दैनिक भास्कर में तीन साल पहले प्रकाशित अपनी खोजी रिपोर्ट में वरिष्ठ पत्रकार सुनील सिंह बघेल ने मुकेश अंबानी के बहुचर्चित वंतारा प्रोजेक्ट का बड़ा पर्दाफाश किया है। रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि किस तरह वन्यजीव संरक्षण और आदान-प्रदान के नाम पर असल में करोड़ों रुपये का खेल और नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। भोपाल से गुजरात भेजे गए बाघों और इंदौर से शेरों की अदला-बदली के बदले केवल गाड़ियों और मामूली मूल्य के पशु-पक्षियों का सौदा कर दिया गया, जबकि कागजों में इसे वन संरक्षण का हिस्सा बताया गया।

सुनील सिंह बघेल-
मेरी स्टोरी तब की है जब देश भर में आम आदमी तो छोड़िए, जिम्मेदार भी ambani के Vantara के बारे में ज्यादा जानते नहीं थे .. तब करीब 3 साल पहले वन्य प्राणी कल्याण के नाम पर, देशभर में चल रही इस घिनौनी साजिश का पर्दाफाश किया था..
Dainik Bhaskar में अपनी फ्रंट पेज स्टोरी में मैंने बताया था कि कैसे मध्य प्रदेश के चिड़ियाघरों से एक दो नहीं 12 टाइगर और बब्बर शेर, एक तेंदुआ रातों-रात जामनगर ले जाए गए.. यह भी खुलासा किया था कि कैसे अंबानी के इस पाप में, तत्कालीन मध्य प्रदेश सरकार भी बराबर की सहभागी थी… मैं और भी फोरम पर सिलसिलेवार ढंग से खुलासा किया था कि कैसे प्रदेश के साथ हुए अन्याय को लेकर तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और उनके अधिकारियों ने आपराधिक चुप्पी साध ली थी.. ये सिलसिला आगे भी चला।

