सुशोभित-
शुरुआत यहाँ से हुई कि “ख़ून और पानी साथ-साथ नहीं बह सकता!” इतना कहकर सिंधु नदी के पानी की नाकेबंदी कर दी गई। लेकिन, धन के प्रवाह को रोक पाना सम्भव नहीं था। इसलिए भारत द्वारा पाकिस्तान के घोषित बहिष्कार के बावजूद भारतीय टीम न केवल एशिया कप में पाकिस्तान से तीन मैच खेली, बल्कि विशिष्ट पूँजीवादी शैली में वो तीनों मैच रविवार के दिन आयोजित किए गए। बाज़ार के सामने थोथा राष्ट्रवाद लाचार होकर खीसें निपोरता रहा।
भारत के लोगों ने शुरू में यह लुंजपुंज-सा प्रण लिया कि सरकार चाहे जो फ़ैसला ले, हम पाकिस्तान के साथ क्रिकेट मैच नहीं देखेंगे। पहला मैच बहुतेरों ने नहीं देखा या आँख दबाकर देखा। बाज़ार मुस्कराया। उसने कहा, “देखता हूँ तुम कब तक भारत-पाकिस्तान का मैच नहीं देखोगे!” अन्तत:, फ़ाइनल भारत-पाकिस्तान के बीच हुआ। वे ही दर्शक मैच देखने उमड़ पड़े। किसी ने किसी को अपने कुछ दिनों पहले के खण्डित-संकल्प की याद नहीं दिलाई। स्नानागार में सभी निर्वस्त्र थे!
खिताबी मुक़ाबला काँटे का था और उसमें कोई भी जीत सकता था। पाकिस्तान ने अंत में दो-तीन गेंदें सही डाली होतीं तो यह जीत पाकिस्तान के हिस्से में भी जा सकती थी। इसके बावजूद जब भारत जीता तो भारत के नेता ने- आश्चर्यजनक रूप से- सोशल मीडिया पर लिखा कि “हमने पाकिस्तान को युद्धभूमि के साथ ही क्रिकेट के मैदान में भी परास्त कर दिया!” नेता को पता था कि भारत के लोग उनसे कभी प्रतिप्रश्न नहीं करेंगे, वो जो चाहे बोल सकते हैं। राजा को अपनी प्रजा का हाल पता होता है!
तो क्या खेल का मैदान युद्धभूमि होता है? और अगर पाकिस्तान फ़ाइनल मैच जीत जाता तो क्या यह उसी तरह से भारत-राष्ट्र की पराजय मानी जाती, जैसे जीतने पर इसे विजय घोषित किया गया है? और क्या, मई के महीने में भारत-पाकिस्तान के बीच तीन दिनों की जो सैन्य भिड़ंत हुई थी, उसमें भारत की जीत हुई थी? जहाँ तक मेरी जानकारी है, वह लड़ाई युद्धविराम पर समाप्त हुई थी और युद्धविराम की घोषणा भारत और पाकिस्तान ने नहीं, किसी तीसरे देश ने की थी। अब जीत की घोषणाएँ दोनों ही मुल्क कर रहे हैं। दोनों तो जीत नहीं सकते, फिर सच कौन बोल रहा है?

पाकिस्तान ने दावा किया कि उसने भारत के छह जेट मार गिराए। भारत के सीडीएस ने भी स्वीकारा कि हमने अपने कुछ जेट्स खोए। लेकिन कितने? कोई पुष्टि नहीं, कोई पारदर्शिता नहीं, क्षति की कोई जिम्मेदारी नहीं। केवल जुमलेबाज़ी। बात केवल युद्ध की ही नहीं है, सरकार ने कभी यह भी नहीं बताया कि कोविड में कितने लोग मरे, नोटबंदी से कालेधन और आतंकवाद का अंत हुआ या नहीं, कुम्भ में कितनी भगदड़ें हुईं, इलेक्टोरल बॉन्ड में किससे, कितना चंदा मिला, वोटचोरी के आरोप सही हैं या ग़लत। कोई पारदर्शिता नहीं, कोई जिम्मेदारी नहीं। केवल जुमलेबाज़ी!
यूएन के मंच पर पाकिस्तान के नेता ने कहा कि हमने पहलगाम हमले की स्वतंत्र, अंतरराष्ट्रीय जाँच कराने की माँग की थी, लेकिन इस माँग को माना नहीं जाकर बिना प्रमाण दिए ही हम पर हमला बोल दिया गया। भारत के नेता इसका जवाब देने के लिए यूएन में मौजूद नहीं थे। क्यों नहीं थे?
फिर क्रिकेट के बाज़ार के सम्मुख बेचारगी से नतमस्तक होने के बावजूद थोथी राष्ट्रवादी नौटंकियाँ- कि हम हाथ ना मिलाएंगे, पीसीबी चीफ़ से ट्रॉफ़ी स्वीकार नहीं करेंगे। ऐसा छुआछूत का भाव मन में था तो फिर खेले ही क्यों थे? पाकिस्तान को तो उपविजेता के रूप में इनामी राशि मिल गई। टीवी-प्रदर्शन अधिकारों से पीसीबी ने भी जमकर पैसा कमा लिया। नतीजा क्या निकला? ख़ून के साथ बहने वाले पानी में शर्म भी बह गई!
श्रीकान्त वर्मा ने कहा था- ‘कोसल में विचारों की बहुत कमी है।’ कोसल का तो पता नहीं, भारत का बता सकता हूँ- भारत के इतिहास में सामूहिक मूढ़ता और सार्वभौमिक विचारहीनता का ऐसा घटाटोप इससे पहले कभी ना था!


