
बिहार के पहले चरण में रिकॉर्ड मतदान की खबरों के बीच यह सवाल ज़रूरी है कि यह लोकतंत्र की जीत का उत्सव है या उसके संचालन का प्रदर्शन। अखबारों में एक जैसी सुर्खियाँ, स्पेशल ट्रेन से पहुँचे मतदाता और साख बचाने की कवायद — इन सबको अलग-अलग रखने का मकसद मतदान प्रबंधन को ही लोकतांत्रिक उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करना है।
संजय कुमार सिंह
आज मेरे नौ में से आठ अखबारों की लीड बिहार में रिकार्ड मतदान है। देश के एक राज्य में पहले चरण का मतदान इतना महत्वपूर्ण नहीं हुआ करता था कि राजधानी दिल्ली के अखबारों में लीड बने। एक-दो में नहीं, ज्यादातर में। इसका कारण है और वह यह कि इस बार बिहार का मामला अलग है। हालांकि नवोदय टाइम्स के उपशीर्षक के अनुसार, चुनाव आयोग ने कहा, और बढ़ सकता है फाइनल आंकड़ा। आप जानते हैं कि वोट चोरी और चुनाव चोरी की पोल खुलने के बाद का यह पहला चुनाव है। हरियाणा चुनाव चोरी की पोल ऐन मतदान से पहले खोली गई और असर होने की संभावना के मद्देनजर उसका भी डर होगा। हालांकि, इस खुलासे को बेअसर करने के प्रयास कम नहीं हुए हैं और वह अलग मुद्दा है। ऐसे में भाजपा की राजनीति, मीडिया मैनेजमेंट और प्रचारकों-संपादकों के सहयोग से बिहार चुनाव को महत्वपूर्ण बनाया गया है। प्रयास जारी है जो आज स्पष्ट दिख रहा है। कहने की जरूरत नहीं है कि भाजपा संगठन, आरएसएस का सहयोग और फिर अमित शाह की चाणक्य नीति, 2014 में प्रशांत किशोर के सहयोग (या सेवा) के साथ प्रधानमंत्री के निरंतर प्रयास, उनके भाजपा के प्रचार मंत्री बने रहने की हद और उनके स्तर आदि को भाजपा की जीत का कारण बताया जाता रहा है। स्थिति यह है कि कल बिहार में मतदान के पहले दिन प्रधानमंत्री ने कहा और आज दि एशियन एज में पहले पन्ने पर छपा है, राजद, कांग्रेस घुसपैठियों का समर्थन करते हैं, अपने वोट बैंक के कारण राम को पसंद नहीं करते हैं। यही नहीं, अमित शाह ने कहा है और यह भी पहले पन्ने पर है, मोदी-नीतिश की सरकार बिहार को घुसपैठियों से मुक्त कराएगी। दोनों लोगों ने कल बिहार में रैलियां कीं।
ऐसे प्रचार के दम पर चुनाव जीतने के लिहाज से कांग्रेस संगठन कमजोर है। इसे खूब प्रचारित किया गया है और इसके लिए राहुल गांधी में तमाम खामियां बनाई और बताई गई हैं। वंशवाद, शहजादा आदि का तड़का प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लगाते रहते हैं। कांग्रेस की चुनावी तैयारियां न होना, देर से काम शुरू करना आदि जैसे तमाम मुद्दे और प्रचार रहे हैं। नरेन्द्र मोदी की बातों को प्रभावशाली और खास चुनावी रंग व स्तर देने के लिए उन्हें महामानव बनाने वाले प्रचार और नॉन बायोलॉजिकल होने तक की कल्पना सबको मालूम है। ऐसे में यह भी सर्वविदित है कि अखबारों को नियंत्रित कर लिया गया है, चुनावी सर्वेक्षणों में भी खेल होता है। एक स्टिंग से यह सार्वजनिक हुआ था कि चुनाव पूर्व सर्वेक्षण में बेईमानी की सीमा होती है। होती तो हर जगह है लेकिन यहां धंधे का सवाल था और विश्वसनीयता गई तो सर्वेक्षण की पूछ ही नहीं रहेगी। संभवतः इसीलिए सीमा से ज्यादा बेईमानी नहीं की गई। सर्वेक्षणों की साख बचाए रखने के लिए चुनाव चोरी