भास्कर गुहा नियोगी-
तुम जिस अन्न को खाते हो,
उसे किसी ने उगाया है।
तुम जो कपड़े पहनते हो,
उसे किसी ने बुना है।
तुम जिस घर में रहते हो,
उसे किसी ने बनाया है।
इसलिए हर जगह, हर पल, अपने हर एक काम में
उस ऋण को चुकाने की कोशिश करो—
लोगों से पागलों की तरह प्यार करो।
— अज़ीज़ुल हक़
जी बांग्ला टेलीविज़न के एक इंटरव्यू में जब उनसे पूछा गया कि वह युवाओं से क्या कहना चाहेंगे, तो कॉमरेड अज़ीज़ुल हक़ ने यह स्वरचित कविता सुनाई।

उन्होंने कहा था— “आप आज जिस मुकाम पर हैं, वहाँ पहुँचने में जितना योगदान आपके माता-पिता का है, उतना ही उन लोगों और चेहरों का भी है जो आपकी नज़रों से ओझल रहकर आपके लिए सृजन करते हैं।”
उनका मानना था कि तमाम कमियों के बावजूद, इंसान ही इंसान को बुरे समय से निकालकर अच्छे समय की ओर ले जाता है।
जेल में मिली यातनाओं को वे सामान्य मानते थे।
वे कहते थे—
“इससे भी ज़्यादा अत्याचार तो एक आम आदमी हर दिन सहता है।”
ज़रा सोचिए, एक व्यक्ति को अपनी राजनीतिक वैचारिक प्रतिबद्धता के चलते ज़िंदगी के 18 साल जेल में बिताने पड़े।
वह लंबे समय तक भूमिगत भी रहा।
राज्य ने उसकी जवानी छीन ली।
उसे उन लोगों के प्रति गहरा गुस्सा होना चाहिए था जिन्होंने उसे जेल में सड़ा दिया।
उसे सोचना चाहिए था— “मैं एक बार बाहर निकलूं, फिर देखता हूं…”
लेकिन वह व्यक्ति जब जेल से बाहर आया, तो उसने कहा—
“लोगों से प्यार करना ज़रूरी है।
लोगों में शक होते हैं, झगड़े होते हैं, स्वार्थ होते हैं।
फिर भी, उनसे पागलों की तरह प्यार करना ज़रूरी है।
इन्हीं लोगों के बीच से कोई न कोई
तुम्हें बुरे वक़्त से उठाकर अच्छे वक़्त की दहलीज़ तक पहुँचा देता है।”
उस व्यक्ति को जेल में
मानसिक और शारीरिक यातनाएँ दी गईं—
उसके हाथ-पाँव काट दिए गए,
वह लकवे का शिकार हुआ,
उसे बिजली के झटके दिए गए,
सिर पर वार हुआ जिससे उसके न्यूरॉन डैमेज हो गए।
फिर भी वह लिखता है—
“मेरे पूरे शरीर पर ज़ख्म हैं!
लेकिन मेरे दिल का प्यार अब भी बरकरार है!
ज़ख्मों के बदले प्यार—क्या यह कोई छोटा इनाम है?
मेरा दिल अभी भी ताज़ा है और प्यार कर सकता है।
अगर ज़ख्म न होते, तो नफ़रत न होती।
अगर नफ़रत न होती, तो प्यार भी न होता!”
कॉमरेड अज़ीज़ुल हक़ अब नहीं रहे।
महाश्वेता देवी ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “हज़ार चौरासी की माँ” में लिखा है—
“प्यार और क्रांति का कभी हिसाब-किताब नहीं किया जाना चाहिए।”
कॉमरेड अज़ीज़ुल हक़ ने जीवन भर इसी दर्शन का झंडा थामा।
वो प्रेम के पोस्टर बॉय की तरह जीते रहे।
इतना अत्याचार, इतना अँधेरा झेलने के बाद भी—न कोई अफ़सोस, न कोई पछतावा, न कोई दबा हुआ गुस्सा।
उनका संपूर्ण जीवन बस एक प्रेम-सार बनकर रह गया।
इसीलिए अपने अंतिम दिनों में भी, वे अपनी बेटी से कहते रहे—
“तुम तो बस ज़िंदगी में मज़ा ले रही हो… हम तो ज़िंदगी का मज़ा लेते थे!”
60 और 70 के दशक में नक्सलबाड़ी आंदोलन में सक्रिय भागीदारी और उसके चलते जेल की अमानवीय यातनाओं के बावजूद वे कभी नहीं टूटे।
उनके लिए गोली मारने का आदेश था।
17 वर्ष की उम्र में अविभाजित कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़कर उन्होंने अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू की, जो बाद में नक्सलबाड़ी आंदोलन से जुड़ गई।
1942 में हावड़ा में जन्मे अज़ीज़ुल हक़ का 21 जुलाई को कोलकाता के एक अस्पताल में निधन हो गया।
चारू मजूमदार को वे अपना वैचारिक गुरु मानते थे और नक्सलबाड़ी आंदोलन के प्रमुख नेताओं में गिने जाते थे।
कविता लिखने वाले अज़ीज़ुल हक़ एक गहरे राजनैतिक विचारक और लेखक भी थे।
उनकी किताब “कारागार में 18 साल” नक्सल आंदोलन का एक जीवंत दस्तावेज़ है।
इसके अतिरिक्त उन्होंने “लाशें बात करती हैं”, “जिन रास्तों पर वो चले हैं” जैसी महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखीं।
अख़बारों में वे नियमित रूप से स्तंभ लेखन भी करते थे।
यह उनकी जिजीविषा ही थी कि 1989 में जेल से रिहा होने के बाद भी वे लगातार जनाधिकारों के लिए संघर्षरत रहे।
वे एक अनथक पथिक थे—जो निरंतर चलता रहा।
उनके निधन पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने X हैंडल पर शोक व्यक्त करते हुए लिखा—
“वे एक जुझारू और दृढ़निश्चयी नेता थे। अपने लंबे राजनीतिक जीवन में उन्होंने कभी भी अपना सिर नहीं झुकाया।”
85 वर्ष की उम्र में भी वे मानते थे कि परिवर्तन संभव है।
उनकी आँखों में बदलाव का सपना था और अंतिम आदमी पर विश्वास।
इसलिए वे लगातार कहते रहे—
“बुरे दिन से अच्छे दिन तक आदमी ही आदमी को लेकर जाएगा।”


