सोनम वांगचुक के एनजीओ पर गृह मंत्रालय की आपत्ति सुनकर लोग चौंक गए। अब जलवायु परिवर्तन, ऑर्गेनिक खेती और युवाओं को जागरूक करने वाले प्रोजेक्ट भी “राष्ट्रहित के खिलाफ” माने जाने लगे हैं। मंत्रालय ने कहा कि “देश की संप्रभुता पर स्टडी” कराने के लिए विदेशी चंदा लेना एफसीआरए कानून का उल्लंघन है। नीचे पढ़ें….

साकेत गोखले-
गृह मंत्रालय की हास्यास्पद हरकत। कल, गृह मंत्रालय ने लद्दाख के सोनम वांगचुक की एनजीओ का FCRA लाइसेंस रद्द कर दिया।
अब रद्द करने के आदेश के पेज 3 को देखें, तो पता चलता है कि सरकार ने कितनी लापरवाही की है?
वांगचुक के एनजीओ ने कहा कि उन्हें “खाद्य सुरक्षा और संप्रभुता” (food security & sovereignty) के बारे में जागरूकता के लिए दान मिला।
“खाद्य संप्रभुता” का मतलब है कि जो लोग खाद्यान्न पैदा करते, वितरित करते और उपयोग करते हैं, वे खेती और वितरण की नीतियों को नियंत्रित करें।
और गृह मंत्रालय के “अफसरों” ने क्या किया?
उन्होंने “खाद्य सुरक्षा और संप्रभुता” को “भारत की संप्रभुता पर अध्ययन” (study on sovereignty of India) बना दिया। यह पूरी तरह बेतुका है। बिल्कुल बकवास।

बदले की भावना ऐसे ही काम करती है। एनजीओ ने “खाद्य संप्रभुता” की बात की, लेकिन मोदी सरकार ने इसे “भारत की संप्रभुता” में बदलकर उनका FCRA लाइसेंस रद्द कर दिया।
यहां तक कि एक स्कूल का बच्चा भी समझ सकता है कि “खाद्य संप्रभुता” को “राष्ट्र की संप्रभुता” समझना कितना अविवेक पूर्ण है।
लेखक तृणमूल कांग्रेस के राज्यसभा सांसद हैं।
सुरेंद्र तंवर-
ये गधे विकास की अधिकार आधारित अवधारणा को क्या समझेंगे जिसमें मूलभूत आवश्यकताओं को संप्रभुता से ही संबोधित किया जाता है। “It’s the vocabulary of Right Besed Development.” इसे नोबेल पुरस्कार प्राप्त अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने गढ़ा है। वे इसे नागरिकों का “Entitlment” कहते हैं।
ये 5 किलो मुफ़्त अनाज योजना चलाने वाले मूर्ख लोग हैं जो आज भी 18वीं सदी में जी रहे हैं। पढ़ने लिखने से तो इनका कोई नाता रहा नहीं है। अतः संप्रभुता को देश की संप्रभुता से इतर कैसे देख सकते हैं।