से जीतने वाली भाजपा सर्वेक्षण में हारती भी दिखाई गई। ऐसा नहीं है कि आज लीड के लायक दूसरे खबर नहीं थी। कई अखबारों की सेकेंड लीड, उसी अखबार में या दूसरे में लीड हो सकती थी। उदाहरण के लिए टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर है, मुख्य न्यायाधीश ने सरकार से पूछा, आप मेरे रिटायर होने तक स्थगन क्यों नहीं मांग लेते। लगभग ऐसा ही पहले भी एक मुख्य न्यायाधीश कह चुके हैं। अनुकूल आदेश या ऐसा विवाद खड़ा किए बगैर रिटायर होने वाले जजों को ईनाम में मिलने वाले पदों और गुमनामी की कहानी आप जानते ही हैं। द हिन्दू में छपी एक खबर के अनुसार सरकार ने कहा है कि मतदान के अधिकार और मतदान की आजादी में अंतर है। जब मनुष्यों में जाति, धर्म के आधार पर शिखा, केश और खतना का अंतर है और उन्हें भिन्न खानों में बांटा जाता है तो अधिकार और आजादी में अंतर होगा ही। भले, आजादी के बिना अधिकार का क्या मतलब और जो आजादी देता है या उसे भोगना तय करता है वह अधिकार तय कर ही सकता है। मुश्किल यह है कि ऐसी खबरें किसी-किसी संपादक को ही पहने पन्ने लायक लगती हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सभी मामलों में गिरफ्तारी का लिखित आधार बताया जाना जरूरी है। दि एशियन एज के अनुसार, ट्रम्प ने अब कहा है कि मई में भारत पाकिस्तान युद्ध (ऑपरेशन सिन्दुर) के दौरान आठ विमान गिराए गए थे।
ऑपरेशन सिन्दूर यानी पाकिस्तान से युद्ध जिसे क्रिकेट की हार-जीत के बराबर कर दिया गया था से मुझे व्यक्ति और संस्था की साख का ध्यान आया। मुझे याद नहीं है कि चुनाव और सरकार से संबंधित मामलों में 2014 के बाद किसी की साख बची है या खराब नहीं हुई है। युद्ध के साथ इसमें व्यक्ति, सरकारी व निजी संस्थाएं ही नहीं, संवैधानिक संस्थान और पद शामिल हैं। जज की संदिग्ध मौत की जांच नहीं होने देने से लेकर स्वस्थ उपराष्ट्रपति का स्वास्थ्य कारणों से अचानक इस्तीफा उदाहरण है। इस्तीफे के बाद उपराष्ट्रपति के अस्पताल में होने की खबर नहीं आई और जब दिखे तो पूरी तरह स्वस्थ। फिर भी किसी से बात नहीं कर पाए और महीनों बाद भी उनका कहा कुछ पढ़ने-सुनने को नहीं मिला – यह देश और समाज की हालत है। अगर पूर्व उपराष्ट्रपति की यह स्थिति है तो बाकी के बारे में समझा जा सकता है। उसमें खबर यह है कि मुफ्त राशन पर जीने वाली 80 करोड़ से ज्यादा की आबादी वाले लोगों के देश में भ्रष्टाचार रोकने के लिए बनाई गई लोकपालों की संस्था के लिए सात विदेशी बीएमडब्ल्यू कारें खरीदी जानी हैं। स्वदेशी और आत्मनिर्भरता के प्रचार के बावजूद इनका काम बलेनो से नहीं चलने वाला था। उसकी भी साख गई शायद टाटा के जगुआर की भी कम हुई हो। जब सबकी साख खराब हुई है तो विपक्षी दलों और विरोधियों को कमजोर किया गया है। इसमें कांग्रेस को बदनाम करना – मांस, मछली, मुजरा, मुसलमान सब शामिल है और लेवल प्लेइंग फील्ड की तो बात ही नहीं है। ऐसे में राहुल गांधी ने हरियाणा चुनाव चोरी के अपने खुलासे में कुछ एक्जिट पोल का हवाला दिया। वे भी बता रहे थे कि भाजपा हार रही है, कांग्रेस की सरकार बन रही है। पोस्टल बैलट के मामले में भी यही था। अब बैलेट पेपर वाले मामले में तो कुछ ठोस करना पड़ेगा लेकिन एक्जिट पोल की साख खराब करने की कोशिशें चल रही हैं। उधर बहुत कम बैलट पेपर से हार का एक मामला कोर्ट में लंबित है।
