बद्री प्रसाद सिंह-
पुलिस विभाग में अपनी विशिष्ट, उत्कृष्ट एवं निष्कलंक सेवाओं के लिये विख्यात प्रकाश सिंह जी वर्ष १९५९ बैच के भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी हैं और असम, उत्तर प्रदेश एवं सीमा सुरक्षा बल के सर्वोच्च पद महानिदेशक को सुशोभित कर चुके हैं ।कुछ व्यक्ति अपने पद से और कुछ पद उस पद को धारण करने वाले व्यक्ति से जाने जाते हैं, श्री सिंह के पद उनके कारण विशिष्ट हुए। भारत में पुलिस सुधारों के प्रमुख सूत्रधार के रूप में उनकी भूमिका के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ पुलिस अधिकारियों में से एक माना जाता है।
श्री सिंह का जन्म १० जनवरी १९३६ को उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़ जिले के मेहनाजपुर के पास प्रतिष्ठित क्षत्रिय परिवार में हुआ था ।उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम ए इतिहास से शिक्षा प्राप्त कर वहाँ कुछ समय तक अध्यापन भी किया थाऔर वर्ष १९५९ बैच में भारतीय पुलिस सेवा में चयनित हुए और उत्तर प्रदेश में पुलिस के कयी महत्वपूर्ण और संवेदनशील पदों पर सेवा करते हुए १९९१ में पुलिस महानिदेशक असम बने, तत्पश्चात जुलाई १९९१ से मई १९९३तक पुलिस महानिदेशक उत्तर प्रदेश रहे तथा जून १९९३ से जनवरी १९९४ तक सीमा सुरक्षा बल के महानिदेशक रहे।
उनकी विशिष्ट सेवाओं के देखते हुए उन्हें सराहनीय सेवा का पुलिस पदक, राष्ट्रपति का विशिष्ट पुलिस पदक तथा भारत सरकार ने वर्ष १९९१ में उन्हें पद्मश्री सम्मान से अलंकृत किया ।उनके सुपुत्र पंकज कुमार सिंह भी भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी रहे और २०२१ में सीमा सुरक्षा बल के महानिदेशक बने।यह सुखद संयोग है कि यह ऐसा पद रहा जिसे पिता पुत्र दोनों ने सुशोभित किया। पंकज जी वर्तमान में उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और अजीत डोभाल के सहयोगी हैं। उनके दूसरे पुत्र पीयूष कुमार सिंह अमेरिका में एक बीमा सेवा उत्पाद कंपनी के सह संस्थापक हैं।
सेवानिवृत्ति के बाद भी प्रकाश सिंह जी सक्रिय हैं और विभिन्न जाँच आयोगों एवं अध्ययन समूह में अपना योगदान दे रहें हैं। वर्ष २००४ में मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू की नक्सलियों द्वारा हत्या के किए गए प्रयास की जाँच आयोग की अध्यक्षता की। वर्ष २०१६ में हरियाणा में हुए जाट आरक्षण आंदोलन की जाँच की थी।२००८ में उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में चुनौतियों का अध्ययन करने के लिए गठित योजना आयोग के विशेषज्ञ समूह के सदस्य रहे।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा २००७-८ के बीच उत्तर प्रदेश में राजनीति को अपराध की श्रेणी से बाहर करने के लिये गठित समिति के अध्यक्ष रहे। २०१३-१४ में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड के सदस्य रहे।
पुलिस विभाग में बढ़ते राजनैतिक प्रभाव व अनावश्यक स्थानांतरण को रोकने के लिए प्रकाश सिंह व साथियों ने सर्वोच्च न्यायालय में जनहित याचिका दाखिल की थी जिसमें २००६ में पुलिस सुधारों के लिए पुलिस बलों के पुनर्गठन के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने ऐतिहासिक निर्णय दिया था जिसका अनुपालन अभी भी राज्य सरकारें पूर्ण रूप से नहीं कर रही हैं।
