Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

प्रिंट

आज के अखबार : एसआईआर, सरकार के खिलाफ जनहित की खबरों पर संपादक/मालिक एकमत नहीं

एसआईआर के नाम पर नंगई के साथ हेडलाइन मैनेजमेंट का खोखलापन भी सामने गया

संजय कुमार सिंह

आज मेरे नौ में से आठ अखबारों की लीड अलग है यानी नौ अखबारों की लीड आठ खबरें। दो अखबारों की लीड एक खबर है। इनमें एक हिन्दी का और दूसरा अंग्रेजी का है। इसलिए मामला हिन्दी अंग्रेजी का भी नहीं है। मामला स्पष्ट तौर से सरकार का समर्थन और विरोध से जुड़ा हुआ है। यह संपादकीय आजादी का मामला नहीं है। जनसत्ता में ऐसा होता था और हमलोग अखबार देखकर समझ जाते थे या बता सकते थे कि किस दिन का अखबार किसने बनाया होगा। उस लिहाज से आज जो खबर दो अखबारों में लीड है वह क्यों होगी, समझा जा सकता है लेकिन बाकी अखबारों या संपादकों के लीड के चयन में खोट का कारण उनका सरकार समर्थक होना भी हो सकता है। संपादकीय या पत्रकारीय स्वतंत्रता के लिहाज से ऐसे अखबारों को खुद बताना चाहिए कि वे सरकार समर्थक या प्रचारक हैं। वे नहीं बताएं तो सरकार को बताना चाहिए और पाठकों को पता होना तो जरूरी है ही। खासकर इसलिए कि मौजूदा सरकार और उसके मुखिया इमरजेंसी के विरोधी हैं और उनके समर्थकों – प्रशंसकों ने हाल तक इमरजेंसी पर किताबें लिखी है और मीडिया की स्वतंत्रता के मामले में अभी हालत पहले से कहीं बुरी है। यह सब जबरन नहीं कराया जा रहा हो तथा संपादकों मालिकों ने स्वेच्छा से समर्पण कर दिया हो तब भी गलत है। खबरों की परिभाषा तय हो, संपादकीय नीयत सही हो और निर्णय की स्वतंत्रता हो तो एक ही खबर का सभी अखबारों में लीड होना मुमकिन है। ऐसा होता भी हैं और मैंने उन पर भी लिखा है। तब मेरा मानना होता है कि सभी संपादक एक ही गुरू के चेले हैं या सभी संपादकों मालिकों को कोई एक व्यक्ति निर्देश देता है। सबका निर्णय अलग होने का मतलब अराजकता भी है और इसकी आशंका ज्यादा है क्योंकि ऐसा तब होता है जब किसी सरकार विरोधी खबर को स्पष्ट रूप से लीड बनाया जाना चाहिए, उसमें कोई विवाद नहीं है।

आज की इस खबर पर आने से पहले बता दूं कि यह ऐसी खबर है जो सर्वसम्मत लीड होनी चाहिए थी। यह खबर मेरे नौ में से दो ही अखबारों में लीड है। एक का तो सरकार विरोधी या निष्पक्ष रुख सर्वविदित है लेकिन दूसरे से संबंधित एक घटना के आधार पर कहा जा सकता है कि मालिकान दबाव में हैं या होंगे लेकिन संपादकीय कर्मी अपनी स्वतंत्रता और विवेक का सही उपयोग कर पा रहे हैं या किन्हीं कारणों से कर रहे हैं। खबर बताने से पहले यह भी बता दूं कि सुप्रीम कोर्ट से संबंधित वह खबर नवोदय टाइम्स, अमर उजाला  में पहले पन्ने पर नहीं है, देशबन्धु में पांच कॉलम की लीड है। दि एशियन एज में सिंगल कॉलम में है, टेलीग्राफ में सेकेंड लीड है। इंडियन एक्सप्रेस में सिंगल कॉलम में है, टाइम्स ऑफ इंडिया में सेकेंड लीड है। हालांकि यहां जो खबर लीड है वह और उसका शीर्षक सरकार की सेवा करता दिख रहा है। मामला जहरीली दवाई कोल्डरिफ का है और यह खबर पहले छप चुकी है कि इस दवा का निर्माण तमिलनाडु में होता है। देश में जहरीली दवा बन और बिक रही थी तथा इसके जहरीले होने का पता दिसंबर जनवरी में उज्बेकिस्तान में 18 बच्चों की मौत से चल गया था लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई और दवाई बिकती रही। भारत में जब मौत के मामले सामने आए तो कार्रवाई दवा लिखने वाले डॉक्टर पर दूसरे ‘अपराध’ में हुई। इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों कर्मचारियों पर कार्रवाई की खबर नहीं है। मामला केंद्र सरकार के नियंत्रण में काम करने वाले औषधि महानियंत्रक से संबंधित है और इलेक्टोरल बांड के खुलासों से पता चला था कि सरकार को दवा बनाने वाली कंपनियों ने भी चंदा दिया है।

