मनोज अभिज्ञान-
आज के अमेरिकी अखबारों में तियानजिन में हुए शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के सम्मेलन को लेकर काफी चर्चाएं हुई हैं। कहीं इसे एशियाई दिग्गजों की रणनीतिक एकता की नयी तस्वीर बताया गया, तो कहीं इसे महज दिखावे की कूटनीति करार दिया गया। कुछ अखबारों ने ट्रंप की नीतियों को इस समीपता का कारण बताया, तो कुछ ने चीन, रूस और भारत के हाथ मिलाने को वाशिंगटन के लिए चेतावनी की तरह पेश किया। तो आइए देखते हैं वॉल स्ट्रीट जर्नल, वाशिंगटन पोस्ट, न्यूयॉर्क टाइम्स में आज प्रकाशित खबरों का सारांश:
चीन का तियानजिन शहर पिछले दिनों अंतरराष्ट्रीय राजनीति का केंद्र बना रहा। शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के शिखर सम्मेलन ने भले ही कोई बड़ी औपचारिक घोषणा न की हो, लेकिन मंच पर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का एक साथ हाथ थामना ही दुनिया के लिए सबसे बड़ा संदेश था। तस्वीरें कई बार शब्दों से ज्यादा बोलती हैं, और इस बार यह तस्वीर सीधे वॉशिंगटन तक गूंज रही थी।

सम्मेलन में ईरान, पाकिस्तान, तुर्की, बेलारूस, मध्य एशिया और कॉकसस के देशों के नेता भी मौजूद थे, लेकिन केंद्र में रहे एशिया की तीन बड़ी ताकतें—ड्रैगन, हाथी और भालू। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों ने जिस असंतोष को जन्म दिया है, यह बैठक उसी असंतोष की सामूहिक अभिव्यक्ति भी थी।
ट्रंप का पुतिन के साथ नरम व्यवहार रूस को चीन से दूर नहीं कर सका, बल्कि उलटे मोदी के साथ उनकी सख्ती ने भारत को रूस के और करीब धकेल दिया और चीन से भी रिश्ते मधुर होने लगे। मोदी सात साल बाद चीन पहुंचे थे। यह यात्रा अचानक नहीं हुई। पृष्ठभूमि में ट्रंप का वह फैसला था जिसमें भारत पर 50% टैरिफ लगा दिए गए थे। इनमें आधे तो सिर्फ इस वजह से कि भारत रूस से सस्ता तेल खरीद रहा था। इस कदम ने भारत में जबरदस्त नाराजगी पैदा की और तियानजिन का दौरा कहीं न कहीं अमेरिका को सीधा संदेश देने जैसा था कि भारत अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता से समझौता नहीं करेगा।
भारत जैसा लोकतांत्रिक देश जनमत को अनदेखा नहीं कर सकता। जब अमेरिकी दबाव बहुत ज्यादा बढ़ा, तो प्रधानमंत्री के पास यही रास्ता था कि वह वॉशिंगटन को साफ शब्दों में दिखा दें कि भारत किसी की धौंस में नहीं आएगा। यही वजह रही कि मोदी और शी जिनपिंग की बैठक को रिश्तों में नए आरंभ की तरह देखा गया।
शी जिनपिंग ने मोदी से कहा कि दुनिया की दो सबसे बड़ी आबादी वाले देशों को एक-दूसरे की सफलता में मददगार बनना चाहिए। ड्रैगन और हाथी के सहयोग का रास्ता चुनना चाहिए। मोदी ने भी रिश्तों में सकारात्मक गति पर जोर दिया।
पुतिन और मोदी की नजदीकी भी सम्मेलन की खास झलक रही। दोनों एक ही कार में बैठक स्थल पहुंचे। मोदी ने दिसंबर में पुतिन को भारत आने का न्योता दिया और कहा 1.4 अरब भारतीय आपकी यात्रा का इंतजार कर रहे हैं। मोदी ने याद दिलाया कि कठिनतम परिस्थितियों में भी भारत और रूस कंधे से कंधा मिलाकर चलते रहे हैं।
पुतिन के लिए यह सम्मेलन उनकी लंबी एशियाई यात्रा की शुरुआत भर था। चीन और भारत उनके तेल के सबसे बड़े खरीदार हैं। आगे बीजिंग में वे शी जिनपिंग और उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग उन के साथ द्वितीय विश्व युद्ध की 80वीं वर्षगांठ पर सैन्य परेड में मंच साझा करेंगे।
शी जिनपिंग ने सम्मेलन में एक बड़ा आर्थिक प्रस्ताव भी रखा। उन्होंने SCO विकास बैंक की स्थापना का सुझाव दिया और बताया कि चीन पहले ही सदस्य देशों में 84 अरब डॉलर का निवेश कर चुका है। अगले तीन साल में 1.4 अरब डॉलर और ऋण दिए जाएंगे। उनका कहना था कि संगठन के पास विशाल बाजार है, जिसे साझा विकास के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।

