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आज के अखबार : नौ में से छह ने जीएसटी कम होने के फायदे बताये हैं, इंडियन एक्सप्रेस ने लागू करने की दिक्कत

संजय कुमार सिंह-

जीएसटी जब लागू हुआ था तब भी कई दिक्कतें थीं और पूरी तरह लागू करने में महीनों लगे थे। अब चुनावी लाभ की उम्मीद में किए गये संशोधनों को भी लागू करने में समस्या है लेकिन अखबारों में प्रचार उसके फायदे को लेकर है। हिन्दुस्तान टाइम्स के पहले पन्ने की खबर है, वित्त मंत्री ने राज्यों के वित्त मंत्रियों को जीएसटी में सुधार का समर्थन करने के लिए धन्यवाद दिया। तथ्य यह है कि राज्यों के वित्त मंत्री जीएसटी कौंसिल के सदस्य होते हैं और यह निर्णय करने वालों में शामिल हैं। अगर उन्हें धन्यवाद दिया जाना है तो इस बात के लिए दिया जाना चाहिये कि उनके रहते केंद्र सरकार इतनी भारी वसूली करती रही और जैसे ही उसे (राजनीतिक कारणों से) जरूरत लगी जीएसटी कौंसिल ने संशोधन और आड़ में वसूली कम कर दी। अब उसका प्रचार करके पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश कर रही है। इससे पहले यही लोग और यही अखबार प्रचारित करते थे कि जीएसटी वसूली बढ़ गई या इतनी हुई। इसके जरिये केंद्र सरकार यह प्रचारित करती रही है कि अर्थव्यवस्था की स्थिति बेहतर है और बेहतर हो रही है तभी तो जीएसटी वसूली बढ़ रही है और बेहतर हो रही है। अब सुधार का समर्थन करने के लिए धन्यवाद चाहे स्पष्ट तौर पर औपचारिकता हो, केंद्र सरकार और खासकर नरेन्द्र मोदी की योजना के अनुसार चलने के लिए धन्यवाद दिया गया है और यह पहले पन्ने की खबर बन गई है।

आज मेरे नौ अखबारों में तीन अखबार ही ऐसे हैं जिनमें पहले पन्ने पर जीएसटी से संबंधित कोई खबर नहीं है। हिन्दी में यह देशबन्धु है जो सरकारी खबरें वैसे भी नहीं छापता है। अंग्रेजी अखबारों में द हिन्दू और टाइम्स ऑफ इंडिया है। द हिन्दू में आज कर्नाटक की मतदाता सूची से 5994 नाम फर्जी तरीके से हटाये जाने की की जांच चुनाव आयोग का सहयोग नहीं मिलने के कारण लटके होने की एक दिलचस्प और खोजी खबर है। आज ही राहुल गांधी का एक लेख छपा है जिसमें उन्होंने चुनाव की चोरी को समझाया है। जाहिर है, अखबारों के लिए जब चुनाव चोरी मुद्दा होना चाहिये था तब जीएसटी कम होने के फायदे बताये जा रहे हैं जबकि इन्हीं अखबारों ने पिछले आठ साल में शायद ही कभी यह लिखा, बताया या संकेत दिया हो कि ये टैक्स कम किये जा सकते हैं या किये जाने चाहिये। देश में किसी सरकार को मीडिया के अंध समर्थन का यह अनूठा मामला है। पहले तो समझा जाता था कि यह विज्ञापनों के दम पर हासिल किया गया है लेकिन अब लगता है कि इसमें डराने-धमकाने की वाशिंग मशीन पार्टी की चाल भी हो सकती है। पत्रकारों, संवाददाताओं को डराने धमकाने के ढेरों उदाहरण हैं।

इसके बावजूद स्वतंत्र रूप से खबरें छापने वाले द टेलीग्राफ में आज छपी खबर बताती है कि जीएसटी की दरों में कमी मरीजों के तीमारदारों के लिए बोझ कम होने जैसी है। इसमें बताया गया है कि जीएसटी की दर कम होने से तमाम बीमारियों के उपचार सस्ते होंगे। मोटे तौर पर इसका कारण संबंधित मशीनों पर टैक्स कम होने से उनकी कीमत कम होना है। अखबार ने ऐसी कई मशीनों और उपचारों का विवरण दिया है और बताया है कि जीएसटी के कारण ये मशीनें या उपचार महंगी है और 22 सितंबर से सस्ती होना तीमारदारों के लिए राहत की बात है। इससे आप समझ सकते हैं कि भाजपाई राज्यों के वित्त मंत्रियों का इस मामले में चुप्पी साधे रखना भले सही हो बाकी को धन्यवाद देना क्यों जरूरी था। यह इतना महत्वपूर्ण है कि खबर पहले पन्ने पर छपी-छपवाई गई है। ऐसी ही खबरों में एक खबर आज इंडियन एक्सप्रेस में है। नई दिल्ली डेटलाइन से आँचल मैगजीन और अनिल शशि की बाइलाइन से छपी खबर का शीर्षक है, जीएसटी 2.0: मंत्रिमंडल सचिव ने 22 सितंबर को लागू होने से पहले क्षेत्रीय बाधाओं को दूर करने के लिए बैठक बुलाई। खबर के अनुसार, जीएसटी 2.0 की दरों को युक्तिसंगत बनाने के बाद, ऑटो से लेकर कपड़ा और उर्वरक तक, विभिन्न क्षेत्रों में कार्यान्वयन संबंधी समस्याओं को सुलझाने के लिए, कैबिनेट सचिवालय ने सोमवार को भिन्न मंत्रालयों की एक बैठक बुलाई है। सूत्रों ने बताया कि ऑटो क्षेत्र उन वाहनों पर लगाए गए उपकर (सेस) को समायोजित करने की समस्या से जूझ रहा है जो कारखाने से निकलकर डीलरशिप तक पहुँच चुके हैं, लेकिन उन्हें 22 सितंबर के बाद ही बेचे जाने की संभावना है। तब तक उपकर तकनीकी रूप से समाप्त हो जाएगा। पहले चुकाए जा चुके उपकर को समायोजित करने की समस्या अब गंभीर हो गई है।

