प्रियदर्शन-
पल्लव खामोशी से काम करने वाले संपादक हैं- सजग, सतर्क और सुघड़। उनके काम में उनकी मेहनत और लगन दिखती है। जब हर कुछ महीनों के अंतराल पर उनकी पत्रिकाओं का बंडल आता है तो मैं हैरान रह जाता हूं। ‘बनास जन’ बस एक पत्रिका नहीं, पत्रिकाओं का समूह है। बीते हफ़्ते चार पत्रिकाएं एक साथ आईं- एक सामान्य अंक, एक अमरकांत पर विशेषांक, एक शैलेश मटियानी पर केंद्रित संक्षिप्त अंक और एक बीते कुछ लघु उपन्यासों की चर्चा पर केंद्रित अंक।
जिसे सामान्य अंक बता रहा हूं, वह भी विशिष्ट है। कविता, कहानी, आलोचना, स्मरण- सब कुछ एक जगह सुघड़ता के साथ सुलभ है। सिद्धनाथ सागर की बहुत लंबी कहानी ‘उस्ताद की शहनाई’- जिसे उसकी लंबाई और उसके कथ्य की वजह से निस्संकोच उपन्यासिका कहा जा सकता है-

हमारे समय में छोटे शहरों और मोहल्लों के निम्न मध्यवर्गीय घरों के भीतर बन रही विडंबनाओं के संसार का आईना है। इस कहानी में दांपत्य संबंध हैं, नई राजनीतिक अपसंस्कृति है, छोटे शहरों और क़स्बों में दिखने वाला दिल्ली-प्रशिक्षित मीडिया का तमाशा है और साधारण लोगों का जटिल मनोविज्ञान है। अगर कहानी अपने शिल्प में कुछ बिखरी न होती तो बहुत पठनीय और दिलचस्प कहानी बनती। फिर अपने मास्टर स्ट्रोक्स के लिए अलग से पहचानी जाने वाली वरिष्ठ लेखिका ममता कालिया की भी एक मज़ेदार कहानी है- लेखकों की बेचारगी और उनके साथ होने वाले छल की।
अंक में कुमार अंबुज, हरिओम राजोरिया, अविनाश मिश्र और तनुज कुमार की कविताएं भी बहुत पठनीय हैं। साथ में ढेर सारे संस्मरण और आलोचनात्मक टिप्पणियां भी अंक को समृद्ध बनाते हैं।
अमरकांत की जन्मशती पर अमरकांत-केंद्रित ‘बनास जन’ भी बिल्कुल संग्रहणीय है। अमरकांत हिंदी के प्रथम पांक्तेय लेखकों में रहे जिनकी जन्मशती पर कई विशेषांकों के आगमन की सूचना है। पल्लव संपादित ‘बनास जन’ में अमरकांत जी की स्मृतियों, कृतियों, चिट्ठियों, रचनाओं का संचयन तो है ही, उन पर विस्तार से चर्चा भी है। क़रीब चालीस समकालीन और उत्तरकालीन लेखकों ने बहुत आत्मीयता से उनको याद किया है, उनका मूल्यांकन किया है।
दो संक्षिप्त ‘बनास जन’ भी समृद्ध हैं। शैलेश मटियानी को अब पत्रिकाएं कम याद करती हैं। उन पर केंद्रित एक अंक का होना सुखद है। इसी तरह अठारह समकालीन कृतियों पर अलग से एक अंक तैयार किया है।
इन सभी पत्रिकाओं से गुज़रते हुए यह ख़याल आता है कि पल्लव समकालीन लेखन के प्रति जितने सजग हैं, परंपरा के प्रति भी उतने ही संवेदनशील हैं। कई लेखकों पर उनकी पत्रिका के विशेषांक बिल्कुल संग्रहणीय रहे हैं। पत्रिकाओं से अलग भी वे जिस प्रकार स्वयं प्रकाश, अजित कुमार या नंद चतुर्वेदी पर काम करते रहे हैं, उस पर अलग से चर्चा होनी चाहिए। उनकी प्रगतिशील दृष्टि में भी अब तक कोई फांक नहीं दिखी है।
पल्लव राजस्थान से आते हैं और वहां के लेखकों का अच्छा प्रतिनिधित्व अंकों में दिखाई पड़ता है। अमूमन यूपी-बिहार और मध्य प्रदेश के लेखकों का हिंदी लेखन की दुनिया में वर्चस्व दिखता है। लेकिन ‘बनास जन’ के लेखकों की सूची में कई अलग नाम दिखते हैं और उनका काम भी बहुत सधा हुआ नज़र आता है। यह भी एक अच्छी बात है।


