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सियासत

भारत इथेनॉल और आइसोब्यूटेनॉल पर अचानक से इतना तेज-तेज क्यों चलने लगा है?

सुभाष सिंह सुमन-

अच्छा, एक बात सोचकर बताइये सबलोग। भारत अचानक से इथेनॉल और आइसोब्यूटेनॉल पर इतना तेज-तेज क्यों चलने लगा है? भारत सरकार का लक्ष्य था 2030 तक पेट्रोल में इथेनॉल की मिलावट 20% पर ले जाने का। यह तो पहले ही हो चुका। अभी कई स्वतंत्र विश्लेषक दावा कर रहे हैं कि सरकार ने चुपचाप पेट्रोल में 25% इथेनॉल मिलाकर बेचना शुरू कर दिया है। बताया 20% ही जा रहा है, लेकिन मिलावट बढ़ायी जा चुकी है। हर जगह नहीं, लेकिन कई जगह।

यह टेस्टिंग है। क्योंकि सरकार की योजना न्यूनतम मिलावट को 20% से ऊपर बढ़ाने की है। अभी तक बताया जाता रहा है कि स्टैंडर्ड फ्यूल के रूप में 20% इथेनॉल वाला पेट्रोल मिलता रहेगा, लेकिन जल्द ही सरकार ऑफिशियली अपनी यह बात काटेगी। इस मिनिमम मिलावट को धीरे-धीरे 30% ले जाया जायेगा। यदि जनता ने व्यापक विरोध नहीं किया, तो इसके लिए साल भर भी इंतजार करने की जरूरत नहीं पड़ेगी, यह आप तय मानकर चलो।

एक्सपी100 जैसे कम मिलावट वाले पेट्रोल यदि आपके क्षेत्र में कहीं मिल रहा हो, तो आप खुद को भाग्यशाली समझें। ई85 या पी15 सरकार लॉन्च कर ही चुकी है। इसमें 85% इथेनॉल है और सिर्फ 15% पेट्रोल। कल गन्नाकरी 100% इथेनॉल के फाइल पर साइन करने की खुशखबरी दे चुके हैं। पिछले सप्ताह गन्नाकरी डीजल में 15% आइसोब्यूटेनॉल मिलाने की बात कह चुके हैं। गन्नाकरी ब्रो कह रहे हैं कि भविष्य इथेनॉल का है। पेट्रोल वो देखना नहीं चाहते हैं।

सरकारी दावे हैं- इससे किसानों की कमाई बढ़ जायेगी, किसान अन्नदाता से ईंधनदाता बन जायेंगे, इससे प्रदूषण कम हो जायेगा, इससे सरकार का आयात बिल कम हो जायेगा, विदेशी मुद्रा की बचत होगी, देश आत्मनिर्भर होगा वगैरह-वगैरह।

सुनने में ये सब बहुत अच्छा लगता है। लेकिन आज थोड़ा हिसाब-किताब करते हैं। मेरा प्रिय विषय है। एक दशक से अधिक समय हो गये रोज आँकड़ों से खेलते हुए। आँकड़े न हों और हिसाब-किताब न हों, तो मुझे लगता है जैसे फूल-पत्ती वाला कवित्त हो रहा है। इस हिसाब-किताब से सबको सोचने का नया ऐंगल भी मिलेगा। होपफुली।

भारत में पेट्रोल की खपत सालाना 5,00,000 लाख लीटर से ऊपर निकल रही है। यह आँकड़ा सरकारी है। पेट्रोलियम प्लानिंग ऐंड एनालिसिस सेल (पीपीएसी) ने यह बताया है। सरकार ने देश में इथेनॉल बनाने के लिए फिलहाल गन्ना, मक्का और धान (चावल) के इस्तेमाल की मंजूरी दे दी है। मान लीजिये कि हम देश के सारे सरप्लस मक्का, चावल और गन्ने को इकट्ठा करके सिर्फ इथेनॉल बनाने में झोंक देते हैं। कृषि मंत्रालय के आँकड़ों के हिसाब से पिछले फसल वर्ष में करीब 350 लाख टन सरप्लस मक्का रहा। 1 टन मक्का से बनता है 380 लीटर इथेनॉल। मतलब पूरा सरप्लस मक्का लगा दें तो बनेगा करीब 1,33,000 लाख लीटर इथेनॉल। इसी तरह 200 लाख टन सरप्लस चावल है। 1 टन चावल से बन रहा 450 लीटर इथेनॉल, तो पूरे सरप्लस चावल से बने करीब 90,000 लाख लीटर इथेनॉल। गन्ने का सरप्लस रहा 2000 लाख टन। 1 टन गन्ने से बनता है करीब 80 लीटर इथेनॉल। मतलब पूरे सरप्लस गन्ने से करीब 1,60,000 लाख लीटर इथेनॉल बन रहा है।

