संजय सिन्हा-
सच इतना आसान नहीं होता जितना आपकी राय बना देती है
अंग्रेजी में कहावत है- “बेहतर होता है वो आदमी जो अपना मुंह बंद रखता है और लोगों को ये सोचने देता है कि वो बेवकूफ है, बजाए इसके कि अपना मुंह खोल कर वो ये साबित कर दे कि लोग जो सोच रहे हैं, वो सही है।”
बहुत से लोग बहुत से विषय नहीं जानते हैं। वहां चुप्पी भली होती है या फिर जानने के लिए आज के दौर में मौजूद साधनों का सहारा लेना चाहिए।
मैं ये कहना नहीं चाहता था लेकिन कहना पड़ रहा है कि कुछ लोग विषय को कितना कम जानते हैं, फिर भी सबसे तेज राय इन्हीं के पास होती है, जैसे सच कोई अंतिम रिपोर्ट हो, जो बस इन्हीं के इनबॉक्स में आई और उसे सार्वजनिक करने के लिए वो उतावले हो उठते हैं।
कभी सोचा है आपने कि जिस बात पर ये लोग सबसे ज्यादा गुस्से में लिखते हैं, क्या उन्होंने उसका पूरा सच देखा भी है या बस किसी और के फैलाए हुए टुकड़े को सच मानकर अपनी आवाज जोड़ दी है?
आज सबसे आसान काम राय बनाना है और सबसे मुश्किल काम समझना। लेकिन बहुत से लोग आसान रास्ता चुनते हैं।
कल मैंने एक साधारण-सी कहानी सुनाई थी। एक छोटा बच्चा था, उसने मेरे बेटे का खिलौना उठा लिया और पूछने पर बड़ी सहजता से झूठ बोल दिया कि यह तो उसके मामा लाए थे। बच्चा छोटा था मामला भी छोटा था। लेकिन हर छोटा मामला छोटा नहीं होता। कभी कभी वही छोटे पल चरित्र की पहली तस्वीर बना देते हैं।
लेकिन जैसा हमेशा होता है कहानी का मतलब समझने के बजाय लोग अपने मतलब की कहानी बना लेते हैं और फिर शुरू होता है कमेंट्स का तूफान। समर्थन में। विरोध में। गुस्से में। और आत्मविश्वास में।
मैं यह देखकर हैरान नहीं होता, क्योंकि जब समझ अधूरी हो तो निष्कर्ष हमेशा जल्दी निकलते हैं।
अभी राज्य सभा के नामांकन के लिए भोपाल में निर्वाचन अधिकारी के एक निर्णय पर भी यही हुआ। नामांकन अधिकारी ने विपक्ष की उम्मीदवार का पर्चा खारिज कर दिया और बीजेपी के उम्मीदवार को जीतने दिया। किसी ने कहा सही, किसी ने कहा गलत। और फिर वही राय सच बनकर घूमने लगी, जैसे कानून नहीं भीड़ फैसला कर रही हो।
कई लोगों ने कभी अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के एक वोट से गिर जाने का इसे बदला कहा।
मैंने पहले भी कहा है मैं बिना समझे नहीं लिखता। मैं 32 साल पत्रकार रहा हूं। इंडियन एक्स्प्रेस (जनसत्ता), ज़ी नेटवर्क, इंडिया टुडे (आजतक), टाइम्स ऑफ इंडिया में नौकरी की। सड़क, संसद से लेकर संपादकीय डेस्क तक देखा है मैंने और मैं जानता हूं कि शब्द सिर्फ राय नहीं होते, जिम्मेदारी होते हैं।
1999 में वाजपेयी सरकार एक वोट से गिर गई थी। 269 बनाम 270। मैंने उस समय संसद की रिपोर्टिंग की थी। तब मैं ज़ी न्यूज में था। मैंने देखा है कि एक वोट भी इतिहास बदल सकता है, लेकिन वह संसद का मामला था, जहां चुने हुए प्रतिनिधि नियमों के भीतर मतदान कर रहे थे।
