संजय सिन्हा-
मन का चौकीदार सोने नहीं देगा
मैंने उस झूठ को बहुत करीब से देखा था। तब मेरा बेटा कोई तीन साल का रहा होगा।
हम दिल्ली के एक फ्लैट में रहते थे। दूसरे माले पर हमारा घर था। पहले माले पर एक और परिवार रहता था। उनका बेटा भी लगभग मेरे बेटे की ही उम्र का था। छुट्टियां होतीं तो दोनों साथ खेलते। कभी वो हमारे घर चला आता, कभी मेरा बेटा उसके घर पहुंच जाता।
एक दिन मेरे बेटे का एक खिलौना गायब हो गया। उसने घर भर में ढूंढा। नहीं मिला। बच्चे जल्दी दुखी भी होते हैं और जल्दी भूल भी जाते हैं। उसने भी कुछ देर रोना-धोना किया और फिर दूसरे खिलौनों में लग गया।
कुछ दिन बाद उसने अचानक मुझे आकर कहा, “पापा, मेरा खिलौना मिल गया।”
मैंने पूछा, “कहां?” उसने कहा, “वो नीचे वाले बच्चे के पास है। वो ले गया था। ”
मैंने कहा कि हो सकता है उसके पास भी वैसा खिलौना हो। बेटे ने कहा कि वो अपने खिलौने को पहचानता है। उस खिलौने की एक टांग टूटी हुई थी। वही निशान था।
मैंने बेटे को बार-बार समझाया, “हो सकता है ऐसा दूसरा खिलौना भी हो। तुम्हारा खिलौना कहीं और खो गया हो।”
उसने कहा, “नहीं पापा, वह मेरा वाला ही है।”
कुछ दिन बाद वो बच्चा हमारे घर आया। खिलौना उसके हाथ में था। मैंने मुस्कुराकर पूछा, “अरे, ये खिलौना तुम्हारे पास भी है?”
तीन साल का बच्चा एक पल को घबराया। फिर तुरंत बोला, “हां, मेरे मामा लाए हैं।”
मैं अवाक रह गया। तीन साल का बच्चा। न कोई तैयारी। न कोई सोच-विचार। न कोई सलाहकार। और झूठ ऐसा कि तुरंत बचाव भी हो जाए?
बाद में मैंने उसके मामा से यूं ही पूछा। उन्होंने कहा, “अरे नहीं, मैं तो कोई खिलौना लेकर ही नहीं गया।”
मामला वहीं खत्म हो गया। एक छोटे से खिलौने की क्या कीमत थी?
हम बड़े लोग भूल गए। लेकिन मेरा बेटा नहीं भूला। आज भी नहीं भूला।
उसके मन में वह बात कहीं दर्ज हो गई कि उसका खिलौना चुराया गया था और फिर उस पर झूठ बोला गया था। दोनों आज भी मिलते हैं, पर दोनों के मन में ये बात है। एक ने चोरी की थी, दूसरे की चोरी हुई थी।
मैं अक्सर सोचता था। आखिर तीन साल का बच्चा झूठ बोलना कैसे जानता था? उसे किसने सिखाया था?
सालों बाद विज्ञान की किताबों में मुझे उसका उत्तर मिला।
हमारे मस्तिष्क में एक चौकीदार बैठा होता है। वैज्ञानिक उसे रेटिक्युलर एक्टिवेटिंग सिस्टम कहते हैं।
वही चौकीदार हमें बताता है कि क्या सही है और क्या गलत। इसीलिए चोर चोरी करके भी छिपता है। इसीलिए झूठ बोलने वाला सफाई देता है। इसीलिए बेईमान आदमी भी चाहता है कि दुनिया उसे ईमानदार समझे।
अगर भीतर कोई अदालत न होती तो किसी को सफाई देने की जरूरत ही नहीं पड़ती। यही कारण है कि दुनिया का सबसे बड़ा झूठ भी अक्सर एक छोटे से बहाने के पीछे छिपा होता है।
और यहीं से मुझे आज की राजनीति याद आती है। पिछले दिनों मध्य प्रदेश में राज्यसभा की एक सीट को लेकर जो विवाद हुआ, उसने मुझे उसी तीन साल के बच्चे की याद दिला दी।
संजय सिन्हा मीनाक्षी नटराजन को नहीं जानते। उनके पक्ष में नहीं लिख रहे। बात सिर्फ एक सिद्धांत की है।
मैं नरेंद्र मोदी को लंबे समय से जानता हूं। पत्रकारिता के दिनों से। इसलिए अक्सर सोचता हूं कि जब वो रात में सोने जाते होंगे तो क्या उनके मन में कभी यह सवाल नहीं आता होगा कि इतनी बेईमानी क्यों हुई?