इन परिस्थितियों में भाजपा सरकार को तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव लड़ना है। कोशिश स्पष्ट और सर्वविदित है। इसी कारण अभिनेता से नेता बने विजय की रैली में भगदड़ से मौते हुईं तो खबर दिल्ली के अखबारों में हफ्ते भर छपती रही। लेकिन जहरीली दवाई से मौत के मामले छिपाए, दबाए गए भिन्न तरीकों से संख्या कम छापी गई है और देश भर में या कोल्डरिफ से मरने वालों की संख्या एक साथ नहीं छापी गई। इन सब और दूसरे कारणों से जहरीली दवा की खबर दिल्ली के अखबारों में पिट गई। दवा बनाने वाला कारखाना तमिलनाडु में है तब भी। संभवतः इसलिए कि मामला अंततः तो औषधि महानियंत्रक से संबंधित है और राज्य सरकार को अगर कुछ करना भी हो तो वह सीमित है। राज्य सरकार ने अगर भगदड़  में अपना काम सही किया है तो नकली दवा की शिकायत पर भी किया ही होगा या उसके अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई अभी भी की जानी चाहिए। खबर तो बन ही जाएगी। लेकिन चुनाव जब कहानियों और नैरेटिव पर लड़े जाते हैं, पाकिस्तान से युद्ध को ऑपरेशन सिन्दूर कहा जाता है, ट्रम्प के कहने पर युद्धविराम हो जाता है और उसके झूठे होने की बात नहीं की जाती है। इसलिए टाइम्स ऑफ इंडिया का शीर्षक जो कहानी या नैरेटिव बना सकता है उसे समझना मुश्किल नहीं है। हिन्दी में यह शीर्षक, तमिलनाडु में बेलगाम, अनियंत्रित या जांच मुक्त कंपनी ने 14 साल तक जहरीली दवा (सिरप) बनाई। कहने की जरूरत नहीं है कि इसमें यह बताने पर जोर दिया गया है कि कंपनी तमिलनाडु में है, जहां चुनाव होने हैं, भाजपा सरकार में नहीं है या डबल इंजन की सरकार नहीं है। मुझे नहीं पता हिन्दी पट्टी की यह चुनावी चाल दक्षिण भारत में कितना कामयाब रहेगी लेकिन शीर्षक निश्चित रूप से ध्यान खींचने वाला है। वैसे भी, ना खाउंगा ना खाने दूंगा, 2014 के बाद लागू हुआ है और भ्रष्टाचार उसके बाद ही रुके हैं, वहीं रुके होने का दावा किया गया है जहां डबल इंजन की सरकार है। तमिलनाडु की बात तो निश्चित रूप से अलग है। दिलचस्प यह भी कि 2जी घोटाले में कुछ नहीं मिला पर कांग्रेस सरकार भ्रष्ट थी। राफेल सौदे की जांच नहीं हुई लेकिन मोदी सरकार पर भ्रष्टाचार के दाग नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट इतना स्वतंत्र है कि वकील मुख्य न्यायाधीश पर जूता फेंक दे, प्रधानमंत्री को निन्दा करने में घंटों लगे सरकार का प्रिय मीडिया उन्हें मंच और माइक दे। एसआईआर की आलोचना से बचता रहे।