आपने जन हिताय नामक एक संस्था बनाई है जिसके अंतर्गत विभिन्न सामाजिक कार्य संचालित होते हैं जिसके द्वारा प्रति वर्ष जाड़ों में लखनऊ में ग़रीबों को प्रति वर्ष कंबल भी वितरित किए जाते हैं।
श्री सिंह सामाजिक कार्यों के साथ लेखन कार्य भी करते रहते हैं तथा देश व अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर उनके भाषण व पेपर्स बहुत ध्यान से सुने जाते हैं । देश की आंतरिक सुरक्षा समस्याओं पर आपने निम्न पुस्तकें लिखी हैं-
१- अनियमित युद्ध: भारत के आंतरिक सुरक्षा की माओवादी चुनौती।
२- भारत का पूर्वोत्तर: उथल-पुथल से भरा सीमांत क्षेत्र
३- कोहिमा से काश्मीर: आतंकवादियों के मार्ग पर
४- भारत में नक्सलवादी आंदोलन
५- नागालैंड
६- भारत में पुलिस सुधारों का संघर्ष
७- Unforgettable Chapters
आज १० जनवरी को प्रकाश सिंह जी का ९० वाँ जन्मदिन है, उन्हें जन्मदिन की हार्दिक बधाई एवं अनंत शुभकामनाएँ । ईश्वर उन्हें स्वस्थ, प्रसन्न एवं कर्मठ बनाए रखें। इस लेख में मैं अपने व्यक्तिगत अनुभवों को साझा करने का प्रयास करूँगा, तिथियों में कहीं त्रुटि हो तो क्षमा प्रार्थी हूँ ।
मैं माता पिता की अकेली संतान हूँ और वर्ष १९८१ में माँ ,वर्ष १९८३ में पिता जी के स्वर्गवासी होने के बाद घर की जमीन जायदाद देखते के लिए घर के आसपास रहना मेरी मजबूरी हो गई ।१९८१ में मैं अनुकंपा के आधार पर सीओ अमरोहा से प्रतापगढ़ में नियुक्त हुआ और ४ वर्ष तक वहाँ रहा तत्पश्चात ४ वर्ष इलाहाबाद में सीआईडी व जिला पुलिस में नियुक्त रहा। १९८९ में अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक बनने पर मुझे पीएसी फतेहपुर नियुक्ति मिली।मैं वहाँ चैन की वंशी बजा रहा था कि मार्च १९९१ में मेरी नियुक्ति अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक सिख आतंकवाद उन्मूलन अभियान,पीलीभीत हो गयी और मुझे तत्काल कार्यमुक्त कर दिया गया । तब तक सिख आतंकवाद में मेरी अधिक जानकारी नहीं थी।
मैं फतेहपुर से इलाहाबाद किसी महत्वहीन पद पर रहकर अपनी गाँव की संपत्ति की देखभाल तथा बच्चों को पढ़ाना चाहता था। मैं तत्काल डीजीपी से मिलने गया तो बताया गया कि मेरी नियुक्ति पीलीभीत के नव नियुक्त पुलिस अधीक्षक आर डी त्रिपाठी जी के अनुरोध पर शासन ने की है, डीजीपी कुछ नहीं करेंगे ।मैंने त्रिपाठी जी से फ़ोन पर बात की तो उन्होंने मुझे पीलीभीत आकर बात करने को कहा। मैं तत्काल ट्रेन से बरेली आया जहाँ से मैं पीलीभीत पुलिस के भेजे टेम्पो ट्रैवलर से रात्रि १० बजे पीलीभीत डाक बंगला आकर त्रिपाठी जी से अपनी मजबूरी बतायी, उन्होंने पीलीभीत पुलिस की कायरता, निष्क्रियता की चर्चा करते हुए राष्ट्रभक्ति का पाठ पढ़ा कर आतंकवाद के इस युद्ध में मेरा सहयोग मांगा, मैंने उनके साथ अमरोहा, मुरादाबाद में क्षेत्राधिकारी के रूप में कार्य किया था। उन्होंने तत्काल कार्य भार ग्रहण कराते हुए आश्वस्त किया कि जुलाई में मेरी नियुक्ति इलाहाबाद करा देंगे।