हां, मेरी खबर को एमपी के मौजूदा कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने जरूर विधानसभा में उठाया था.. लेकिन उनकी आवाज भी भ्रष्टाचार की आंधी में बह गई…
कोल्हापुर से एक हथिनी महादेवी उर्फ माधुरी को वनतारा क्या ले जाया गया, लाखों जनता विरोध प्रदर्शन पर उतर आई.. हजारों लोग विरोध स्वरूप जियो की सिम पोर्ट करने लगे.. और मध्य प्रदेश जनता और सरकर दोनों नपुंसक बने रहे!!!
कैसे वन्य प्राणी अधिनियम से जुड़े सारे नियम कायदे कानून ताक पर रख दिए गए… इसका एक कारण अंबानी का रसूख तो था ही.. जिम्मेदारों को जमकर खैरात भी बांटी गई.. अंबानी के कथित दलालों, अधिकारियों ने सबसे ज्यादा दोहन मध्य प्रदेश के चिड़ियाघरों से ही किया..
MP से एक दो नहीं 12 टाइगर और लायन, रिहैबिलिटेशन के नाम पर एक तरह से तोहफे में दे दिए गए.. बदले में कुछ गाड़ियां.. और कथित रूप से स्मगल कर ले गए कुछ विदेशी पक्षी.. वह वादा भी पूरा नहीं हुआ… शायद इसलिए कि बड़े सेठ ने जिम्मेदारों को तोहफे का वादा पूरा कर दिया होगा…
जागरूक लोगों के लिए एक जिम्मेदारी छोड़कर जा रहा हूं … जरा पता तो कीजिए कि अंबानी को ग्रीन फील्ड जू का लाइसेंस देने के लिए, जिस सेंट्रल एक्ट में बदलाव किया गया.. उसे बदलने और प्राइवेट जू को अनुमति देने की प्रक्रिया से कौन-कौन लोग जुड़े हुए थे..?? और अब वही सब अधिकारी अधिकारी रिटायर होकर ..या रिटायरमेंट लेकर किसके साथ जुड़े हुए हैं..?? और भी बहुत कुछ कहने बाकी है.. फिर कभी अगली पोस्ट में…
अरुण माहेश्वरी-
क्या मोदी सरकार का अंत निकट है! भारत की राजनीति में इस समय असाधारण उथल-पुथल के संकेत मिल रहे हैं। सतह पर तो दिखता है कि सुप्रीम कोर्ट ने अनंत अंबानी के वनतारा प्रकल्प पर जाँच के लिए एसआईटी बनाई है। लेकिन असली खेल अदालत से कहीं गहरा नज़र आता है।
अफ्रीका से हाथियों का आयात, CITES (Convention on International Trade in Endangered Species of Wild Fauna and Flora) की अंतरराष्ट्रीय शर्तें, CZA (Central Zoo Authority) की भूमिका और प्रकल्प के वित्तीय स्रोत से जुड़े जटिल सवालों पर एसआईटी को सिर्फ़ बारह दिन में रिपोर्ट देने का आदेश यह साफ़ संकेत देता है कि इस रिपोर्ट की सामग्री पहले से ही कहीं तैयार पड़ी है। अदालत को आगे उस पर मुहर लगाने की औपचारिक भर पूरी करनी है।
न्यायपालिका में मोदी के प्रभाव को देखते हुए यह निष्कर्ष निकाला ही जा सकता कि मोदी अडानी-अंबानी तनातनी में अडानी के पाले में खड़े हो गए हैं ।
इसी मार्च महीने में वनतारा जू का उद्घाटन हुआ था। मंच पर अनंत अंबानी ने जैसे ही अपने प्रकल्प के बारे में भावुक होकर वक्तव्य रखा, मुकेश अंबानी स्वयं विगलित हो गए थे । कैमरों ने साफ़ दिखाया कि इस प्रकल्प का उनके लिए कितना गहरा निजी महत्व है।
यही कारण है कि अब जब उसी वनतारा को कठघरे में खड़ा किया जा रहा है, तो इसे मुकेश अंबानी सहजता से स्वीकार नहीं सकते । वे इसे अपनी निजी प्रतिष्ठा और शक्ति पर सीधा हमला मानेंगे। और, जैसा कि अंबानी को जानने वालों का मानना है, उनका स्वभाव नहीं है कि वे किसी वार को बिना प्रतिघात के जाने दें।
इसी बीच अंबानी-अडानी का कॉरपोरेट वॉर और भू-राजनीतिक ध्रुवीकरण भी खुलकर सामने आ चुका है। अंबानी का कथित थिंक टैंक ORF लगातार भारत–अमेरिका सहयोग पर ज़ोर दे रहा है, तो दूसरी ओर अडानी का थिंक टैंक ‘चिंतन’ भारत–चीन समीकरण को रीसेट करने की बहस चला रहा है।
इस बीच ट्रंप और अंबानी की दो मुलाक़ातें हो चुकी है । पहली ट्रंप के शपथ लेने के पहले और दूसरी इसी मई महीने में क़तर के सरकारी भोज में । वहीं दूसरी ओर अडानी समूह ट्रंप प्रशासन की जाँचों के दबाव में फँसा हुआ है। अब अडानी-मोदी बनाम अंबानी–ट्रंप का द्वंद्व दिखाई देने लगा है।
अब इसी बीच 9 सितम्बर को उपराष्ट्रपति चुनाव है।एनडीए के पास संख्याबल ज़रूर है, लेकिन गुप्त मतदान इसे कभी भी बिगाड़ सकता है। कांस्टिट्यूशन क्लब के चुनाव में इसका नमूना देखा जा चुका है। यही वह मौका है जहाँ अंबानी के रुपयें की ताकत का खेल भी संभव है। अगर उन्होंने वनतारा को अपने खिलाफ़ राजनीतिक हमले के रूप में लिया तो एनडीए के सहयोगियों या बीजेपी के भीतर भी अनेक सांसदों पर उनकी पकड़ निर्णायक हो सकती है।
उधर राहुल गांधी के “वोट चोर, गद्दी छोड़” आंदोलन ने मोदी की साख को रसातल में पहुँचा दिया है । जनता के बीच राहुल गांधी का उभार अब महज़ कल्पना नहीं, एक ठोस यथार्थ है।
इस प्रकार, वनतारा, अडानी–अंबानी–मोदी–ट्रंप का तनाव और उपराष्ट्रपति चुनाव में गुप्त मतदान, ये सब सूत्र एक ऐसे बिंदु पर आकर मिल रहे हैं, जो भारत की राजनीति में किसी भी चमत्कारी पट-परिवर्तन का बिंदु साबित हो सकता है । राजनीति में जिस प्रक्रिया से बड़े परिवर्तन घटित होते हैं, उसके सारे घटक यहां सक्रिय दिखाई पड़ रहे हैं। जन-असंतोष, सांसदों में विचलन, पूंजी की भूमिका, कॉरपोरेट की साजिशें और वैश्विक परिस्थिति और सर्वोपरि वैकल्पिक शक्ति का उदय।
ऐसा लगता है कि मोदी पर शनि का योग पूरा हो रहा है। सवाल अब केवल यह है कि 9 सितम्बर को क्या सिर्फ़ उपराष्ट्रपति चुना जाएगा, या वह मोदी सरकार के अंत की घोषणा का भी दिन होगा?



Sachin jage
August 28, 2025 at 7:05 pm
Are modi sarkar ke pichhe kitna padoge kitni bhi burai kar lo lekin aye ga to modi hi dekh lena 9 September ko
मुश्कानंद
August 28, 2025 at 10:29 pm
बेसिरपैर की झूठी बात मैन खुद वह जगह घूमी है, असलियत इस पत्तलकार द्वारा बताई गई बात से बिल्कुल उल्टी है, उस जगह के बीमार जानवर लूले लंगड़े अंधे रखे गए है और उनका देखभाल किया जा रहा। इस तरह की पत्रकारिता शर्मनाक है
Dharmendra Tiwari
August 31, 2025 at 12:09 am
पत्रकार महोदय खुद कन्फ्यूज लग रहे है,,,उन्हें पता नहीं की उन्हें क्या लिखना था और क्या लिख दिया,,,,
चलो मान लेते हैं कि अंबानी अदानी में मोदी अदानी की तरफ हैं और अंबानी के खिलाफ हैं,,वन तारा प्रोजेक्ट में उन्होंने कानूनी से लेकर अन्य तरह की मदद क्यों की?
दूसरा पैसों के दम पर अगर सत्ता बदलना इतना आसान है फिर तो कांग्रेस को सत्ता से बेदखल होना ही नहीं चाहिए था क्यों कि सभी बड़े पूंजीपति तो कांग्रेसी सहायता प्राप्त कर उनके कार्यकाल में ही बने थे।