आज जो खबर सभी अखबारों में किसी न किसी रूप में लीड हो सकती थी वह हिन्दू और देशबन्धु में लीड है। देशबन्धु का पहले बता चुका हूं। द हिन्दू में यह पांच कॉलम में लीड है। शीर्षक है – सुप्रीम कोर्ट से चुनाव आयोग ने कहा, बिहार की अंतिम मतदाता सूची में जोड़े गए नाम के बारे में बताइए। सर्वोच्च अदालत ने कहा है कि अंतिम सूची में शामिल किए गए नामों को लेकर भ्रम है क्या ये मसौदा सूची से हटाए गए नाम हैं, यह भी पूछा है कि उनके अधिकार में सहायता के लिए क्या चुनाव आयोग ने हटाए गए मतदाताओ को इस आशय की सूचना दी थी चुनाव आयोग ने कहा है कि उसके पास अभी तक हटाए जाने को लेकर कोई शिकायत नहीं है। कहने की जरूरत नहीं है कि बिहार में चुनाव और एसआईआर को लेकर जो सब हुआ और चल रहा है उसमें चुनाव की घोषणा और चुनाव आयोग का यह दाव पर्याप्त महत्वपूर्ण हैं। खासकर तब जब यह सूचना आई थी कि भाजपा ने मुसलमानों के नाम हटवाने की कोशिश की। चुनाव आयोग की निष्पक्षता से संबंधित कई और सवाल है तथा मुख्य चुनाव आयुक्त समाजवादी पार्टी की शिकायत और शपथपत्र के मामले में सार्वजनिक रूप से झूठ बोल चुके हैं और जवाब का तो पता ही नहीं है। ऐसे में आज यह खबर पर्याप्त महत्वपूर्ण है और निर्विवाद रूप से लीड होनी चाहिए थी जो सरकार की सेवा में सिंगल कॉलम में निपटा दी गई है या पहले पन्ने पर है ही नहीं।

आइए अब आज की लीड भी देख लें। टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड जैसी खबरों से पता चलता है कि किस खबर को दबाने के लिए कौन सी खबर गढ़ी गई है। इंडियन एक्सप्रेस की लीड अफगानिस्तान के बगरम हवाई अड्डे पर अमेरिकी कब्जे के खिलाफ भारत के तालिबान, पाकिस्तान और चीन के साथ होने की खबर है। बताया गया है कि इसके जरिए ट्रम्प की कोशिशें नाकाम कर दी गई हैं और संयुक्त बयान में कहा गया है कि अफगानिस्तान में सैनिक संरचना तैनात करने की कोशिश अस्वीकार्य है। द टेलीग्राफ की लीड पश्चिम बंगाल के उत्तर में तेज बारिश और बाढ़ से राहत की खबरें हैं। द एशियन एज की लीड है, मोदी ने पुतिन को फोन किया, रणनीतिक संबंधों को मजबूत करने के लिए तैयार। नवोदय टाइम्स की लीड का शीर्षक है, आईपीएस वाई पूरन कुमार ने खुद को गोली मार ली, मौत हो गई है। पूरन कुमार की पत्नी आईएएस हैं और हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी के साथ जापान के आधिकारिक दौरे पर हैं। मुझे इस खबर को लीड बनाने का कोई कारण नहीं दिखता है। हालांकि, इसमें प्रसार क्षेत्र का भी ख्याल रखने का रिवाज है। वरना पुतिन को पीएम के फोन और अमेरिका के कथित दोहरे मापदंड पर खबर यहां भी है। अमर उजाला की लीड हिमाचल में हादसा है। खबर के अनुसार बस पर पहाड़ का मलबा गिरने से 15 जनों की मौत हो गई है। कहने की जरूरत नहीं है कि बिहार में एसआईआर पर रिपोर्टर्स कलेक्टिव की अच्छी खबरें आ रही हैं। प्रचारकों ने इसकी चर्चा कभी पहले पन्ने पर नहीं की है। पहले अंग्रेजी की रिपोर्ट को हिन्दी में छापने के लिए अनुवाद का झंझट होता था लेकिन अब वह भी नहीं रहा और बहुत आसानी से अंग्रजी की रिपोर्ट के खास अंश हिन्दी में छापे जा सकते हैं। लेकिन रेल परियोजनाओं को ‘मंजूरी’ का प्रचार करने से जगह बचे तब ना।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन