नई दिल्ली। आंध्र प्रदेश में साक्षी टीवी चैनल की कथित ब्लॉकिंग के खिलाफ दाखिल याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार और संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया है। चैनल ने आरोप लगाया है कि विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद से उस पर सुनियोजित तरीके से “राजनीतिक सेंसरशिप” लागू की गई है।
अदालती कवरेज करने वाली वेबसाइट लाइव लॉ में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, न्यायमूर्ति पी. श्रीनरसिम्हा और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने कहा— “अंतरिम राहत और रिट याचिका दोनों पर नोटिस जारी किया जाता है।” याचिकाकर्ता ने तत्काल अंतरिम राहत के रूप में चैनल के प्रसारण को फिर से बहाल करने की मांग की है।
याचिका कंपनी एम/एस इंदिरा टेलीविजन लिमिटेड और इसके पूर्णकालिक निदेशक बी. रामना रेड्डी द्वारा दाखिल की गई है।
चैनल का आरोप
साक्षी टीवी ने अपनी याचिका में दावा किया है कि चुनाव नतीजे घोषित होने और तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) की सरकार बनने के तुरंत बाद, जून 2024 में, चैनल को अचानक एपी स्टेट फाइबरनेट लिमिटेड (AP Fibernet) – जो राज्य सरकार का प्लेटफॉर्म है – से बिना किसी नोटिस के हटा दिया गया।
इसके बाद राज्य भर के बड़े मल्टी सिस्टम ऑपरेटर्स (MSOs) ने भी कथित दबाव में चैनल का प्रसारण रोक दिया। याचिका के मुताबिक, करीब 40.55 लाख ग्राहक (लगभग 80% मार्केट) चैनल से वंचित हो गए हैं, जबकि शेष छोटे ऑपरेटर भी लगातार “धमकी” झेल रहे हैं।
चैनल की गिरती टीआरपी
याचिका में कहा गया है कि मई से जुलाई 2025 के बीच, चैनल पूरी तरह ब्लॉक कर दिया गया। केवल भिमावरम कम्युनिटी नेटवर्क (रेयालसीमा क्षेत्र) में यह चैनल उपलब्ध है, वह भी केवल à la carte आधार पर। इस दौरान चैनल की BARC रेटिंग्स में भारी गिरावट आई है—
- GRPs 17.5 से घटकर 10.30 तक पहुंच गए।
- क्यूम्युलेटिव रीच 14.94 से गिरकर 7.95 हो गई।
एमएसओ पर दबाव का आरोप
याचिका में दावा है कि जिन ऑपरेटरों ने दबाव मानने से इनकार किया, उनके खिलाफ बिजली और अन्य सुविधाओं की कटौती की गई। कई केबल ऑपरेटरों ने सार्वजनिक रूप से सरकार के रवैये की निंदा भी की। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह कार्रवाई संविधान के अनुच्छेद 14, 19(1)(a) (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) और 19(1)(g) (व्यवसाय करने की स्वतंत्रता) का उल्लंघन है।
उन्होंने अदालत से मांग की है कि:
- चैनल के प्रसारण को 3 जून 2024 की स्थिति में बहाल किया जाए।
- एमएसओ पर किसी भी तरह के दबाव या जबरन कदम पर रोक लगे।
- इस पूरे मामले की स्वतंत्र जांच कराई जाए।
- हुए आर्थिक नुकसान की क्षतिपूर्ति दी जाए।
- और भविष्य में राज्य तंत्र का दुरुपयोग कर मीडिया पर अंकुश लगाने से रोकने के लिए दिशा-निर्देश जारी किए जाएं।
सुप्रीम कोर्ट इस मामले की अगली सुनवाई जल्द करेगा।


