नवीन कुमार-
बंद कमरे में बाड़े के पीछे क़तार में खड़े, हाथ जोड़े पत्रकारिता के स्वनामधन्य चेहरे और रस्सी के उस तरफ़ से सलामी लेता हुआ एक शख्स। ये सम्मान है या अपमान?
अपमान भी नहीं, अपने घर बुलाकर बुरी तरह ज़लील करना। हैसियत बताना कि इस रस्सी को लांघने की कोशिश भी मत करना। जिस तरह प्रधानमंत्री पत्रकारों से मिल रहे हैं उस तरह तो लोग चिड़ियाघर के जानवरों से मिलते हैं। प्रबंधन को डर होता है कि जानवर को छुट्टा छोड़ेंगे तो हमला कर सकते हैं। इसलिए उन्हें चौबीसों घंटे ये एहसास दिलाओ कि तुम्हें बाड़े के अंदर रहना है और उसे लांघने की इजाज़त नहीं है।
इस तरह रहते-रहते उनकी आदत ऐसी हो जाती है कि खुले में निकाले जाने के बाद भी न छलाँग मार पाते हैं न दहाड़ पाते हैं। सर्कस के जानवरों को आपने देखा होगा। वो मालिकों की आंखों की हिलती पुतलियों तक से समझ जाते हैं कि वो क्या करवाना चाहता है। रस्सी-हंटर का असर तो जाने ही दीजिए। अपनी सीमा तय किए जाने वाला यह अदृश्य बाड़ा सर्कस के जानवर खुला छोड़ दिए जाने के बाद भी गले में लटकाकर चलते हैं।


आपने देखा होगा पिंजरे से छोड़ दिए गए तोते उड़ान नहीं भर पाते। फिर से पिंजरे के पास लौट आते हैं। क्योंकि हर बाड़ा सबसे पहले आपसे स्वतंत्र सोच और बौद्धिक वैचारिकी छीन लेता है। आप बाड़े को कवच मानने लगते हैं। आपको ग़ुलाम बनाने वाले को “युगपुरुष” जैसी उपाधियां देने लगते हैं।
आम तौर पर ऐसी बंदोबस्ती इसलिए की जाती है जब बुलाने वाले को आगंतुकों के बीच किसी ख़तरनाक आदमी के घुस जाने का अंदेशा हो। पिछले कुछ बरसों में नेताओं पर जूते चप्पल फेंके जाने की घटना की वजह से रैलियों में भी मंचों से जनता का घेरा इतनी दूर होता है जिससे कोई चप्पल फेंके भी तो मंच तक न पहुंचे। लेकिन राष्ट्रपति भवन में सब कार्ड भेजकर बुलाए हुए लोग थे। तमाम कथित तौर पर पत्रकार थे। चैनलों पर चमकने वाले चेहरे। अखबारों में छपने वाले चेहरे। तो प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को इनमें से किससे खतरा था। या यह शक था कि वो अव्यवस्था पैदा कर सकते हैं?

यह निहायत सामंती सोच है। क्या देश के नेताओं के लिए उसी राष्ट्रपति भवन में इस तरह की व्यवस्था बनाई जा सकती है? क्या अंबानी अडानी हिंदूजा बिड़ला महिंद्रा के लिए इस तरह की व्यवस्था बनाई जा सकती है? सवाल ही नहीं उठता। बवाल हो जाएगा। फिर पत्रकारों ने फोटो ऑप के चक्कर में पूरी पत्रकार बिरादरी की इज़्ज़त क्यों नीलाम की? अपनी नहीं तो पेशे की प्रतिष्ठा का तो ख़याल करते।
इस तरह की तस्वीरों पर किसी भी स्वाभिमानी व्यक्ति को शर्मिंदा होना चाहिए। कायदे से विरोध जताना चाहिए था। अगर पत्रकारों ने ऐतराज जताया होता तो राष्ट्रपति भवन के बंद कमरे के भीतर पत्रकारों को औक़ात बताने के लिए लगाया गया यह बाड़ा दो मिनट में हट जाता। बाड़े के पीछे हुलसते हुए कथित पत्रकारों में और कैमरे की क्लिक पर दाँत चियारते चिड़ियाघर या सर्कस के जानवरों में कुछ तो फर्क होना चाहिए।
ये तस्वीरें प्रतीक हैं कि मौजूदा सत्ता संस्थान पत्रकारों को पालतू बना चुका है और उसे सार्वजनिक तौर पर अपने आका के सामने गुलाटियां मारने में शर्मिंदगी महसूस नहीं होती, बल्कि इसे वो अपना कौशल बताता है, इसपर गर्व करता है।
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