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मज़ाक किया जाता है, की नहीं जाती!

ओम थानवी-

हिंदी के अनेक पुंलिंग शब्दों को नाहक स्त्रीलिंग कर देने का चलन बढ़ क्यों रहा है? मैं शुद्धिवादी नहीं। पर भाषा में एक अनुशासन उचित समझता हूँ। प्रयोग भी ठीक; बिखराव भी चलेगा; अराजकता भी मंज़ूर। लेकिन लापरवाही के असर में भाषा चूल से क्यों उखड़े?

गए हफ़्ते एक दैनिक के पहले पन्ने पर मज़ाक़ शब्द स्त्रीलिंग रूप में देखा। मज़ाक़ किया जाता है, की नहीं जाती। मज़ार भी पुंलिंग शब्द है। किसी का मज़ार होता है, होती नहीं।

हाल ही एक पोस्ट में मैंने पीठ शब्द के पुंलिंग पक्ष की बात की थी, कि आसन या संस्था के भाव वाला पीठ पुंलिंग से स्त्रीलिंग में ढलने लगा, मानो शरीर या किताब वाली पीठ हो। ठीक वैसे, जैसे सोच शब्द हमारे देखते-देखते स्त्रीलिंग रूप धारण कर बैठा।

पीठ या सोच जैसे रूढ़ हो चुके विचलनों को भले अब उनके मूल रूप में लाने की कोशिश हम न करें। लेकिन हर प्रयोग की फिसलन को स्वीकार करते चले जाएँ या यथासंभव सही रूप का ख़याल करें? मेरा सवाल यही है।

सामर्थ्य शब्द को लोग आजकल स्त्रीलिंग में लिखने लगे हैं: मेरी सामर्थ्य, तुम्हारी सामर्थ्य। जबकि पुंलिंग शब्द है। झाड़ू भी पुंलिंग है। झाड़ू लगता था। दिल्ली की राजनीति की हवा बदली तो झाड़ू लगने लगी।

दिल्ली, चंडीगढ़ और शिमला में तार और अख़बार को पुंलिंग से स्त्रीलिंग होते देखा — तारें उलझी पड़ी थीं; आपके घर कितनी अख़बारें आती हैं, आदि। क्या ऐसे प्रयोगों को हम, दही या रूमाल की तरह, आँचलिकता में स्त्रीलिंग हो गया मान लें?

कल ही भाषाविज्ञानी सुरेश पंत जी ने प्राचीर शब्द की ओर ध्यान दिलाया था। संस्कृत में वह नपुंसकलिंग है। हिंदी में स्त्रीलिंग हो गया। लालक़िले की प्राचीर। हिंदी शब्दसागर तो प्राचीर को पुंलिंग बताता है!

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1 Comment

1 Comment

  1. jai prakash singh

    August 17, 2025 at 7:02 pm

    हिंदी खड़ी बोली में आंचलिकता का पुट आते ही स्त्रीलिंग पुलिंग का भेद मिटने लगता है

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