सत्ता में बने रहने के लिए राहुल गांधी की साख खराब करना ज्यादा जरूरी है। भाजपा के लिए वाशिंग मशीन की उपलब्धि ने राहुल गांधी को पागल घोषित करने की मांग की है। ऐसे लोगों के लिए मुद्दा यह भी है कि राहुल गांधी मुख्य चुनाव आयुक्त के प्रति नाराज क्यों लगते हैं। मेरे हिसाब से सीधा सा कारण है – वे उन्हीं को वोट और चुनाव चोरी के लिए जिम्मेदार मानते हैं। ऐसा कह भी चुके हैं। इसी कहने को आधार बनाकर यह भी प्रचारित करने की कोशिश की गई है कि राहुल गांधी किन कारणों से मुख्य चुनाव आयुक्त को पसंद नहीं करते हैं। अभी वह कारण मुदा नहीं है लेकिन ‘व्यवस्था’ यह है कि ऐसे मामलों में भी कांग्रेस और राहुल गांधी को भाजपा विरोधी, हिन्दू विरोधी, मुसलिम समर्थक आदि प्रचारित किया जाए। यह सब अधिकृत और घोषित तरीके से नहीं भी होता हो तो ‘व्यवस्था’ का हिस्सा है। इसलिए आज जब सभी अखबारों की लीड बंपर वोटिंग है तो यह समझना पड़ेगा कि इसका उद्देश्य है। नवोदय टाइम्स के अनुसार, राहुल गांधी ने कहा है कि वोट चोरी होती है और बिहार में भी चुनाव चोरी की कोशिश चल रही है। प्रेस कांफ्रेंस में वे यह कह चुके हैं कि नतीजे आने के बाद हम आपको बिहार का मामला भी बताएंगे। यह बहुत गंभीर चुनौती है। इसके बाद चोरी नहीं होनी चाहिए थी। इसे रोका जाना जरूरी है क्योंकि फिर पकड़ी जाएगी और जाहिर है उससे चुनाव की भी साख खत्म हो जाएगी। लेकिन चुनाव की साख बचाने की चिन्ता एक्जिट पोल की साख बचाने जैसी नहीं है और ना उसका नुकसान है। इसलिए स्थिति अलग है। दूसरी ओर, स्थितियां ऐसी नहीं है कि भाजपा हार स्वीकार कर सके। उसे किसी न किसी तरह जीतना ही है। वह हार जाए, अलग बात है लेकिन जीतने की कोशिश नहीं छोड़ सकती है। इसलिए यह भी प्रचारित किया गया है कि राहुल गांधी ने हार मान ली है। कारण यह है कि चोरी पकड़ी जाए – उसे संभाला जा सकता है। चुनाव हार गए तो स्थिति संभालने में मुश्किल होगी।
इसलिए बिहार चुनाव जीतना इतना जरूरी है कि इस बार विशेष ट्रेन से मतदाताओं को बिहार भेजने की व्यवस्था की गई है। पानीपत-सोनीपत में यह भी सुनिश्चित किया गया है कि दिहाड़ी मजदूरों का चार दिन का वेतन नहीं कटेगा। कहने की जरूरत नहीं है कि मतदान प्रतिशत ज्यादा होने में इसका योगदान होगा। जिन घरों का कमाऊ पूत सिर्फ वोट देने के लिए लंबी यात्रा करके पहुंचा होगा उसके घर के बाकी लोगों ने तो मतदान किया ही होगा और यह संख्या साधारण नहीं हो सकती है। संभव है रिकार्ड मतदान का कारण यह भी हो और अभी इसे प्रचारित नहीं किया जा रहा है लेकिन छिपाया भी नहीं जा रहा है। कारण यह है कि तकनीकी तौर पर तो यह गलत है ही, सभी अनुमानों में अगर भाजपा हार रही हो और अंततः जीत गई तो यह प्रचारित किया जा सकेगा कि भाजपा ने कितनी मेहनत या तैयारी की थी। उसकी टीम, नेटवर्क कितना बढ़िया है आदि आदि। वैसे चुनाव जीताने वालों का भाजपा का नेटवर्क इतना अच्छा है कि फरवरी में दिल्ली में वोट देने वाले दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर (पता नहीं पूर्व या वर्तमान) और पूर्व राज्यसभा सदस्य राकेश सिन्हा ने कल बिहार में मतदान किया। ऐसे और भी लोग हैं। हालांकि कल जब यह मामला सोशल मीडिया पर चर्चा में था तो आम आदमी पार्टी के राघव चड्ढा का पुराना मामला तथा कांग्रेस के कन्हैया कुमार का गलत या झूठा मामला डाल कर मुकाबला करने की कोशिश की गई। राकेश सिन्हा ने दावा किया है कि उन्होंने विधिवत अपना नाम दिल्ली से बेगूसराय करा लिया है। हालांकि, इसमें कारण स्थायी स्थानांतरण दिया गया है। अगर वे नौकरी से रिटायर होकर स्थानांतरित हो भी गए हों तो इतनी जल्दी नई जगह का मतदाता बनना मुश्किल है। मतदाता सामान्य निवासी होता है, पुश्तैनी मकान होने से कोई नागरिक हो सकता है, सामान्य निवासी नहीं। एसआईआर का यही खेल है। हाल तक दिल्ली के निवासी और दिल्ली में नौकरी करने वाले अपने पुश्तैनी शहर के सामान्य निवासी नहीं हो सकते हैं। फिर भी अगर हैं तो यह भाजपा की सुविधा है। रही बात अपने खर्च से वोट देने जाने की तो राज्य सभा के सदस्य को इतना वेतन तो मिलता ही है कि पार्टी को चार छह बार वोट देने के लिए पुश्तैनी शहर की यात्रा पर कुछ लाख रुपए फूंक दिए जाएं। हालांकि यह अलग मुद्दा है।
आज कई अखबारों की लीड वही है जो अमर उजाला की है। मतदान 64.66 या 65 प्रतिशत और ऐतिहासिक, बंपर, रिकार्ड, सर्वोच्च, सर्वाधिक या सबसे ज्यादा जैसे शब्दों का ही अंतर है। इसलिए आज शीर्षक की चर्चा करने का कोई मतलब नहीं है। द टेलीग्राफ मेरे नौ अखबारों में अकेला है जिसने मतदान के रिकार्ड प्रतिशत को लीड नहीं बनाया है। वैसे तो यहां भी लीड बिहार चुनाव की खबर है और रिकार्ड मतदान की खबर का शीर्षक है, कम मतदाता, रिकॉर्ड मतदान। खबर के अनुसार, “बिहार की संक्षिप्त मतदाता सूची के कारण गुरुवार को पहले चरण के मतदान में रिकॉर्ड मतदान हुआ। चुनाव आयोग ने “बिहार के इतिहास में अब तक का सबसे अधिक 64.66% मतदान” की सराहना की। इससे संकेत मिलता है कि पहले चरण का मतदान “उत्सव के माहौल में शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुआ”। अब तक, बिहार में विधानसभा चुनाव में रिकॉर्ड 62.57 प्रतिशत मतदान हुआ था, जो 2000 में तब दर्ज किया गया था जब त्रिशंकु सदन ने लालू प्रसाद के 15 साल के शासन के लिए नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री की कुर्सी छीनने का मौका दिया था, जो लालू प्रसाद और राबड़ी देवी के 15 साल के शासन के कुछ समय बाद हुआ था। बिहार में रिकॉर्ड लोकसभा मतदान 64.6 प्रतिशत था, जो 1998 में बना था।” आप जानते हैं कि इस बार एसआईआर के बाद तमाम लोगों के नाम हटाए गए हैं और तमाम नए नाम शामिल हुए हैं। मतदाताओं के लिए स्पेशल ट्रेन की खबर भी पहली बार है। इसलिए रिकार्ड वोट असल में रिकार्ड नहीं है और संभव है इसका पता बाद में चले। जो भी हो, टेलीग्राफ की लीड का शीर्षक है, बिहार में जातीय निष्ठाएं मजबूत हैं लेकिन जब मतदान है तो युवाओं ने पूछा, नौकरियां कहां हैं। मुझे लगता है कि यह अकेला शीर्षक है जिसका उपयोग वोट चोरी के बाद शायद ही हो पाए या बाद में उपयोग के लिए तो नहीं ही है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