अगले दिन से जो कुछ मैंने देखा, स्तब्ध रह गया। पुलिस क्षेत्र में न निकल कर अपने थाने में बंद रहती थी। आतंकी खुले आम विचरते, मारपीट करते, धन वसूल रहे थे। त्रिपाठी जी ने समझाया कि पुलिस कार्यालय में न बैठकर मैं अधिक समय आतंकवाद प्रभावित क्षेत्र में दूं और पुलिस बल का डर समाप्त कर उन्हें अधिक से अधिक क्षेत्र में निकालूँ । उनकी बातों में बल था और मैं दिन रात सीओ, थानाध्यक्षों के साथ क्षेत्र में स्थानीय बल को लेकर निकलने लगा जिसका सकारात्मक प्रभाव पुलिस व जनता में पड़ने लगा। दिनांक १३ जुलाई १९९१ को पीलीभीत के जंगलों में ३ स्थान पर हुई मुठभेड़ में १० आतंकी मारे गए। ये आतंकी “खालिस्तान लिबरेशन आर्मी “ संगठन के बलजीत सिंह पप्पू गैंग के थे। मृतकों में पप्पू भी था। मृतकों में २ पीलीभीत के शेष सभी पंजाब के वांछित आतंकवादी थे। पीलीभीत का निंदर एक हिस्ट्रीशीटर था दूसरा नया लड़का था। इस मुठभेड़ का स्थानीयों ने स्वागत किया।
३-४ दिन बाद सिखों ने इस मुठभेड़ को फ़र्ज़ी बताते हुए मृतकों को तीर्थयात्री बताया। धीरे-धीरे विपक्षी दलों ने इस मुठभेड़ के विरुध्द धरना प्रदर्शन प्रारम्भ कर दिया। तब प्रदेश में मा. मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की भाजपा सरकार थी और केंद्र में मा. प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्हा राव की कांग्रेस सरकार थी।कांग्रेस ने संसद में हंगामा किया व केंद्रीय गृह मंत्री चौहान पीलीभीत भी आए। प्रदेश सरकार ने शांति व्यवस्था बनाये रखने हेतु २२ जुलाई को पुलिस अधीक्षक आर डी त्रिपाठी का जनपद से स्थानांतरित कर वहाँ सुलखान सिंह की नियुक्ति कर दी।इसका प्रसारण आकाशवाणी से ७.२० बजे शाम हुई जिसका ज्ञान मुझे नहीं था।
२२ जुलाई की रात ८ बजे त्रिपाठी जी ने मुझे तत्काल अपने बंगले बुलाया, वह घबराए हुए से थे। मुझे लगा किसी थाने या चौकी पर आतंकी हमला हुआ है। मैं घर पर था और मेरे साथ लगा सुरक्षा बल पुलिस लाइन खाना खाने गया था। मैं अपनी ए के ४७ रायफल लेकर स्वयं जिप्सी चलाकर उनके घर पहुँचा । वह कैंप कार्यालय में बैठे मिले। मैंने बुलाने का कारण पूछा तो अपने स्थानांतरण की बात बताते हुए वायरलेस पर चल रहे वार्तालाप सुनने को कहा। पता चला कि शाम ७.२० के रेडियो समाचार में त्रिपाठी जी के स्थानांतरण व किसी सुलक्खन सिंह के नये एसपी बनाये जाने पर पीलीभीत पुलिस विद्रोह करने जा रही है। वायरलेस सेट पर एक थाना दूसरे थाने से ड्यूटी छोड़कर रायफल उठा कर आतंकियों व उनके समर्थकों को समाप्त करने के लिए सादे कपड़े में निकलने को कह रहा था।
त्रिपाठी जी ने सेट पर दो तीन बार सभी पुलिसकर्मियों को समझाया कि ऐसा काम वे न करें,ड्यूटी न छोड़ें, यह अपराध है, इससे नौकरी भी चली जाएगी लेकिन कोई सुनने वाला नहीं था।आधे धंटे बाद प्रत्येक थाने का बल सादे कपड़े में शस्त्र लेकर पीलीभीत के लिए प्रस्थान कर गया।१९७१ में पंडित कमलापति त्रिपाठी जी के मुख्य मंत्रित्व में हुए पीएसी विद्रोह के विषय में सुना था जिसके लिए उनकी सरकार भी गयी थी,लेकिन आज पीलीभीत पुलिस के इस विद्रोह को देख कर त्रिपाठी जी व मैं स्तब्ध व किंकर्तव्यविमूढ़ थे।