वह लोकतांत्रिक प्रक्रिया थी जहां हर वोट वैध था, और आज इसे किसी निर्वाचन अधिकारी के निर्णय से जोड़ देना आसान है लेकिन गलत है, क्योंकि दोनों की प्रकृति अलग है। एक तरफ सत्ता का गणित था दूसरी तरफ कानूनी प्रक्रिया की जांच है।
वहां गिरधर गमांग का वोट चर्चा में आया था, नैतिक सवाल उठे थे लेकिन कानूनी रूप से वह वोट वैध था (अनैतिक कह सकते हैं)। ध्यान रहे, हर नैतिक सवाल कानून का उल्लंघन नहीं होता।
अब राज्य सभा नामांकन और शिकायत की प्रक्रिया को समझिए। किसी के खिलाफ परिवाद (शिकायत) दिया जा सकता है। मजिस्ट्रेट का काम तुरंत दोष तय करना नहीं होता, बल्कि जांच शुरू करना होता है। नोटिस का मतलब मुकदमा नहीं होता। नोटिस का मतलब केवल पूछताछ है। अगर मैंने कानून की पढ़ाई नहीं की होती तो ये चूक मुझसे भी होती।
समस्या यह है कि लोग नोटिस को मजिस्ट्रेट निर्णय समझ लेते हैं। ये ऐसे है जैसे पुलिस किसी शरीफ आदमी के घर किसी काम से आई तो आसपास के लोग समझने लगते हैं कि कुछ तो गड़बड़ है।
अगर हर शिकायत को अपराध मान लिया जाए तो फिर कोई भी चुनाव लड़ ही नहीं पाएगा क्योंकि हर व्यक्ति के खिलाफ कोई न कोई आरोप मिल ही जाएगा। आरोप और अपराध में अंतर समझना बहुत जरूरी है। मेरा अनुरोध है कि आप सोशल साइट पर जब भी लिखें, थोड़ा अध्ययन करके लिखें।
असल सवाल यह नहीं है कि किसके खिलाफ क्या कहा गया, असली सवाल यह है कि प्रक्रिया सही थी या नहीं। लेकिन लोग प्रक्रिया नहीं देखते। वे परिणाम देख लेते हैं और उसी से पूरा सच बना लेते हैं।
लोकतंत्र में सबसे बड़ा खतरा अज्ञान नहीं है।३ सबसे बड़ा खतरा अधूरी जानकारी के साथ बना हुआ पूरा विश्वास है, क्योंकि वही विश्वास सबसे ज्यादा जोर से बोलता है।
इसलिए अगली बार जब आप किसी मुद्दे पर राय बनाएं तो खुद से सिर्फ इतना पूछिए क्या मैं सच जानता हूं या सिर्फ अपने मन का सच दोहरा रहा हूं?
कई लोगों को लग रहा है कि संजय सिन्हा को आखिर इतनी तकलीफ क्यों है एक राज्य सभा सीट खो देने की। बात सही है, मैंने इस विषय पर कई बार लिखा। कई लोग मुझे कांग्रेस का दलाल कहने लगे हैं, पत्तलकार तो पहले था, अब वो रहा नहीं तो इस मामले में क्या ही कहें। पर बात ये नहीं है। एक जागरुक नागरिक की तरह मैं ऐसी छोटी घटनाओं में भविष्य की बड़ी भूलों को लेकर आशंकित हूं। बस इसीलिए यह विषय उठ खड़ा हो रहा है। सदैव बीजेपी का शासन ही नहीं रहेगा, लेकिन अगर ये नियम मान्य हो गया तो भविष्य में दूसरी पार्टियां भी इसे हथियार बनाएंगी। ध्यान रखिएगा, कानून में आदेश नियम बन जाता है।
नोट-
- सच उतना सरल नहीं होता जितना सोशल मीडिया पर दिखता है।
- कानून उतना भावनात्मक नहीं होता जितना बहसों में बना दिया जाता है।
- लोकतंत्र सिर्फ वोट देने की प्रक्रिया नहीं है, लोकतंत्र सोचने की जिम्मेदारी भी है।
पार्ट एक – मीनाक्षी नटराजन इलेक्शन प्रकरण : नरेंद्र मोदी जब रात में सोने जाते होंगे तो इतनी बेईमानी के बारे में सोचते होंगे?