साइकिल, ट्रैक्टर और उर्वरक उद्योग के प्रतिनिधियों ने भी उल्टे शुल्क ढांचे की समस्याओं के समाधान के लिए सरकार से संपर्क किया है – जहाँ तैयार माल पर शुल्क उसमें लगने वाले सामान की तुलना में अधिक है। उदाहरण के लिए, कपड़ा और परिधान उद्योग के प्रतिनिधियों ने बिना सिले कपड़ों (5 प्रतिशत) पर 2,500 रुपये प्रति पीस (18 प्रतिशत) और सिले हुए परिधानों पर अलग-अलग जीएसटी दरों के कारण होने वाली विकृति की ओर इशारा किया है। जीएसटी 2.0 के लिए काम करते हुए सरकार ने कृषि वस्तुओं और ट्रैक्टरों पर उल्टे शुल्क ढांचे की विसंगतियों को दूर करने के लिए सचेत रहकर काम किया है। कृषि-ट्रैक्टर उद्योग के लिए, मशीनरी और पुर्जों पर कर की दर को घटाकर 5 प्रतिशत कर दिया गया है, लेकिन कुछ पुर्जे अभी भी अन्य सभी ऑटो पुर्जों के साथ 18 प्रतिशत के स्लैब में हैं। इसी तरह, तैयार साइकिल पर टैक्स कम करके 5 प्रतिशत कर दिया गया है लेकिन कच्चे माल जैसे स्टील और प्लास्टिक पर जीएसटी अभी भी 18 प्रतिशत है। आप समझ सकते हैं कि यह प्रचार के लिए ही कितना आदर्श है – साइकिल पर जीएसटी कम करके पांच प्रतिशत कर दिया गया है। उसमें लगने वाले स्टील और प्लास्टिक पर टैक्स 18 ही प्रतिशत है। ऐसे में दाम कितना कम होगा और दो बार टैक्स नहीं लगेगा का कितना लाभ उपभोक्ता को मिला यह समझने वाली चीज है। दिलचस्प यह भी कि लोग 22 के बाद खरीदारी करने का इंतजार कर रहे हैं और उसपर सेस पहले से वसूला जा चुका है। सरकार चाहे तो ऐसे लोगों को पांच सौ रुपया खर्च करके पांच रुपये वापस दे सकती है। प्रचार उससे भी अच्छा होगा। देखना है ऐसा होता है या नहीं। जब चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था पर सरकारी नियंत्रण और उसकी मनमानी की चर्चा होनी चाहिये तो सरकार ने जीएसटी का मुद्दा इसीलिये छेड़ा है।

उल्लेखनीय है कि भारत में गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (जीएसटी) से संबंधित निर्णय मुख्य रूप से जीएसटी कौंसिल द्वारा लिए जाते हैं। यह एक संवैधानिक निकाय है जो जीएसटी से जुड़े मुद्दों जैसे कर दर, छूट, नियम और नीतियों पर सिफारिशें करता है और निर्णय लेता है। ये सिफारिशें केंद्र और राज्य सरकारों के लिए बाध्यकारी होती हैं। जीएसटी कौंसिल का गठन संविधान के अनुच्छेद 279ए के तहत किया गया है। केंद्रीय वित्त मंत्री इसके अध्यक्ष होते हैं। प्रत्येक राज्य और केंद्र शासित प्रदेश के वित्त या कराधान प्रभारी मंत्री या राज्य सरकार द्वारा नामित कोई अन्य मंत्री इसके सदस्य होते हैं। इसका मुख्य उद्देश्य पूरे देश में जीएसटी से संबंधित नियम, दरें, छूट और नीतियां तय करना है ताकि एक समान कर प्रणाली बनाई जा सके। इसके बावजूद खबरों से ऐसा लग रहा है जैसे सब केंद्र सरकार या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कर या करवा रहे हैं। चुनाव आयोग की जो स्थिति है उससे लगता है कि कर रहे हो सकते हैं पर अखबारों को ऐसे प्रचार करने की कोई जरूरत नहीं है। और अगर प्रधानमंत्री के आदेश-निर्देश से ही जीएसटी कौंसिल संचालित होता है तो खबर यह भी है। लेकिन इस खबर के बिना जो खबरें हैं उससे सरकार का प्रचार ही हो रहा है और जैसा मैंने बताया, कई अखबारों में प्रचार की यह खबर पहले पन्ने पर है। दि एशियन एज में आज की दोनों खबरें हैं। ऊपर, वित्त मंत्री के हवाले से छपा है, जीएसटी ओवरहॉल जनता के लिए सुधार है, सबको फायदा पहुंचायेगा। कल छप चुकी यह खबर यहां आज फिर छपी है, पहले पन्ने पर है इसलिए उल्लेख करना जरूरी है। देश भर में एसआईआर कराने की चुनाव आयोग की तैयारी और इससे संबंधित बैठक खबर भी आज दि एशियन एज में है।

