अनिल कुमार
उत्तर प्रदेश में भाजपा में नये अध्यक्ष का चयन चंद्रकांता की कहानियों से भी ज्यादा रहस्यमय बन गया है। एक अनार के पीछे सौ लोग बीमार हुए पड़े हैं, लेकिन ये बीरबल की खिचड़ी है कि पक ही नहीं पा रही है। अब नवरात्रि प्रारंभ हो गया है तो दावेदारों को उम्मीद है कि इस बार देवी मां उनके किस्मत के द्वार खोल देंगी। परंतु, उत्तर प्रदेश में भाजपा का अध्यक्ष कब बनेगा, कब घोषित होगा, यह देवी मां को भी नहीं पता है। हां, अध्यक्ष कौन बनेगा यह केवल शीर्ष नेतृत्व को पता है। शीर्ष नेतृत्व के नाम पर भी केवल शीर्ष और नेतृत्व को पता है, बाकी एक्सटेंशन पर चल रहे राष्ट्रीय अध्यक्ष को भी शायद ही पता हो कि यूपी में कौन अध्यक्ष बनेगा?
यूपी के नेता अपनी गोटी की सेटिंग फिट करने के लिये इस दरबार से उस दरबार तक परिक्रमा लगा रहे हैं। समस्त दावेदार इस प्रमुख कुर्सी के लिये मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, गिरिजाघर, भूत-प्रेत-जिन्न, अनुष्ठान, किया-कराया, बंगाली बाबा, डीह बाबा, ब्रह्म बाबा से लेकर साम, दाम, दंड, भेद, दूसरे की थाली में छेद जैसे सारे जतन कर रहे हैं, लेकिन चक्रव्यूह का सातवां दरवाजा है कि टूट ही नहीं रहा है। यूपी भाजपा अध्यक्ष बनने के लिये बेचैनी इतनी है कि दावेदार मंत्री पद तक छोड़ने को तैयार बैठे हुए हैं। दरअसल, मंत्री पद का भौकाल और सत्ता सुख छोड़ने के पीछे कोई भौतिक या सामाजिक विज्ञान नहीं है, बल्कि सीधा कारण अर्थशास्त्र है।
जो भी व्यक्ति भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष बनेगा, उसके नेतृत्व में ही त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव और विधान सभा 2027 का भी चुनाव सम्पन्न होगा। जब चुनाव होगा तो टिकट बांटने और प्रभावित करने की ताकत भी मिलेगी। आरोप लगते ही हैं कि भाजपा में भी अब बसपा की तर्ज पर टिकट और पदों की बिक्री होती है। हालांकि यह कोई ढंका-छुपा रहस्य नहीं रह गया है, क्योंकि ऐसे मामलों में कई आरोप भी सामने आ चुके हैं। फतेहपुर में पैसे लेने के मामले की तो शिकायत ही सार्वजनिक हो गई थी। जिसे जांच के नाम पर लीप पोत दिया गया। मंत्री रहकर नेता अपना अर्थशास्त्र इतना मजबूत नहीं कर सकता है, जितना चुनावी वर्ष में अध्यक्ष बनकर कर सकता है।
लिहाजा, ऐसी परिस्थिति में जो भी उत्तर प्रदेश का अध्यक्ष बनेगा, उसको बहती गंगा में डूबकी लगाने का भरपूर मौका मिलेगा। बहरहाल, अगर दावेदारों की बात करें तो पार्टी चेहरा के साथ जातीय समीकरण भी देखेगी, क्योंकि उसी के नेतृत्व में 2027 के विधानसभा चुनाव भी सम्पन्न होंगे। अभी जो राजनीतिक हालात बने हुए हैं, उसमें अखिलेश यादव के पीडीए का नारा भाजपा के लिये बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। गलत टिकट वितरण एवं अखिलेश यादव के पीडीए के नारे ने 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को यूपी में बड़ा झटका दे चुका है। लिहाजा भाजपा का शीर्ष और नेतृत्व इस बात से भी वाकिफ है। इसी के हिसाब से अध्यक्ष भी तय होगा।