ज़िलाधिकारी व वरिष्ठ अधिकारियों को फ़ोन से सूचित किया गया। आयुक्त व डीआईजी बरेली से प्रस्थान कर गए ।पुलिस कर्मियों का जमावड़ा कप्तान के घर होने लगा।डीएम भी वहीं आ गए । हम सब उन्हें समझा रहे थे लेकिन वे कुछ सुनने को तैयार नहीं थे।मुझे आश्चर्य हो रहा था कि जो बल हमारे कहने पर जान की परवाह न कर आतंकियों को आबादी व जंगलों में तलाशा करता था, आज हमें सुन भी नहीं रहा था।उन्हें शायद यह डर लगा कि मुठभेड़ में सम्मिलित सभी पुलिस कर्मी यहाँ से स्थानांतरित होंगे और धीरे-धीरे सभी के विरुध्द कार्रवाई होगी। सुलखान सिंह को सिख सुलक्खन सिंह समझ और डर गए थे।
सूचना मिली कि आयुक्त और डीआईजी सीधे डीएम आवास पहुँच रहे हैं, हम सब वहाँ पहुँच गये ।पुलिस बल वहीं लान में बैठकर भजन गाने लगा ।आयुक्त व डीआईजी ने पुलिस बल को बहुत समझाने का प्रयास किया लेकिन वे असफल रहे।प्रकाश सिंह जी उसी दिन उत्तर प्रदेश पुलिस के डीजीपी का पदभार ग्रहण किया था ।
दूसरे दिन पुलिस महानिरीक्षक बरेली जोन, आयुक्त , डीआईजी पीलीभीत पुलिस कार्यालय आए। तब तक इस स्थानांतरण के विरोध में जिले के सभी प्रमुख बाजार, न्यायालय , सरकारी कार्यालयों में हड़ताल हो चुकी थी। पुलिस कर्मी सादे कपड़ों में शस्त्रों के साथ अपनी ड्यूटी छोड़कर पुलिस कार्यालय ,पुलिस लाइंस के पास टहल कर ऊलजलूल बातें कर रहे थे। आईजी डीआईजी के बुलाने पर कोई सुन नहीं रहा था। ठीक इसी समय दोपहर को डीजीपी प्रकाश सिंह जी का हेलिकॉप्टर पुलिस लाइंस में उतरा। पुलिस लाइंस व पुलिस कार्यालय एक ही परिसर में है।
डीजीपी पुलिस कार्यालय आए और हमें सभी सीओ व थानाध्यक्षों को बुलाने को कहा।
मुझे आश्चर्य हुआ जब उनके नाम पर बुलाने पर सभी थानाध्यक्ष बग़ैर चूं चपड़ किये आकर बैठ गये । फिर प्रकाश सिंह जी ने अपना रौद्र रूप दिखाया और पहले त्रिपाठी जी को निशाने पर लेकर इस विद्रोह का दोषी उन्हें करार देते हुए उन्हें इसके भयावह परिणाम भुगतने की चेतावनी देकर थानाध्यक्षों से कहा कि वे अपने को समझते क्या हैं, वह १४ प्लाटून सीमा सुरक्षा बल तैयार कर आए हैं , उनके एक इशारे पर बल एक घंटे में आ जाएगा और एक एक प्लाटून सभी १३ थानों पर व एक प्लाटून पुलिस लाइंस में तैनात होकर चार्ज ले लेगा और जिसने भी गुस्ताखी करने का प्रयास किया, वहीं ढेर कर दिया जाएगा। पीलीभीत पुलिस की क्या औक़त है कि वह विद्रोह कर सके। उन्होंने कहा कि इस मुठभेड़ के मुकदमें सीआईडी से जाँच कराकर पुलिसकर्मियों को जेल भिजवा देंगे।
पूरा हाल नि:शब्द था और प्रकाश सिंह जी दहाड़े जा रहे थे। उनके रुकते ही आईजी जोन जे के पी सिंह ने कहा कि सर, सभी थानाध्यक्ष व पुलिसकर्मी अपने अनुशासनहीनता के लिये शर्मिंदा हैं और क्षमायाचना कर रहे हैं , हालाँकि किसी ने कुछ कहा नहीं था।