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तीनों को जोड़ लीजिए। कुल इथेनॉल बन रहा है लगभग 3,83,000 लाख लीटर। पेट्रोल की हमारी खपत है 5,00,000 लाख लीटर। यानी अगर हम चावल, मक्के और चीनी का निर्यात पूरा बंद कर दें, पूरा सरप्लस सिर्फ इथेनॉल में डाल दें, तब भी पेट्रोल की मौजूदा खपत के मुकाबले 1,17,000 लाख लीटर की कमी रह जाती है।

और कहानी यहीं खत्म नहीं होती। भारत में हर साल लगभग 10,00,000 लाख लीटर डीजल की खपत होती है। पीपीएसी का आँकड़ा है यह भी। अब डीजल में 15% आइसोब्यूटेनॉल मिलाने की योजना है। इसका हिसाब हो जाता है 1,50,000 लाख लीटर आइसोब्यूटेनॉल। ये भी बनेगा अनाजों से ही।

सारा सरप्लस गन्ना, मक्का और चावल हम पहले ही यूज कर चुके हैं इथेनॉल में। उसके बाद भी कमी पड़ रही है। अब आइसोब्यूटेनॉल बनाने के लिए अनाज चाहिए। वो कहाँ से आयेगा, यह हमारा सबसे बड़ा सवाल बन जाता है?

शायद इस सवाल का जवाब हमें अमेरिका के पास मिले। डंकापति उर्फ अमृतलाल की सरकार में हमारी विदेश नीति पर अमेरिका का प्रभाव जगजाहिर हो चुका है। लेजर शंकर खुद स्वीकार कर रहे हैं कि भारत ने ‘अमेरिका के कहने पर’ रूसी तेल खरीदना शुरू किया था। अभी ‘जब और जितनी’ मोहलत अमेरिका दे रहा है, भारत उतना ही रूसी तेल खरीद रहा है। सरकार समर्थक और कमलची यहाँ पर आँकड़ा रखते हैं कि रूसी तेल का आयात तो हो ही रहा है या बढ़ रहा है। आज भी ऐसा कुछ आँकड़ा आया है। लेकिन यह किस कीमत पर हो रहा है, ये नहीं बतायेंगे।

अभी आयात बढ़ा, क्योंकि अमेरिका ने रूसी तेल खरीदने की इजाजत की अवधि ‘भारत के अनुरोध’ पर आगे बढ़ा दी। ‘अमेरिका के कहने पर’ हम आदर्श बालक की तरह चल रहे हैं। इसका नुकसान ये हो चुका है कि पहले हमें जो रूसी तेल डिस्काउंट पर मिल रहा था, अब वही तेल प्रीमियम पर मिल रहा है। सिर्फ अप्रैल महीने में यह प्रीमियम 425% बढ़ चुका था। मई का आँकड़ा 2-4 दिन बाद मिल पायेगा। सरल शब्दों में:- जो रूस हमें 6 महीने पहले तक मार्केट रेट से कम में तेल दे रहा था, अब वही रूस उसी तेल के लिए हमसे मार्केट रेट से अधिक वसूल रहा है। कारण है कि हम सब काम ‘अमेरिका के कहने पर’ कर पाते हैं।

यह तो एक बात हुई। बातें इतनी ही नहीं हैं। ईरान युद्ध के समय हमने भारत की विदेश नीति को पहली बार पलटते देखा। ईरान पर हमले की हम आलोचना नहीं कर पाये। ईरान द्वारा किये गये हर जवाबी हमलों की हमने आलोचना की। ईरान के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र में एक प्रस्ताव लाया गया। हम उसमें को-स्पॉन्सर यानी सह-प्रस्तावक भी बन गये। ऑफकोर्स यह भी ‘अमेरिका के कहने पर’ ही हुआ। और इस तरह स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार हमारी विदेश नीति किसी एक पक्ष की पिछलग्गु बनी। और अभी अमेरिका ने तीन असैन्य जहाजों पर हमला किया। उनमें तीन भारतीय नागरिक मारे गये। भारत अपनी आधिकारिक आलोचना में अमेरिका का नाम नहीं ले पा रहा है, जबकि अमेरिका छाती ठोककर कह रहा हमला उसने किया।

