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उत्तर प्रदेश

नोएडा प्राधिकरण को सुप्रीम फटकार- कौन धोएगा अफसरों के भ्रष्टाचार का दाग?

ओ पी श्रीवास्तव-

गौतमबुद्ध नगर । सर्वोच्च न्यायालय ने नोएडा प्राधिकरण में बड़े पैमाने पर फैले भ्रष्टाचार के साम्राज्य को लेकर जमकर फटकार लगाई है और उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया है कि एक नये एसआईटी का गठन कर हर सम्भावित बिन्दुओं की जांच कराई जाए तथा संदिग्ध अफसरों की सम्पत्तियों की भी इस आशय से अनुसन्धान कराई जाए कि उनके पास आय से अधिक सम्पत्ति तो नहीं।

बुधवार को सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) का उक्त आदेश आने के बाद नोएडा प्राधिकरण के अधिकारियों के चेहरे पर मायूसी छा गई। किसी भी अधिकारी ने टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। इसका असर शुक्रवार को पन्द्रह अगस्त के दिन भी दिखाई दिया जब स्वतन्त्रता दिवस समारोह के दौरान अधिकारियों ने अपने को बहुत संयमित और चुप रखा।

आम जनता ने भी सर्वोच्च न्यायालय की प्रशंसा करते हुए ऐसे भ्रष्ट आचरण वाले अधिकारियो को नंगा करने के आदेश का ज़ोर दार स्वागत किया है। शीर्ष अदालत ने यहां के किसानों को अधिक मुआवजा वितरित किए जाने के मामले में पूर्व एसआइटी की रिपोर्ट पर चिचार करने के उपरांत बुधवार को न्याय हित में बड़ा ही महत्वपूर्ण आदेश पारित किया है ।

इसमें भूमि मुआवजे के अत्यधिक भुगतान, अधिकारियों व भूस्वामियों के बीच कथित मिलीभगत के मुद्दे पर गहराई से पूछताछ करने का निर्देश दिया गया।

इस प्रकार यह स्पष्ट हो गया है कि नोएडा अथॉरिटी में एक से एक बड़े मगरमच्छ बैठे हुए है जो सरकार और आम जनता की आंखों में धूल झोंककर अपनी जेबों को भरने में मस्त हैं। शीर्ष अदालत ने नोएडा के एक विधि अधिकारी की अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए एसआइटी जांच का आदेश दिया था। इसमें कुछ भूस्वामियों को “हकदार न होने” के बावजूद भी अधिकाधिक मुआवजा दिए जाने का आरोप था।

अनेक ऐतिहासिक फैसले देने वाले न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जायमाल्या बागची की पीठ ने आदेश में कहा है कि डी जी पी उत्तर प्रदेश पिछली SIT द्वारा चिह्नित मुद्दों को देखते हुए आइपीएस संवर्ग के तीन पुलिस अधिकारियों वाली एक एसआइटी का अविलंब गठन करें।

यह नई एसआइटी तुरंत प्रारंभिक जांच कर आरोपियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करेगी और पिछली एसआइटी द्वारा उजागर किए गए बिंदुओं की विस्तृत जांच करेगी।

सर्वोच्च न्यायालय का यह भी निर्देश है कि फोरेंसिक विशेषज्ञों के साथ-साथ राज्य पुलिस के आर्थिक अपराध शाखा को भी जांच टीम में शामिल किया जाए।

अदालत का कहना है कि यदि एसआइटी प्रारंभिक जांच के बाद यह पाती है कि प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध किया गया है, तो वह मामला दर्ज करेगी और कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई करेगी।

कोर्ट ने कहा है कि नोएडा अथॉरिटी के दैनिक कामकाज में पारदर्शिता और नागरिक-केंद्रित दृष्टिकोण लाने के लिए एसआइटी रिपोर्ट की एक प्रति उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव के समक्ष भी रखी जाए। जो इसे उचित एजेंडा के साथ मंत्रिपरिषद के समक्ष उचित निर्णय लेने के लिए प्रस्तुत करेंगे। शीर्ष अदालत यही नहीं रूका , उसने स्पष्ट रूप से कहा है कि मुख्य सचिव नोएडा प्राधिकरण में एक मुख्य सतर्कता अधिकारी भी तैनात करेंगे। जो आइपीएस संवर्ग से हों या सीएजी से प्रतिनियुक्ति पर हो।

सर्वोच्च न्यायालय ने अपेक्षा की है कि नागरिक सलाहकार बोर्ड का गठन चार सप्ताह के भीतर हो जाए। परिणामस्वरूप परियोजनाओं में पैसे की बर्बादी पर नकेल लगेगा।

शीर्ष कोर्ट ने फटकार लगाते हुए यह भी कहा कि यह भी सुनिश्चित किया जाए कि पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआइए) और सर्वोच्च न्यायालय की हरित पीठ द्वारा रिपोर्ट की स्वीकृति के बिना नोएडा प्राधिकरण में कोई भी परियोजना शुरू न हो। इसके बाद ही निर्माण होगा। इससे प्राधिकरण की मनमानी पर भी प्रभावी अंकुश लगेगा, परियोजना के नाम पर अनाप शनाप पैसे की बर्बादी और बंदरबांट भी रुकेगी।

सर्वोच्च न्यायालय ने कहां है कि 10 साल से अधिक पुराने दस्तावेजों की जांच करना आवश्यक है। क्योंकि एसआइटी रिपोर्ट में संकेत दिया है कि 20 मामलों में भूस्वामियों को अत्यधिक मुआवज़ा दिया गया था।

1198 मामलों में भूस्वामियों को बढ़ा हुआ मुआवज़ा दिया गया, जबकि 1167 मामलों में अदालती निर्देश थे। इसमें 20 मामलों के संबंध में नोएडा के दोषी अधिकारियों के नाम भी शामिल हैं।

यह पूछे जाने पर कि क्या लाभार्थियों और नोएडा के अधिकारियों के बीच मिलीभगत थी, एसआइटी ने बताया कि अधिकारियों, उनके परिवार के सदस्यों, भूस्वामियों और संबंधित अवधि के दौरान अधिकारियों द्वारा अर्जित संपत्तियों के बैंक खातों के विवरण, साथ ही 10 साल से अधिक पुराने दस्तावेज़ों की जांच करना आवश्यक है।

द्बय न्यायमूर्तियों ने कहा है कि रिपोर्ट में वित्तीय लेनदेन विशेषज्ञों सहित आय से अधिक संपत्ति के मामलों में विशेषज्ञता रखने वाली एक स्वतंत्र, विशिष्ट एजेंसी का भी गठन हो।

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित उक्त निर्णय ने नोएडा प्राधिकरण के ईमानदार होने की छवि पर और स्वच्छता अभियान में इन्दौर जिले की तरह हासिल उपलब्धि की खुशियों पर विराम लगा दिया है, जिसका जश्न नोएडा के अधिकारियों द्वारा लाखों रुपए खर्च कर मनाया जा रहा था। उक्त सम्बन्ध में नोएडा प्राधिकरण के कई दिग्गज अधिकारियों से वार्ता करने की कोशिश की गई लेकिन किसी ने भी कुछ नहीं कहा। चुप्पी साध गए।

दूसरी तरफ आम आदमी सुप्रीम कोर्ट के उक्त आदेश से बहुत प्रसन्न हैं और आदेश का स्वागत कर रही है। लेकिन लोगों का कहना है कि नोएडा अथॉरिटी पर भ्रष्टाचार के जो दाग़ लगें हैं उसे कौन धोएगा। यह अक्षय प्रश्न है।

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