पंकज शर्मा-
एक बात गांठ बांध लीजिए। धनखड़-प्रसंग अंगड़ाई है। जो सोच रहे हैं कि वे जगदीप धनखड़ को आसानी से हाशिए पर धकेल देंगे और उन का सतपालमलिकीकरण करने में क़ामयाब हो जाएंगे, वे जल्दी ही गच्चा खाने वाले हैं।
मैं उन्हें चार दशक से निजी और पारिवारिक तौर पर ठीक-ठाक गहराई से जानता हूं। देवीलाल-चंद्रशेखर को छोड़ कर राजीव गांधी के साथ आने के लिए रची गई उन की महीन बुनावट को मैं ने तब अपनी थोड़ी हिस्सेदारी की वज़ह से बहुत नज़दीक से देखा है।
इतना ही कह सकता हूं कि धनखड़ ने भले ही पिछले कुछ वर्षों में मौजूदा हुक़्मरानों के प्रति अपनी चापलूस-देहभाषा, तिकड़मी कुतर्कों और बेहयाई भरे नकारात्मक सक्रियतावाद की निम्नतम मिसालें पेश कीं, मगर मूलतः वे खुद्दार हैं, भयरहित हैं, मनमौजी हैं और ज़ोख़िमबाज़ हैं।
इसलिए उन्हें अभी से सिरे से ख़ारिज़ मत करिए। आने वाले दिनों में वे अंतिम कील भी साबित हो सकते हैं।
इस पोस्ट पर आए कुछ कमेंट भी पढ़िए….
राजेंद्र कुमार सैनी-
स्वभाव से तो ऐसे लगते हैं लेकिन उनके दुश्मन भी बड़े ढिठ है यह तो आने वाला समय ही बताएगा कौन किस पर भारी पड़ता है कौन अपनी झुकी हुई कमर के साथ बिस्तर को पकड़ लेता है या अपनी झुकी हुई कमर को सीधा करके अपने जाट समुदाय के स्वाभिमान को ऊपर रखते हुए अपनी सार्थकता सिद्ध करता है।
बृजेश मिश्रा-
हिम्मत तो होगी ही, लेकिन अच्छे वकील की एक विशेषता होती है जो Complaint से लेकर चार्ज शीट तक अच्छे से पढ़ने के बाद ही डिस्चार्ज का आवेदन और बहस करना! अपमान को बर्दास्त करने वाले ये व्यक्ति लगते तो नहीं हैं प्रथम दृष्टया! वैसे उनके खून में अपमान को पचाना इतना आसान भी नहीं लगता!
ज्ञानी “देर” से आते हैं लेकिन “दुरुस्त” आते हैं!
प्रो. अंशुमाली-
तानाशाही के खिलाफ सुगबुगाहट शुरू हुई है। जिसका अंकुरण धनखड़ जी का इस्तीफा है। बीज गडकरी जी ने डाली और उसे पानी डाला भागवत जी ने 75 वर्ष वाली बात लाकर, समझे सर।
मोदीजी की झूठी आभा से पर्दा उठने लगा है। पहले वाली स्वच्छ छवि पर स्याह चिह्न गहरा अंकित होने लगा है।
प्रकाश के रे-
उपराष्ट्रपति सागा… जब 2008 में सीपीएम ने यूपीए सरकार से अपना समर्थन वापस लिया, तो पार्टी ने लोकसभा के स्पीकर सोमनाथ चटर्जी को इस्तीफ़ा देने को कहा. लेकिन चटर्जी ने इस्तीफ़ा नहीं दिया और कांग्रेस, भाजपा और अमर सिंह के प्रिय हो गए. उन्हें उम्मीद थी कि कांग्रेस उन्हें उपराष्ट्रपति बना देगी.
वर्षों बाद जब नीतीश कुमार फिर राजद के साथ गए, तो ललन सिंह ने राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश से इस्तीफ़ा देने को कहा. लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया और भाजपा के और क़रीबी हो गए. उनका नाम उपराष्ट्रपति पद के लिए भी चलने लगा है. उनकी पार्टी भी फिर से भाजपा के साथ है.
धनखड़ उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफ़ा नहीं देने पर अड़ सकते थे और विपक्ष के प्रिय बन सकते थे. महाभियोग प्रस्ताव आता, तो और भी लोकप्रिय हो सकते थे.


