है, जिसके लिए सात साल तक की जेल हो सकती है।
यही नहीं, किसी भी जंगली या बंदी जानवर को पकड़ने, दौड़ाने, जाल में फँसाने, या चारा डालने का प्रयास भी मानदंडों के अनुसार वन्यजीव अधिनियम का उल्लंघन माना जाता है। इसलिए विशेषज्ञों ने जानवरों पर अत्याचार और कानून के उल्लंघन के लिए इन तथाकथित बचावकर्ताओं’ की जाँच और उन्हें कानूनी प्रावधानों के अधीन दंडित करने का आह्वान किया है।


