मनीष दुबे-
भारतीय न्यूज़ चैनल्स इन दिनों मानो कॉस्मेटिक सर्जरी के दौर से गुजर रहे हैं। एक तरफ़ NDTV है, जिसने अपनी तीन दशक पुरानी पहचान को नया जामा पहनाकर NDTV Good Times लॉन्च किया है। दूसरी तरफ़ जी न्यूज है, जिसने विज़ुअल पहचान और हाई-टेक स्टूडियो के सहारे खुद को रीब्रांड किया है। दोनों की रणनीति साफ़ है—बदलते दर्शकों को यह जताना कि वे अब पुराने नहीं रहे, बल्कि नए दौर के मुताबिक़ “फ्यूचर-रेडी” हो चुके हैं।
लेकिन असली सवाल यही है—क्या ये चमकदार कॉन्सर्ट्स, विज़ुअल ग्राफिक्स और डेटा वॉल्स उस भरोसे को लौटा पाएंगे, जो पिछले सालों में लगातार दरकता गया है?
NDTV Good Times: न्यूज़ से इवेंट मैनेजमेंट तक का सफ़र
NDTV ने अपने ब्रांड को सिर्फ़ स्क्रीन से बाहर निकालकर ज़मीन पर उतारने का फैसला किया है। अब मंच पर रहमान, घाटों पर सोनू निगम, डल झील पर श्रद्धांजलि कॉन्सर्ट और बॉलीवुड से लेकर इंडी-पॉप तक के सितारे NDTV के बैनर तले नज़र आएंगे। कंपनी का दावा है कि यह सिर्फ़ म्यूज़िक या इवेंट नहीं, बल्कि “लाइव कल्चर” है—दर्शकों से गहरा जुड़ाव बनाने का नया रास्ता।
लेकिन दर्शकों के मन में सवाल वही है—क्या म्यूज़िक और शोबिज़ का यह तड़का, न्यूज़ कवरेज में खोई हुई धार और निष्पक्षता की कमी को छुपा पाएगा?
जी न्यूज: मेकओवर या मिराज?
जी न्यूज ने अपने नए स्टूडियो और विज़ुअल आइडेंटिटी को “भविष्य की पत्रकारिता” बताकर पेश किया। लाल-पीले रंगों की जगह लाल-नीले-सफेद कॉम्बिनेशन, हाई-टेक कैमरा सेटअप, डेटा विज़ुअलाइज़ेशन, और ऑगमेंटेड रियलिटी टूल्स के साथ चैनल ने कहा कि अब कहानियां और साफ़, और इंटरैक्टिव होंगी।
संपादकीय स्तर पर भी गेस्ट एडिटर, एडिटर ऑफ द डे, और डेटा-आधारित स्टोरीटेलिंग का वादा किया गया। लेकिन दर्शकों को यह भी याद है कि पिछले एक दशक में चैनल की पहचान न्यूज़ से ज़्यादा प्रोपेगैंडा से बनी। ऐसे में सवाल उठता है—क्या नया सेट और चमकदार ग्राफिक्स कंटेंट की पुरानी कमियों पर पर्दा डाल सकते हैं?
दोनों चैनलों की चुनौती: खोया भरोसा, गिरती साख
NDTV और जी न्यूज, दोनों ही चैनल एक दौर में टीवी न्यूज़ की दिशा तय करते थे। NDTV अपनी गंभीर पत्रकारिता और जी न्यूज अपनी आक्रामक रिपोर्टिंग के लिए पहचाने जाते थे। लेकिन पिछले कुछ सालों में हालात पलट गए—
- NDTV पर “पहचान खोने” और निवेशकों के दबाव में अपनी स्वतंत्रता गंवाने के आरोप लगे।
- जी न्यूज की छवि पक्षपाती एंकरिंग और शोर-शराबे वाली डिबेट्स में फँसकर रसातल में जाती दिखी।
- यही वजह है कि अब दोनों चैनल कॉस्मेटिक बदलावों से अपने ब्रांड को बचाने की कोशिश कर रहे हैं।
लेकिन साख कब लौटेगी?
चमकदार स्टूडियो, बड़े कॉन्सर्ट और रंगीन लोगो दर्शकों को शुरुआती तौर पर लुभा सकते हैं। लेकिन पत्रकारिता की रीढ़—विश्वसनीयता और निष्पक्षता—अगर मज़बूत नहीं हुई तो यह सब केवल पैकेजिंग बनकर रह जाएगा। आज के दर्शक शोर-शराबे से ज़्यादा तथ्य चाहते हैं, प्रचार से ज़्यादा संदर्भ चाहते हैं और एंटरटेनमेंट की आड़ में न्यूज़ की अवमानना नहीं चाहते।
असलियत यही है:
NDTV और जी न्यूज दोनों के लिए यह अंतिम इम्तिहान है। अगर यह बदलाव सिर्फ़ “कॉर्पोरेट इवेंट्स और हाई-टेक साउंड एंड लाइट शो” तक सीमित रहा, तो उनकी गिरती साख वापस नहीं आएगी। साख लौटाने का रास्ता केवल एक है—ईमानदार, तथ्यपरक और जनता से जुड़ी पत्रकारिता।



Subodh
September 29, 2025 at 2:07 pm
मनीष जी आपको NDTV की फिक्र करने की जरूरत नहीं है, चंद दिनों में ही मैने इसे उस मुकाम तक पहुंचा दिया जहां बड़े बड़े तीसमरखान फेल हो रहे थे, आगे आगे देखिए
bhadasdesk
September 29, 2025 at 2:51 pm
अच्छी बात है सुबोध जी, आगे बढ़ते रहिए। पर आपके इस छोटे से ही सेंटेंस में दो जगह गलतियां हैं। पहली- मैने नहीं मैंने और तीसमारखान नहीं तीसमारखां