अमेरिकी विदेश मंत्री रुबियो का बयान तो और शर्मनाक है। उसमें साफ कह रहा है कि हाँ हमने किया। हमारा आदेश नहीं माने तो आगे भी करेंगे। इधर हमारी सरकार बोलने में शर्म से दबी हुई है। क्योंकि भारतीय जन अमेरिका की नजर में कीड़ा-मकोड़ा है ही, हमारी अपनी सरकार भी शायद ऐसा ही सोचती है।

अब पेट्रोल-डीजल की बात। अमेरिकी ऊर्जा विभाग के आँकड़े बताते हैं कि 2025 में जनवरी से सितंबर के बीच भारत ने अमेरिका से 35,39,000 बैरल इथेनॉल खरीदा। यानी हर महीने करीब 3,93,000 बैरल। एक बैरल में लगभग 160 लीटर होते हैं। यानी 2025 के 9 महीने में हमने लगभग 5,700 लाख लीटर इथेनॉल अमेरिका से खरीदा।

कहानी अभी और बच रही है। मक्के के मामले में हम न सिर्फ आत्मनिर्भर थे, बल्कि बड़े निर्यातक थे। अब हम मक्का आयात करने लगे हैं। अमेरिका के साथ जो ट्रेड डील होने वाली है, उसमें अमेरिका से मक्का खरीदने की भी बात एजेंडे में है। मतलब हम इथेनॉल खरीद रहे अमेरिका से। निश्चित यह आत्मनिर्भरता नहीं, अमेरिका-निर्भरता है। और यह भी निश्चित कि इसमें डॉलर यानी विदेशी मुद्रा खर्च हो रहे हैं। मक्का, चावल और चीनी के निर्यात से किसानों को कमाई होती थी, देश को विदेशी मुद्रा मिलती थी। इसका नुकसान हो रहा है। आगे हम अमेरिका से इथेनॉल की खरीद बढ़ायेंगे, आइसोब्यूटेनॉल खरीदेंगे, मक्का खरीदेंगे। आखिरकार हमारे अमृतलाल अमेरिका से 500 अरब डॉलर की खरीदारी करने का वादा जो कर आये हैं!

इसे और सरल शब्दों में समझते हैं। अमेरिका चाहता है कि उसके किसानों और बायोफ्यूल (इथेनॉल और आइसोब्यूटेनॉल) उद्योग के लिए बड़े बाजार खुलें। भारत दुनिया के सबसे बड़े ईंधन बाजारों में से एक है। ऐसे में यदि पेट्रोल और डीजल में लगातार ज्यादा मात्रा में इथेनॉल और आइसोब्यूटेनॉल मिलाया जाता है तो सबसे बड़ा लाभ किसे मिलेगा? भारतीय उपभोक्ता को या अमेरिकी उत्पादकों को? सरकार इसे ग्रीन फ्यूल रिवॉल्यूशन बता रही है। लेकिन जब घरेलू उत्पादन माँग पूरी नहीं कर पा रहा, तब यह सवाल स्वाभाविक उठना चाहिए कि कहीं यह कथित क्रांति अमेरिका से प्रायोजित तो नहीं?

आखिर पेट्रोल और डीजल में यह मिलावट पर्यावरण ठीक करने के लिए हो रही है या अमेरिका को खुश करने के लिए? इससे भारतीय किसानों की आय बढ़ने वाली है या अमेरिकी किसानों का निर्यात? क्रूड न खरीदकर इथेनॉल, आइसोब्यूटेनॉल, अनाज खरीदें, तो इसमें आत्मनिर्भरता आयी किधर? यह तो एक आयात को हटाकर उसकी जगह दूसरा आयात करना हुआ।

रही बात पर्यावरण की, तो इसपर कई स्वतंत्र अध्ययन मौजूद हैं इंटरनेट पर। खुद सरकारी नीति आयोग की एक स्टडी बताती है कि इथेनॉल बनाने में कितना पानी बर्बाद होता है! सरकार कई सालों से योजनाएँ चला रही हैं कि किसान चावल की खेती कम करें, क्योंकि इससे भूजल संकट पैदा हो रहा है। तो पर्यावरण का कितना भला होने वाला है, यह भी सोच लीजिए।

Edit: तीनों फसलों के उत्पादन के ये आंकड़े स्थाई नहीं हैं। पिछले दो साल से बारिश बढ़िया हुई, उपज भी बढ़िया रही। इस साल अल नीनो का असर हो सकता है। यानी आंकड़े बेस्ट पॉसिबल केस के हैं।

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