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आज के अखबार : जंगल में शिकारी ने तहलका मचा रखा है, कह रहे हैं, बीमार हिरणों को उठा ले गया

Front page of The Telegraph newspaper with main headlines about Tripura politics and a large hourglass image on the left. Inset photos accompany the stories below the masthead.

संजय कुमार सिंह

सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने तृणमूल कांग्रेस पार्टी को बंगाल चुनाव में हराने के बाद अंततः उसे तोड़ भी दिया। इस तरह क्षेत्रीय दलों को नष्ट करने वाली पार्टी के रूप में भाजपा ने अपनी स्थिति और मजबूत की है लेकिन अखबारों के शीर्षक तृणमूल के बागियों का सम्मान कर रहे हैं। इंडियन एक्सप्रेस की खबर का शीर्षक है, टीएमसी के बागी सांसदों ने बिड़ला से मुलाकात की, कहा एक क्षेत्रीय पार्टी में विलय कर लिया है। यह बहुत सामान्य सा शीर्षक है जबकि ऐसा दल बदल कानून से बचने के लिए किया गया है। टीएमसी से अलग हुए सांसद एक अनजानी सी पार्टी के सदस्य कहलाएंगे क्योंकि एक पूरी पर अनजानी पार्टी ने इन सांसदों में अपना विलय कर लिया है। यह कितना नियमानुसार है इस पर फैसला होना है लेकिन अंपायर के परिवार को फायदा होना हो तो नतीजा क्या होगा उसकी कल्पना की जा सकती है। देशबन्धु अखबार में इस खबर का शीर्षक है, अंततः टूट गई टीएमसी। उपशीर्षक है, ओम बिड़ला को चिट्ठी देने से पहले (भाजपा नेता और केंद्रीय मंत्री) भूपेंद्र यादव के घर पर हुई बैठक।  राजनीतिक क्षेत्र में यह खबर इतनी गंभीर है कि महाराष्ट्र में शिवसेना (यूबीटी) के प्रमुख,  उद्धव ठाकरे ने अपने नौ सांसदों के साथ बैठक कर उनका मन टटोला। देशबन्धु की खबर के अनुसार यहां भी ऑपरेशन टाइगर की अटकलें काफी तेज हैं। आप जानते हैं कि शिवसेना को एक बार तोड़ा जा चुका है। इसलिए उद्धव ठाकरे सतर्क हैं तो आतंक समझा जा सकता है लेकिन खबर ऐसी है जैसे जो हुआ वह सामान्य उपलब्धि है। चुनाव जीत कर भाजपा या बिना सांसदों वाली नेशनलिस्ट सिटीजन पार्टी ने एक साथ कई सांसद पा लिए हैं।

हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर लीड है। शीर्षक है, टीएमसी के 20 सांसद त्रिपुरा की अनजानी पार्टी से जुड़े। टाइम्स ऑफ इंडिया में यह खबर सेकेंड लीड है। यहां भी अनजानी सी क्षेत्रीय पार्टी के साथ टीएमसी सांसदों के विलय की सूचना है। द हिन्दू में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है। अंदर होने की सूचना है। इसका शीर्षक है, एनसीपीआई में विलय के लिए 20 सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात की। दि एशियन एज में यह खबर पहले पन्ने पर तीन कॉलम में है। शीर्षक है, टीएमसी के बागियों के समूह का एनसीपीआई में विलय; दो तिहाई समर्थन का दावा। नवोदय टाइम्स में भी यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है जबकि कोलकाता के अखबार में आज तीन बड़ी खबरें हैं औऱ तीनों टीएमसी पर हैं।  जो खबर है उसे कायदे से द टेलीग्राफ ने की लिखा है। खबर इस प्रकार है, अभिषेक ने कहा है, दल-बदल विरोधी कानून से बचने के लिए 20 सांसद एक अनजान पार्टी में विलय की योजना बना रहे हैं। मुख्य शीर्षक है, टीएमसी के बागियों का एंकर त्रिपुरा का। एक और खबर, टीएमसी के फिल्मी सितारों पर है। इस खबर के अनुसार ये स्टार सांसद बदल गए (गईं)। इसकी कहानी बताती है कि कैसे ममता बनर्जी ने फ़िल्मी दुनिया के चक्कर में नुकसान उठाया और कोई सीख नहीं ली। तीसरी खबर तृणमूल के रेत-सीमेंट माफिया और गुंड़ों के बारे में है, कितने बुरे थे कि सिंडिकेट खामोश हो गया…। मुख्य खबर इस प्रकार है, लोकसभा में तृणमूल के बागी गुट ने एक अनजान राजनीतिक पार्टी के साथ “विलय” की मांग की है, ताकि वे दल-बदल विरोधी कानून की कार्रवाई से बच सकें; यह कानून पार्टी से अलग हुए या टूटे हुए गुटों को मान्यता नहीं देता है।

सत्तारूढ़ पार्टी के इस भयंकर शिकार की खबर के साथ आज उसका प्रचार भी जारी है। आप जानते हैं कि प्रधानमंत्री विदेश यात्रा पर हैं। दि एशियन एज की लीड का शीर्षक है, भारत फ्रांस में व्यापार को दूना कर 32 बिलियन डॉलर के व्यापार पर सहमति, 13 ‘नतीजे’। कहने की जरूरत नहीं है कि व्यापार दूना करना तो अच्छी बात है लेकिन हम व्यापार करेंगे किस चीज का और कहां से लाएंगे उत्पाद जिसका व्यापार करेंगे। क्या हमारे पास उत्पादन दूना करने की क्षमता है या हम उत्पादन करते हैं जिसका बाजार नहीं है। इस खबर के साथ प्रधानमंत्री का एक कोट हाइलाइट किया हुआ है जो इस प्रकार है, नवाचार भारत के डीएनए में है…. गुजरे 11-12 वर्षों में भारत ने नवाचार के लिए एक मजबूत इको सिस्टम बनाया है…. इस पूरी यात्रा ने मिशन मोड में प्रगति की है। आज भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम है। प्रधानमंत्री ने कहा है तो होगा लेकिन दिखता क्यों नहीं है और जाकर बताना क्यों पड़ रहा है। क्या आपने सुना कि किसी ने कुछ नया बनाया है, निर्यात करना चाहता है पर किन्हीं कारणों से नहीं कर पा रहा है और सरकार से मांग की हो कि इन कारणों को दूर किया जाए? कहने की जरूरत नहीं है कि देश में कुछ नया होता, उसके निर्यात की संभावना होती तो कोशिश भी हो रही होती और उसके निशान व अवशेष भी रहते। पर ऐसा कुछ है नहीं। सबसे पहले तो कौशल की आवश्यकता होती, लोगों को रोजगार मिलते पर वह सब हुआ नहीं है। इसके बिना क्या बन रहा होगा और क्या निर्यात होगा समझना मुश्किल है। अखबार सरकार का प्रचार तो करते हैं संबंधित सवालों का जवाब नहीं देते हैं।

आप जानते हैं कि नरेन्द्र मोदी अपने साथ पत्रकारों को विदेश नहीं ले जाते हैं। अगर ले गए होते तो जहां घोषणा हुई वहीं सवाल उठते, जवाब से सारी जानकारी मिल जाती। पर प्रधानमंत्री पत्रकारों को विदेश क्यों नहीं ले जाते हैं और जो ऐसी प्रचार वाली खबरें छापते हैं वे पहले या बाद में उससे संबंधित दूसरी जानकारी क्यों नहीं देते हैं – समझना मुश्किल (नहीं) है। वैसे भी, मोदी सरकार मन की बात ही करती है, आरटीआई कानून तक का बुरा हाल है। फिर भी आज यह खबर नवोदय टाइम्स, द हिन्दू, टाइम्स ऑफ इंडिया और इंडियन एक्सप्रेस में लीड है। देशबन्धु और हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर पहले पन्ने पर है। मुझे नहीं लगता है कि किसी भी अखबार ने यह बताया है कि व्यापार दूना करने के लिए भारत क्या मंगाएगा और क्या भेजेगा। संभव है, आज यह अपेक्षा करना जल्दी हो पर पहले भी घोषणाएं ऐसे ही होती रही हैं और उनका फॉलोअप नहीं है। अमेरिका के साथ व्यापार करार को लेकर ही कई सवाल और आरोप हैं। अभी तो उनका भी जवाब नहीं है। जवाब को छोड़ भी दिया जाए तो सवाल है कि निर्यात कर दिया जा सकता है लेकिन आयात क्या होगा? किस चीज की कमी या मांग है। किसने की, उसका क्या हिसाब है और आत्म निर्भर होने, स्वदेशी होने के दावों-सलाहों का क्या हुआ। जहां तक सरकार की योजनाओं का सवाल है, कौशल विकास की जरूरत सब समझते हैं। उसकी योजना भी थी, मंत्रालय भी है। काम भी हुआ है, खर्च भी हुआ है लेकिन सीएजी की रिपोर्ट कुछ और कहती है। अगर वह गलत है तो कहा नहीं गया है और कौशल पाने वाले लोग कहां हैं? इनमें कितनों को नौकरी मिली, कितनों ने स्वरोजगार किए और इनमें क्या नवाचार है, देश को तो बताया ही जाना चाहिए।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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