राजनीति में हर लड़ाई सीट की नहीं होती। कुछ लड़ाइयां विश्वास की होती हैं। और विश्वास की लड़ाई हार जाए तो सीटों की जीत भी छोटी पड़ जाती है।
आज बीजेपी की स्थिति ऐसी नहीं थी कि उस एक सीट से उसका भविष्य तय होता। लेकिन उस पूरे घटनाक्रम ने लोगों के मन में एक सवाल जरूर पैदा कर दिया।
और ऐसे सवाल राजनीति में खतरनाक होते हैं।
जनता कानून की किताब नहीं पढ़ती। जनता अदालत की फाइलें नहीं पढ़ती। जनता को प्रक्रिया की बारीकियां भी नहीं मालूम होतीं। लेकिन जनता माहौल पढ़ लेती है। उसे महसूस हो जाता है कि कहीं कुछ गड़बड़ है।
यही जनता की सामूहिक चेतना है। यही उसका सामूहिक रेटिक्युलर एक्टिवेटिंग सिस्टम है। हजार घटनाएं होती हैं। लेकिन उनमें से कोई एक घटना लोगों के मन में अटक जाती है। फिर सालों तक वहीं अटकी रहती है।
मैं अगर नरेंद्र मोदी का सलाहकार होता तो उनसे कहता कि यह सीट बचाने का नहीं, विश्वास बचाने का अवसर था। अगर ऐसा करते तो बहुत सी गलतियों को ये ढकने का मौका बन जाता।
मैं सलाह देता कि आप ये घोषणा करें कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होगी। अगर किसी अधिकारी ने गलती की है तो कार्रवाई होगी। अगर किसी ने नियम तोड़े हैं तो वह चाहे अपना हो या पराया, बचेगा नहीं। बस इतना कह देना था। विश्वास की पूरी कहानी बदल जाती। पिछला बहुत कुछ धुल जाता।
लोग कहते, देखो, देखो ये आदमी अपने आदमी पर भी उतनी ही सख्ती करता है जितना विरोधी पर।
राजनीति में सबसे बड़ी ताकत यही होती है। गलती न करना महानता नहीं है। गलती होने पर उसे स्वीकार करना महानता है (मौका था एक छोटी गलती सुधार कर महान होने का)।
अक्सर सत्ता वही गलती करती है जो उस दिन तीन साल के बच्चे ने की थी। सच स्वीकार करने की जगह कहानी गढ़ती है। और कहानी जितनी बड़ी होती जाती है, अविश्वास उतना गहरा होता जाता है।
इतिहास बताता है कि बड़ी सरकारें विपक्ष से नहीं हारतीं। वे उस दिन हारना शुरू करती हैं जिस दिन उन्हें लगने लगता है कि जनता कुछ नहीं समझती। जनता सब समझती है। थोड़ा देर से समझती है। लेकिन जब समझ जाती है तो फिर कोई विज्ञापन, कोई भाषण, कोई प्रचार उसकी राय आसानी से नहीं बदल सकता।
इसलिए संजय सिन्हा आज भी उस तीन साल के बच्चे को याद करते हैं। खिलौना बहुत छोटा था। झूठ भी बहुत छोटा था।
लेकिन तीस साल बाद भी वह घटना याद है।
क्यों?… क्योंकि इंसान खिलौने नहीं याद रखता। इंसान विश्वास याद रखता है। राजनीति में भी यही नियम लागू होता है। सीटें आती-जाती रहती हैं। सरकारें बनती-बिगड़ती रहती हैं। लेकिन जनता के मन में एक बार अगर यह सवाल बैठ जाए कि कहीं कुछ गलत हुआ है, तो वह सवाल वर्षों तक जीवित रहता है।
सत्ता चुनाव जिताती है। विश्वास इतिहास बनाता है। और इतिहास हमेशा सीटों की गिनती से नहीं, चरित्र की गिनती से लिखा जाता है।
नोट-
- मध्य प्रदेश में पूरी सरकार की चोरी (डकैती) लोग भूल गए हैं, लेकिन एक सीट की चोरी इन्हें दंश देगी। बहुत दिनों तक। रेटिक्युलर एक्टिवेटिंग सिस्टम मन का चौकीदार होता है। वो सोने तो नहीं देगा, कई दिनों तक।
- आदमी जग से भाग सकता है, मन से कैसे भागेगा?
- महाभारत में लोग लाक्षागृह कांड भूल गए थे, सुई की नोक बराबर जमीन नहीं देंगे, सबने याद रखा।
पार्ट दो – मीनाक्षी नटराजन इलेक्शन प्रकरण : वरिष्ठ पत्रकार संजय सिन्हा को आखिर इतनी तकलीफ क्यों है कांग्रेस द्वारा एक राज्यसभा सीट खो देने की?