विदेश मंत्री वांग यी ने इसे वैश्विक शासन पर कुछ देशों के एकाधिकार को खत्म करने की दिशा में कदम बताया। असल में यह पहल चीन के उस अभियान का हिस्सा है, जिसमें वह खुद को भरोसेमंद साझेदार और अमेरिकी अनिश्चितता के मुकाबले स्थायी विकल्प के रूप में पेश करना चाहता है।
SCO अभी साझा उद्देश्य से ज्यादा अमेरिका के खिलाफ साझा नाराजगी से बंधा है। ये बड़े देश हैं, जिनके अपने-अपने एजेंडे हैं। लेकिन यह भी सच है कि ट्रंप की अनिश्चित नीतियों ने इन्हें एक-दूसरे के करीब धकेल दिया है। BRICS के साथ-साथ SCO भी अब चीन और रूस के लिए यह दिखाने का जरिया है कि पश्चिम ही सब कुछ नहीं है। यह राजनीतिक संदेश है कि अब दुनिया बहुध्रुवीय हो रही है।
तियानजिन सम्मेलन जितना नीतिगत था, उतना ही प्रतीकात्मक भी। बीजिंग में होने वाली सैन्य परेड में कई नेता बने रहेंगे। किम जोंग उन भले तियानजिन नहीं आए, लेकिन बीजिंग में पुतिन और शी के साथ मंच साझा करेंगे। चीन इस पर जोर दे रहा है कि SCO अब दुनिया की 40% आबादी और एक चौथाई अर्थव्यवस्था का प्रतिनिधित्व करता है। इस बार लाओस की सदस्यता के साथ संगठन 27 देशों का हो गया। 2001 में जब यह बना था, तो मकसद मध्य एशियाई आतंकवादी खतरों से निपटना था। अब यह सुरक्षा से आगे बढ़कर आर्थिक सौदों और वैकल्पिक वैश्विक व्यवस्था का मंच बन गया है।
सम्मेलन में शी जिनपिंग ने अज़रबैजान और आर्मेनिया की सदस्यता का समर्थन किया। दोनों हाल ही में व्हाइट हाउस में समझौते पर पहुंचे थे। दूसरी ओर, अफगानिस्तान, जो 2012 से SCO का पर्यवेक्षक सदस्य है, इस बार बाहर रहा। चीन ने तालिबान के राजदूत को मान्यता दी थी, लेकिन अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों की वजह से उन्हें आमंत्रित नहीं किया गया।
शी और मोदी की बैठक में गर्मजोशी जरूर दिखी, लेकिन मतभेद भी रहे। शी ने कहा कि सीमा विवाद से रिश्तों को परिभाषित नहीं करना चाहिए। मोदी ने जवाब दिया कि सीमा पर शांति और स्थिरता ही अच्छे संबंधों की बुनियाद है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि रिश्तों को किसी तीसरे देश के नजरिये से नहीं देखा जाना चाहिए। यह शायद अमेरिका के साथ तनाव को लेकर इशारा था।
मोदी ने जापान की यात्रा, जो क्वाड का सदस्य है, के बाद तियानजिन का दौरा किया। उन्होंने चीनी सैन्य परेड से दूरी बनाई, खासकर इसलिए क्योंकि वहां वे हथियार भी दिखाए जाएंगे जिन्हें पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ इस्तेमाल किया है।
पुतिन ने सम्मेलन का उपयोग अपने दृष्टिकोण को आगे रखने के लिए किया। उन्होंने कहा कि यूक्रेन युद्ध की जड़ें 2014 के उस तख्तापलट में हैं जिसे पश्चिम ने समर्थन दिया था। उनका दावा था कि शांति तभी संभव है जब संकट की जड़ें हटाई जाएं—यानी यूक्रेन को स्वतंत्र नीतियां अपनाने की अनुमति न दी जाए।
विशेषज्ञ मानते हैं कि SCO अभी अमेरिका-विरोधी औपचारिक गठबंधन नहीं है, बल्कि ऐसा मंच है जहां ईरान जैसे देश नैतिक समर्थन पा सकते हैं। क्षेत्रीय अस्थिरता, रूस-यूक्रेन युद्ध और मध्य-पूर्व की स्थिति सभी देशों के लिए सुरक्षा चिंताओं को बढ़ा रही है।

भले ही SCO को कुछ लोग बातचीत का अड्डा कहें, लेकिन चीन के लिए यह अवसर है अपनी वैकल्पिक विश्व व्यवस्था की दृष्टि फैलाने का। शी जिनपिंग इसे अपनी दुनिया की नई कल्पना पेश करने के अवसर के रूप में देखते हैं।
मेरी नज़र में तियानजिन का यह SCO सम्मेलन केवल औपचारिक बयानों और फोटो-ऑप्स तक सीमित नहीं था, बल्कि इसने वैश्विक शक्ति संतुलन में हो रहे बदलावों को उजागर किया। अमेरिका की नीतियों ने अनजाने में ही भारत, चीन और रूस को नज़दीक लाने का काम किया है। हालांकि इन देशों के बीच मतभेद और प्रतिस्पर्धा बनी हुई है, लेकिन इतना तय है कि वे अब मिलकर यह संदेश देना चाहते हैं कि दुनिया का भविष्य केवल पश्चिम तय नहीं करेगा। एक तरफ शी जिनपिंग का ड्रैगन और हाथी का नृत्य, दूसरी ओर मोदी और पुतिन की साझा कार यात्रा, और मंच पर तीनों नेताओं का हाथों में हाथ डालना। यह सब मिलकर बताता है कि एशिया की तीन बड़ी ताकतें नए संतुलन की तलाश में एक-दूसरे के करीब आ रही हैं। भले ही इनके बीच मतभेद कायम हों, लेकिन अमेरिका को सीधा संदेश यही है: अब दुनिया सिर्फ एक ध्रुव पर नहीं टिकेगी।


