डॉ शोकेंद्र कुमार शर्मा-
एक शिक्षक की सच्ची कहानी … मेडिकल माफिया का कारनामा
साल 2022 में मेरी जिंदगी उस समय बदल गई जब मैं रीढ़ की गंभीर बीमारी Spondylolisthesis से जूझ रहा था। दर्द इतना कि लगता था जैसे कमर में किसी ने अंगारे भर दिए हों।
इसी उम्मीद में मैं दिल्ली के नामी Max Hospital, Saket पहुँचा, जहाँ न्यूरो सर्जरी विभाग के हेड डॉ. विपिन वालिया ने मेरा MRI देखने के बाद कहा कि इम्प्लांट डाल देंगे, तीसरे दिन मैं चलने लगूँगा और 21 दिन में कॉलेज जाना शुरू कर दूँगा। उन्होंने पूरी गारंटी के साथ यह बात कही।
मैंने डॉक्टर की बात पर भरोसा किया। 4.30 लाख रुपये जमा कर सर्जरी कराई।
लेकिन छह महीने बाद दर्द और बढ़कर लौट आया। जब दोबारा डॉक्टर के पास गया तो उन्होंने एक्स-रे देखकर माना कि इम्प्लांट गलत पोज़ीशन में डाल दिया गया था और उनसे मेडिकल नेग्लिजेंसी हुई है। इसके बाद उन्होंने दोबारा सर्जरी के लिए 3 लाख रुपये और मांगे। गलती उनकी थी, लेकिन कीमत मुझसे वसूलने की बात उनकी ही ओर से आई।
सबसे बड़ा झटका तब लगा, जब मैंने एक्स-रे में देखा कि जिस इम्प्लांट का मॉडल डॉक्टर ने सर्जरी से पहले दिखाया था, रीढ़ में डला इम्प्लांट उससे बिल्कुल अलग था। जब मैंने पूछा तो उन्होंने कहा कि मरीज को आधा मॉडल इसलिए नहीं दिखाते, क्योंकि वह डर जाता है।
इसी दौरान मुझे पता चला कि BMP नाम का एक प्रोटीन, जिसकी कीमत लगभग एक लाख रुपये है, उसे भी आर्टिफिशियल डिस्क में डाला जाता है। इसके बारे में मुझे पहले कुछ नहीं बताया गया था। जब मैंने पूछा कि यह जानकारी पहले क्यों नहीं दी गई, जबकि पूरी फीस पहले ही ली जा चुकी थी, तो जवाब मिला कि स्पाइन सर्जरी में किसी तरह की गारंटी नहीं होती। वही डॉक्टर, जिसने सर्जरी से पहले गारंटी दी थी, अब गारंटी से इंकार कर रहा था।
मुझे कई दूसरे स्पाइन सर्जनों से पता चला कि स्पाइन सर्जरी की दुनिया में एक बड़ा माफिया सक्रिय है। मरीज को आधी जानकारी दी जाती है ताकि वह डरकर सर्जरी से पीछे न हटे। छह महीने तक तो ज्यादातर मरीज ठीक रहते हैं, इसके बाद इम्प्लांट फेलियर शुरू होता है और मरीज को ही जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है। कई लोग जिंदगीभर के लिए अपाहिज हो जाते हैं। गरीब तो दोबारा सर्जरी करा ही नहीं सकते।
मैंने दूसरी जगह सर्जरी कराई, तब जाकर कुछ राहत मिली। Max अस्पताल से मैंने मुआवजे की मांग की, लेकिन चार साल गुजर जाने के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं की गई।
अब यह मेरी निजी लड़ाई नहीं रही। यह उन सभी मरीजों की लड़ाई है जिन्हें मेडिकल माफिया आधी जानकारी देकर ऑपरेशन टेबल तक पहुंचाता है और जिंदगीभर के दर्द का सौदा कर देता है।
मैं चाहता हूँ कि यह मुद्दा लोकसभा और विधानसभा में उठे। जिम्मेदार डॉक्टरों पर कार्रवाई हो, उनके रजिस्ट्रेशन रद्द हों और बड़े अस्पतालों की जांच हो। हाल ही में राज्यसभा में राघव चड्ढा द्वारा उठाए गए इस मुद्दे को भी गंभीरता से नहीं लिया गया है।
मैं इस माफियागिरी के खिलाफ आवाज उठा रहा हूँ क्योंकि अगर शिक्षित लोग भी ठगे जा रहे हैं, तो आम आदमी का क्या होगा?
मैं चुप नहीं बैठूँगा। यह लड़ाई अंत तक लड़ी जाएगी ताकि भविष्य में किसी और की जिंदगी इस तरह न बर्बाद हो।
डॉ. शोकेंद्र कुमार शर्मा बड़ौत स्थित दिगंबर जैन डिग्री कॉलेज में इतिहास विभाग के सहायक प्रोफेसर हैं।


