विजय सिंह ठकुराय-
मृत्यु पश्चात क्या होता है, यह प्रश्न आपको अक्सर परेशान करता होगा। आइए, इस प्रश्न को टटोलने से पहले बात करते हैं डॉल्फिन्स की।
डॉल्फिन ताउम्र समुद्र में बिताने के बावजूद बायोलॉजिकली उन स्तनधारी जीवों की वंशज हैं, जो समय के किसी बीते पन्ने पर “जल से थल” की ओर हो रहे जैविक ट्रांजीशन में किसी अज्ञात कारण के कारण जल में ही रहे और अपने वातावरण के अभ्यस्त होते गए।
सभी मैमल्स के समान, डॉल्फिन जल में सांस लेने में समर्थ नहीं होती, और उसे अपने फेफड़ों की क्षमता के अनुसार हर 8-10 मिनट में एक बार जल की सतह पर आ कर, बाहर मुंह निकाल कर, वायुमंडल से श्वास लेना अनिवार्य होता है।
अब हो सकता है कि आप पूछें कि अगर ऐसा है तो डॉल्फिन सोती कब है? खासकर, जब संतान को जन्म देने के बाद नवजात की गंध सूंघ रहे शिकारियों से बचने और बच्चों को सर्वाइवल का प्रक्षिक्षण देने हेतु निरंतर हजारों किमी की यात्रा करनी पड़ती हो?
उत्तर -डॉल्फिन कभी नहीं सोती (Kind of)
हर कशेरुकी अर्थात Vertebrate जीव की तरह डॉल्फिन्स के भी दिमाग के दो हिस्से होते हैं – लेफ्ट एंड राइट!! जब भी डॉल्फिन सोती है तो दिमाग का एक हिस्सा आंशिक विराम करता है और दूसरा अलर्ट मोड में रहता है और लाइफ सपोर्ट एक्शन्स को नियंत्रित करता है। इस तरह डॉल्फिन बारी-बारी से दोनों हिस्सों को आंशिक आराम देते हुए सोती भी है और सांस भी लेती है। डॉल्फिन से लेकर हजारों किमी का सफर तय करने वाले पक्षी भी इसी सिद्धान्त के अनुसार सोते हैं।
सच तो यह है कि जीवजगत के किसी भी प्राणी का मस्तिष्क कभी भी पूरी तरह नहीं सोता, बस मस्तिष्क के हिस्से बारी-बारी से अपनी एक्टिविटी को कम कर के निद्रा लेते हैं। मनुष्यों का दिमाग भी इसी पैटर्न पर सोता है और अंजान परिस्थितियों में तो दिमाग के हिस्से किसी अंजान खतरे की आशंका में अक्सर हाइपर-अलर्ट भी हो जाते हैं। यही कारण है कि अक्सर “नयी जगह” जाने पर, जैसे कोई होटल रूम या नया घर, आप पहली रात अथवा कुछ रातें नींद लेने में कठिनाई का अनुभव करते हैं।
इसमें आपका कोई दोष नहीं – इसके पीछे लाखों सालों तक खूंखार शिकारी जीवों के खतरों के मध्य रह के विकसित हुआ आपका मस्तिष्क है, जो नहीं जानता कि आज के समय मे आपके होटल रूम में आ कर कोई शेर आपको दबोच नहीं लेगा। बस सुरक्षा के दृष्टिकोण से दिमाग आपको अंजान माहौल में जबरिया अलर्ट करता रहता है। It believes in – Better safe than sorry.
वास्तव में सृष्टि के किसी भी जीव के दिमाग में “स्विच ऑफ” नामक कोई बटन ही नहीं है। मस्तिष्क को कभी भी यह पता ही नहीं होता कि – स्वयं मस्तिष्क सो रहा है। सोते समय भी “स्वबोध” को जन्म देने वाली दिमाग की ऊपरी परत – नियो-कॉर्टेक्स – के शिथिल होने से भले ही आप “स्वबोध” को अल्पकाल के लिये खो दें पर आपके दिमाग के अन्य हिस्से निरंतर इलेक्ट्रिकल एक्टिविटी प्रोड्यूस करते रहते हैं। बैकग्राउंड में चल रही इस डेटा प्रोसेसिंग में एक बड़ा हिस्सा आपकी स्मृतियों का होता है, जो अचेतावस्था में स्वप्न जैसी चीजों का अनुभव कराता है।
रोचक बात यह भी है कि मृत्युपर्यान्त भी यह प्रोसेसिंग एक झटके से बंद नहीं हो जाती और कई मिनटों, घण्टों अथवा दिनों तक भी दिमाग में इलेक्ट्रॉनिक इंपल्स देखी जा सकती हैं। मृत्यु कोई पड़ाव न होकर एक यात्रा है, जिसमें आपका अस्तित्व आपकी मस्तिष्क की शनै-शनै समाप्त होती कोशिकाओं के साथ थोड़ा-थोड़ा कर के समाप्त होता है।
और अस्तित्व से मुक्ति की इस यात्रा में भले ही आपकी धड़कने बंद हो चुकी हों और आप प्राथमिक तौर पर दुनिया के लिए मर चुके हों, पर मस्तिष्क पूरी तरह खत्म होने से पहले आपको स्वप्नवस्था में मायाजाल दिखाता रहता है। जो मायाजाल आपकी स्मृतियों के अनुसार विभिन्न घटनाओं और प्रियजनों से जुड़े हुए हो सकते हैं अथवा धार्मिक मान्यताओं से अथवा पूरी तरह रैंडम भी।
तो बेसिकली मैं कहना यह चाहता हूँ कि… मृत्यु में प्रवेश के पूर्व, अनंत अंधकार में विलीन होने से पहले, आप अपना अंतिम स्वप्न देखते हैं।