सबसे ज्यादा प्रबल संभावना किसी पिछड़े नेता के अध्यक्ष बनने की है। पिछड़े नेताओं में दावेदारों की बात करें तो पूर्व अध्यक्षद्वय एवं प्रदेश सरकार में मंत्री केशव प्रसाद मौर्य एवं स्वतंत्र देव सिंह अपनी तरफ से पूरा प्रयास कर रहे हैं। पशुधन मंत्री धर्मपाल सिंह, केंद्रीय मंत्री बीएल वर्मा, राज्यसभा सांसद अमरपाल मौर्य, प्रदेश महामंत्री अनूप गुप्ता भी तगड़े दावेदार हैं। इन सब से इतर वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह चौधरी भी इसी पद पर बने रहने के लिये अपने सारे घोड़े खोल रखे हैं। लोकसभा के बाद वह विधानसभा चुनाव भी अपने नेतृत्व में कराना चाहते हैं। भूपेंद्र चौधरी की जोरदार पैरवी अटल जी के नजदीकी रहे ब्रजेश पाठक कर रहे हैं।
हालांकि भूपेंद्र सिंह चौधरी के लिये इस बार राह इतनी आसान होने वाली नहीं है। उनके नेतृत्व में भाजपा लोकसभा चुनाव में पार्टी मुंह का खा चुकी है। भाजपा की शर्मनाक हार के बाद केवल आठ-दस विधानसभा सीटों पर प्रभाव रखने वाले जाट कम्युनिटी की बजाय ज्यादा प्रभावी पिछड़े वर्ग के किसी नेता की ताजपोशी ही संभावित है। वैसे, भी भूपेंद्र चौधरी को लोकसभा चुनाव में जीत दिलाने से ज्यादा योगी आदित्यनाथ का विरोधी होने की वजह से अध्यक्ष बनाया गया था। वह योगी को असहज करने के प्रयास में उतने सफल नहीं हो पाये, जितना बनाने वालों ने उम्मीद की थी। लिहाजा वापसी मुश्किल है। कोई तंत्र-मंत्र काम कर जाये तो अलग बात है।
पिछड़ों के बाद दूसरी दावेदारी ब्राह्मण नेताओं की है। भाजपा अध्यक्ष पद को यूपी में ब्राह्मण ही सबसे ज्यादा बार सुशोभित किया है। यह भी सरकार से अक्सर ही नाराज रहने वाला वर्ग है, लिहाजा इनकी दावेदारी सबसे मजबूत मानी जा रही है। अध्यक्ष पद के दमदार नामों में पूर्व उप मुख्यमंत्री डा.दिनेश शर्मा, पूर्व सांसद हरीश द्विवेदी, डा.महेश शर्मा शामिल हैं। हालांकि ब्रजेश पाठक और जितिन प्रसाद भी चौंका सकते हैं। अंदरखाने खबर है कि इन दोनों नेताओं ने भी अपने घोड़े खोल रखे हैं। हर वर्ग में लोकप्रिय बृजेश पाठक मजबूत अध्यक्ष साबित हो सकते हैं, लेकिन उनकी राह में सबसे बड़ा अड़ंगा नया राष्ट्रीय अध्यक्ष की कुर्सी संभालने वाला साबित हो सकता है।
