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सुख-दुख

पत्रकारों पर इस वक्त सबसे बड़ा दबाव खुद को निष्पक्ष दिखाने का है!

हर्ष कुमार-

दोस्तों, आपका स्वतंत्रता दिवस मन गया हो तो एक जानकारी आपके साथ शेयर कर दूं? हम पत्रकारों पर सबसे ज्यादा दबाव है अपने आप को निष्पक्ष दिखाने का, जनता की बात को सबके सामने कहने का और सबकी गालियां सुनने का भी। पर हकीकत बात यह है कि देश का मीडिया आज भी एक प्रकार की गुलामी में ही है जी रहा है।

जब मैं क्षेत्रीय पत्रकारिता में था तो सभी अखबारों में 15 अगस्त व 26 जनवरी का अवकाश रहता था। हम लोग देर रात तक खबरों से ज्यादा विज्ञापन भिजवाया करता थे जिससे प्रबंधन के दिए हुए बड़े-बड़े लक्ष्यों को पूरा किया जा सके। पर संतोष रहता था कि कम से कम चार दिन (दिवाली व होली भी) तो सबको एक साथ छुट्टी मिल जाती है।

जब दिल्ली में आए तो पता चला कि यहां तो होली व दिवाली के अलावा कोई छुट्टी ही नहीं। स्वतंत्रता दिवस के दिन भी दफ्तर आओ। सारा दिन सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने वाले और दुनिया भर का ज्ञान पेलने वाले पत्रकार साथियों की इस मुद्दे पर कभी कोई पोस्ट मैंने आज तक नहीं देखी। यूपी (लखनऊ) व कई अन्य राज्यों में ये ही अखबार ईद की तीन-तीन दिन की छुट्टी रखते हैं। जिसका कोई तुक नहीं है। (पता नहीं किस मूर्ख ने यह शुरू कराई थी लेकिन चल रही है।) पर स्वतंत्रता दिवस की एक दिन की छुट्टी नहीं होगी।

महाराष्ट्र में गणेश पूजा की और कोलकाता में दुर्गा पूजा की भी शायद एक दिन की छुट्टी होती है। बाकी कहीं कोई छुट्टी नहीं होती।

दिल्ली में तो लगता है कि अगर एक दिन अखबार नहीं छपेंगे तो कयामत आ जाएगी? मेरा तो यह मानना है कि हर सप्ताह में भी एक बार सारे अखबार व चैनल अपनी छुट्टी रख सकते हैं। लेकिन सब अंधी दौड़ में शामिल हैं। जो लोग संपादक व अन्य बड़ी महत्वपूर्ण पोस्ट पर पहुंच जाते हैं वे भी शोषणवादी प्रवृत्ति के शिकार हो जाते हैं और मालिकों को सलाह देने के बजाय गुलामों की तरह काम करने लगते हैं।

शायद यही वजह है कि आज मीडिया लाइन में आने के इच्छुक युवाओं की संख्या कम हो रही है। खराब सैलरी व बेहद गंदी दिनचर्या इसके प्रमुख कारण हैं। आज पत्रकारिता का डिप्लोमा अधिकांशतः वे ही बच्चे कर रहे हैं जिन्हें किसी अन्य स्ट्रीम में दाखिले नहीं मिलते या फिर वे पढ़ाई में अच्छे नहीं हैं। तो पत्रकार बन जाते हैं। इसी वजह से पत्रकारिता का स्तर दिन ब दिन गिरता जा रहा है।

चालीस साल की उम्र पार कर चुकी पत्रकारों की वर्तमान पीढ़ी के निकल जाने के बाद आगे की पंक्ति मुझे खाली दिखाई दे रही है। जो अच्छा काम करना चाहते हैं वे आज सीधे सोशल मीडिया मंचों पर अपनी प्रतिभा दिखा रहे हैं। लल्लनटॉप जैसे मंचों को छोड़ छोड़कर युवा अपने चैनल खोल रहे हैं। क्योंकि वहां भविष्य सुरक्षित नजर आ रहा है।

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