सरकार का प्रचार करने वाली आज की खबरों में अमर उजाला का शीर्षक है, खुद जानिये, कहां कितनी बचत। जीएसटी 2.0 : नई वेबसाइट पर उत्पादों की नई व पुरानी कीमतों की तुलना। यह खबर सोशल मीडिया पोस्ट के हवाले से है। इसमें कहा गया है कि http://savingwithgst.in/ माईगवइंडिया की ओर से शुरू किया गया है। मैं इस साइट को नहीं देख पाया। नवोदय टाइम्स की खबर का शीर्षक है, जीएसटी दरों में कमी से जनता को फायदा। यह खबर केंद्रीय रेलवे, सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव के हवाले से है। यह अपने आप में बहुत खास बात है कि एक केंद्रीय मंत्री को इतनी सामान्य सी सूचना प्रेस को देनी पड़ रही है। सामान्य समझ की यह ‘खबर’ टॉप पर चार कॉलम में मंत्री की फोटो के साथ छपी है जो भाजपा की प्रेस कांफ्रेंस की लग रही है, भारत सरकार की नहीं। स्पष्ट तौर पर यह सब बिहार चुनाव के लिए किये जा रहे प्रयास हैं और भाजपा का प्रचार सरकारी काम के रूप में किया जा रहा है। उसपर सरकारी खर्च व संसाधन लुटाये जा रहे हैं। इसके लिए 1975 में इंदिरा गांधी का चुनाव खारिज हो गया था। भले अभी चुनाव घोषित नहीं हुआ है इसलिए इसे भाजपा का प्रचार नहीं माना जाये लेकिन भाजपा की जगह भारत सरकार क्यों नहीं लिखा है?

आज के अखबारों में जीएसटी के इस प्रचार के अलावा जो दूसरी महत्वपूर्ण खबर है उसका शीर्षक है, अब पूरे देश में एसआईआर कराने की तैयारी। देशबन्धु ने इसे पांच कॉलम में लीड बनाया है। इसका फ्लैग शीर्षक है, चुनाव आयोग ने 10 सितंबर को बुलाई बैठक। यह खबर टाइम्स ऑफ इंडिया में भी है। यहां इसका शीर्षक है, देश भर में एसआईआर कराने के लिए चुनाव आयोग ने 10 सितंबर को बैठक बुलाई। इस बैठक में चुनाव आयोग नागरिकता साबित करने के लिए सुझाये जाने वाले अतिरिक्त दस्तावेजों पर विचार करेगा। मेरे ख्याल से यह मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में भी लंबित है। वैसे भी, मतदाता सूची में नाम के लिए आधार की उपयोगिता और चुनाव आयोग के एतराज तथा इसके मद्देनजर नागरिकता तय करने की उसकी भूमिका पर भी विचार होना चाहिये। इसके बाद ही एसआईआर जैसा अभियान (जो खर्चीला तो है ही, नागरिकों को परेशान करने वाला भी है) देश भर में चलाने का विचार किया जाना चाहिये। टाइम्स ऑफ इंडिया में छपे ‘एजंडा’ के अनुसार, बैठक में ईआरओ की नियुक्ति और प्रशिक्षण पर भी विचार किया जाना है। इसमें राजनीतिक दलों के बीएलए के संबंध में कुछ नहीं है जबकि एसआईआर में उनकी जरूरत महसूस की गई है और वे वेतनभोगी कर्मचारी नहीं होते हैं। इन सब मामलों को निपटाये बगैर देश भर में एसआईआर का कोई मतलब नहीं है खासकर तब जब बिहार में एसआईआर में ढेरों गलतियां है और उसके कारणों व निदान पर किसी चर्चा या उपाय की कोई खबर नहीं है। इस खबर से लगता है कि चुनाव आयोग जल्दी में है और अखबार वाले दुनिया को बताना नहीं चाहते हैं इसलिए महत्वपूर्ण खबर होने पर भी कई अखबारों में इसे प्रमुखता नहीं मिली है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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