त्रिभुवन-
एक अच्छे पत्रकार की छह बुनियादी खूबियाँ होती हैं। एक निर्भीकता यानी fearlessness, तटस्थता यानी neutrality, सत्यनिष्ठा या न्यायनिष्ठा यानी integrity, ईमानदारी यानी honesty, साहसिकता यानी courage और साहित्य संवेग यानी Aesthetic Resonance.
पत्रकार यदि निर्भीक न हो तो जनता की आत्मा खो देता है, यदि तटस्थ न हो तो प्रचारक बन जाता है, यदि सत्यनिष्ठ न हो तो किसी भी ताक़तवर सत्ता-केंद्र का पैरोकार होकर उसके रणनीतिक प्रपंच में फँस जाता है, ईमानदारी न हो तो शोरशराबे में बदल जाता है, यदि साहसिक न हो तो मौन हो जाता है और यदि साहित्य और संस्कृति से उसका जुड़ाव न हो तो वह मनुष्य के हृदय से कटकर केवल आँकड़ों का व्यापारी रह जाता है।
इस आईने में देखें तो मुझे संकर्षण ठाकुर एक बेहतरीन पत्रकार लगते हैं और वे इन मानदंडों पर खरे उतरते दिखते हैं। उनका जाना दु:खद है। ख़ासकर ऐसे समय जब संकर्षण ठाकुर जैसे कोई सौ पत्रकारों की ज़रूरत है। आख़िर वैसी तटस्थ दृष्टि वाले कितने लोग हमारे बीच हैं। हैं तो भी तो कांग्रेस ने प्रचार करके उन्हें अपना प्रवक्ता घोषित कर दिया है। कुछ बेहतरीन लगते थे तो भाजपा की आंधी में उड़कर उसकी पीआर टीम को ही अपनी रिपोर्टिंग से शर्मसार कर रहे हैं।
भारत की पत्रकारिता में साहित्य और पत्रकारिता का रिश्ता जिस बुरी तरह से और जिस हृदयहीनता से सुरेंद्र प्रताप सिंह ने काटकर जो शुरुआत की थी, वह तब से लुढ़कती हुई ऐसे कीचड़ में धंस गई है, जिसे निकाल पाना असंभव-सा है। राजनेताओं से ऐसा व्यामोह और सत्ता के प्रति ऐसी व्याकुलता में उनके बहुतेरे ताक़तवर बने शिष्यों ने उनके बहुत गुणगान कर रखे हैं; लेकिन हक़ीक़त कुछ और ही है। साहित्य और पत्रकारिता का भाषिक रिश्ता भी बना रहता और सुरेंद्र प्रताप सिंह उसे हृदयहीनता से नहीं तोड़ते तो आज हिन्दी में भी जाने कुछ संकर्षण ठाकुर हमारे बीच भी होते।

आज द टेलीग्राफ के फ्रंट पेज पर Devdan Mitra ने बहुत लाजवाब पीस लिखा है : “A pen as plucky as poetic: 4-decade legacy of fearless excellence.
मूल खबर…
निधन : आज की पत्रकारिता के माहौल में ‘टेलीग्राफ’ को ऊंचाई पर पहुँचाना संकर्षण ठाकुर जैसों के बस का ही था!