दरअसल, उपराष्ट्रपति पद पर सीपी राधाकृष्णन जैसे पिछड़े नेता की नियुक्ति के बाद सबसे प्रबल संभावना है कि जेपी नड्डा की जगह किसी अन्य ब्राह्मण चेहरे को ही राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया जायेगा, क्योंकि प्रधानमंत्री पद पर पिछड़ा एवं राष्ट्रपति पद पर दलित समुदाय का प्रतिनिधित्व है। ऐसे स्वभाविक दावेदारी ब्राह्मण की ही बनती है। अगर शीर्ष नेतृत्व धर्मेंद्र प्रधान, भूपेंद्र यादव, मनोहरलाल खट्टर या शिवराज सिंह चौहान जैसे किसी पिछड़े नेता को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाता है तो फिर यूपी का अध्यक्ष ब्राह्मण ही होगा, यह तय बात है। इन दोनों परिस्थितियों में हरीश द्विवेदी, डा.महेश शर्मा एवं ब्रजेश पाठक मजबूत दावेदार हो सकते हैं। यह तीनों योगी विरोधी खेमे के चहेते लीडर हैं।
भाजपा ने अब तक यूपी में किसी दलित को अध्यक्ष नहीं बनाया है। अध्यक्ष पद अगड़ों एवं पिछड़ों के बीच बंटता रहा है। भाजपा के यूपी में अब तक बने पंद्रह अध्यक्षों में सात बार नेतृत्व ब्राह्मणों के हाथ में रहा है। कलराज मिश्रा दो टर्म अध्यक्ष रहे हैं। इनके अलावा माधो प्रसाद त्रिपाठी, केशरीनाथ त्रिपाठी, रमापति त्रिपाठी, डा.लक्ष्मीकांत बाजपेयी एवं डा.महेंद्रनाथ पांडेय अध्यक्ष रहे हैं। ब्राह्मण के बाद भाजपा अध्यक्ष पिछड़ों के पास छह बार रहा है, जिसमें कल्याण सिंह, ओम प्रकाश सिंह, विनय कटियार, केशव प्रसाद मौर्य, स्वतंत्र देव सिंह एवं भूपेंद्र चौधरी शामिल हैं। एक बार क्षत्रिय वर्ग के राजनाथ सिंह एवं भूमिहार वर्ग के सूर्य प्रताप शाही भी अध्यक्ष रहे हैं।
भाजपा के अध्यक्ष पद पर दलितों का खाता नहीं खुला है। जाटव छोड़कर दलितों का कई वर्ग लंबे समय से भाजपा के साथ मजबूती से जुड़ा हुआ है, शायद इसीलिये भाजपा की नजर उस तरफ नहीं जाती है। जैसे कायस्थ भाजपा के अलावा कहीं नहीं जाता, नाराज भी नहीं होता है, इसलिये उस वर्ग के लोगों को प्रतिनिधित्व देने में भाजपा को संकोच होता है। भाजपा से जुड़े दलित समुदाय भी नाराज नहीं होता है या फिर वो पिछड़ों की तरह दूसरे दलों की तरफ शिफ्ट नहीं करता, शायद इसीलिये भाजपा को दलित नेतृत्व की जरूरत नहीं पड़ती है। वैसे, बात करें दलित नेताओं की तो विद्यासागर सोनकर एवं राम शंकर कठेरिया भी दावेदारों की लिस्ट में शामिल हैं।
अब भाजपा यूपी में किसे अपना अध्यक्ष बनाती है, यह तो शीर्ष और नेतृत्व तय करेगा, लेकिन नवरात्रि शुरू होते सबकी उम्मीदें एक बार फिर परवान चढ़ गई हैं। चर्चा है कि नवरात्रि में ही यूपी में कैबिनेट विस्तार भी होने वाला है। कुछ मंत्री हटाये जायेंगे, कुछ नये बनाये जायेंगे, कुछ सरकार से संगठन में जायेंगे, कुछ संगठन से सरकार में जायेंगे। इसलिये अध्यक्ष पद के दावेदारों की भी धुकधुकी बढ़ी हुई है। तंत्र-मंत्र, जादू-टोना सब चल रहा है। कार्यकर्ताओं के साथ विपक्ष को भी इंतजार है कि सूबे के भाजपाई अध्यक्ष पद की खिचड़ी कब पकती है? अगर नवरात्रि में भी यूपी का अध्यक्ष घोषित नहीं हो पाया तो फिर संभावना है कि यूपी भाजपा को नया अध्यक्ष बिहार चुनाव के बाद ही हाथ लगे।


