आनंद जैन-
समय की विडंबना देखिये. देश में फासीवाद के ख़िलाफ़ एक इकलौता इंसान खड़ा है, और ऐसा खड़ा है कि संपूर्ण विपक्ष उसके पीछे आकर खड़ा हो गया है, मगर इसी इंसान की अपनी ख़ुद की पार्टी कार्यकर्ता विहीन हो गई है.
राहुल अकेले खड़ा है, उसने अपना माद्दा दिखा दिया है कि एक तानाशाह के सामने एक स्टेट्समैन कैसे खड़ा होता है. उसका ऑरा ऐसा है कि यूपी के अखिलेश हों, या बिहार के तेजस्वी, महाराष्ट्र के शरद पवार हों या तमिलनाडु के स्टालिन, सभी उसके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हैं और उसे विपक्ष का नेतृत्व सौंप दिया है. आप कल्पना कर सकते हैं कि देश की आजादी के वक्त भी कुछ ऐसा ही माहौल होगा, जब देश के वाम – दक्षिणपंथी, कॉंग्रेसी सभी नेहरू के नेतृत्व को स्वीकार करने के लिये मजबूर होंगे क्योंकि वो इकलौते ऐसे नेता थे, जो हर वर्ग, हर समाज, हर प्रांत को मंजूर होंगे.
और उसकी अपनी पार्टी आज डूब चुकी है. दंभ में डूबे, ज़मीन से कटे हुए नेता पिछले ११ सालों में खेत रहे, जिनको सत्ता की भूख थी वो जाकर भाजपा की गोद में बैठ गये, जो खा कमाकर अघा गये वो लुटियन्स में बैठ कर सत्ता की दलाली कर रहे हैं, बाकी के बैठकर गाहे बगाहे मीडिया के ज़रिए कॉंग्रेस की लुटिया डुबो रहे. इनको राहुल का नेतृत्व गले नहीं उतरता क्योंकि वो उनके जैसा नहीं है. सत्ता की चाह नहीं, पैसे की चाह नहीं, कमीनापन नहीं. ऐसी कॉंग्रेस में रहकर उनको क्या मिलेगा.
हमारा प्रदेश और हमारा शहर इस मक्कारी का सबसे अच्छा उदाहरण हैं, जहां एक ओर कमलनाथ ने भाजपा को सत्ता थाली में परोस कर दे दी, वहीं दूसरी ओर हमारी शहर कॉंग्रेस भाजपा में ऐसे समा गई जैसे हमारे यहां बहती गटर उतनी ही गंदी खान नदी में समा जाती है. हमारे शहर में कॉंग्रेस का नामलेवा नहीं बचा मगर यह गति उस कॉंग्रेस से बहुत अच्छी है जिसने अपनी आभा और ओज पूरी तरह खो दी थी.
आज उत्तर भारत में कॉंग्रेस का संगठन नदारद है, बचा है तो केवल राहुल गांधी. आज वही स्थिति हो गई है कि कॉंग्रेस ही राहुल है और राहुल ही कॉंग्रेस. नरेंद्र मोदी की तानाशाही के ख़िलाफ़ यदि एक आवाज़ देश को संगठित करती है तो वो राहुल की ही होती है. अब कल्पना कीजिए वह स्थिति जहां अगले चुनाव में भाजपा हर राज्य में क्षेत्रीय पार्टियों से हार कर खड़ी होगी, मगर केंद्र में कॉंग्रेस के सांसद नहीं होंगे. एक राहुल होंगे और २० पार्टियों के सांसद. ऐसे में सरकार किसके हाथ चलेगी.
क्या राहुल संगठन बना सकते हैं – शायद नहीं. वो नेतृत्व कर सकते हैं मगर संगठन बनाना उनके व्यक्तित्व की खूबियों में नहीं है. फिर कौन है जो राहुल के इस नेतृत्व को एक पार्टी में ढाल सकता है? राहुल को वो नेता खोजने होंगे, क्योंकि बग़ैर सांसदों के नेतृत्व कर वे नेहरू नहीं बन पायेंगे, गांधी बन कर रह जायेंगे.
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