आईजी के कहने पर सभी थानाध्यक्षों ने खड़े होकर क्षमायाचना की। प्रकाश सिंह जी ने पुनः कहा कि सभी थानाध्यक्ष अपने बल को लेकर तत्काल अपने थाने पहुँचे और बावर्दी दुरुस्त होकर थाने, चौकी पर ड्यूटी पर लग जाए और एक घंटे में वायरलेस सेट से अनुपालन आख्या दें ,एक घंटे में अनुपालन आख्या न मिलने पर कार्यवाही होगी। सभी थानाध्यक्ष तत्काल अपने क्षेत्र रवाना हो गए। तब प्रारंभ हुई हमारी क्लास, हम दो अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक व चार क्षेत्राधिकारी थे जिन्हें जमकर डांटा और कहा कि हम सब भी स्थानान्तरित न हों, इसलिये हमने यह बखेड़ा कराया था। हमने एक ही स्वर में कहा कि हम यहाँ नही रहना चाहते और हमारा भी स्थानांतरण हो जाय तो वह बोले कि उन्हें लगा था हम सब त्रिपाठी से मिलकर यह करा रहे हैं। तब तक थानाध्यक्षों को गये आधा घंटा हो गया था और थानों से रिपोर्ट आनी प्रारंभ हो गईं तो आईजी ज़ोन ने डीजीपी से कहा, वह जाएँ अब सब ठीक हो गया है। डीजीपी ने त्रिपाठी से उनकी नियुक्ति पूछीं उन्होंने पीएसी लखनऊ बताई तब उन्होंने कहा कि २-३ दिन में आ जाएगी, अब कोई बात न हो। प्रकाश सिंह जी हेलीकॉप्टर से लखनऊ लौट गए। प्रकाश सिंह जी डीआईजी बरेली रह चुके थे और पुराने पुलिसकर्मियों को उनके स्वभाव की जानकारी थी इसीलिए यह बवाल शीघ्र सुलझ गया। यद्यपि वर्ष १९८० में मुरादाबाद दंगे के समय वह डीआईजी बरेली और मैं सीओ अमरोहा था लेकिन तब मैने इतने नज़दीक से उन्हें नहीं देखा था।
खैर, एक सप्ताह के भीतर त्रिपाठी जी पीएसी महानगर, लखनऊ नियुक्ति पर चले गये। अब मुझे अपने स्थानांतरण की चिन्ता थी।एक दिन मैं लखनऊ जा कर डीजीपी के समक्ष पेश हुआ। उन्होंने मेरा नाम, गृह जनपद पूछने के बाद मेरी जाति पूछी। मैं प्रसन्न हुआ कि मैं उनके गृह जनपद का पड़ोसी हूँ व सजातीय हूँ अब मेरा काम हो जाएगा लेकिन मेरी आशाओं पर तुषारापात करते हुऐ जब मुझे डाँटना प्रारंभ किया तो मेरे पसीने छूट गए। उन्होंने कहा कि क्षत्रिय होकर आतंकियों से डरते हो, अपना इतिहास पढ़ो क्षत्रियों ने देश के लिये कितनी क़ुर्बनियां दी हैं। आज देश को जुझारुओं, वीरों, सैनिकों की आवश्यकता है और तुम रणक्षेत्र से पलायन करना चाहते हो, आतंकियों से मुक़ाबले के लिए क्या रूस अमेरिका से सैनिक आएँगे। उन्होंने और भी बहुत कुछ कहा और मेरे पास वहाँ से भागने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचा था।
भाजपा सरकार में एक कैबिनेट मंत्री मेरे निकट संबंधी थे, उन्होंने मेरे स्थानांतरण का ठेका लिया और प्रकाश सिंह जी को अपना मित्र बताकर उनसे मेरे लिए कहा।प्रकाश सिंह जी महीने में एक बार हेलीकॉप्टर से पीलीभीत आते थे और अधीनस्थों से चाय पीते हुए बात भी करते थे।उन्होंने धीरे से मुझे एक कोने ले जाकर कहा कि मेरे मना करने के बाद भी ज़ोर लगा रहे हो, तुम्हारा स्थानांतरण नहीं होगा,मन लगा कर यही काम करो।उनके जाने के बाद मैंने मंत्री जी को यह बात बता दी तो वह बोले कि अब वह मुख्यमंत्री से ही बात करेंगे ।
कुछ दिनों बाद प्रकाश सिंह जी सिखों के आमंत्रण पर अमावस्या को नानकमता गुरुद्वारा आए।नानकमता गुरुद्वारा नैनीताल जनपद (अब ऊधम सिंह नगर)में उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा व प्रमुख तीर्थ है और प्रत्येक अमावस्या को सिखों का बड़ा समुदाय वहाँ एकत्र होता था जिसमें प्रत्येक जनपद से आए सिख पुलिस व अन्य विभागों की शिकायत भी करते थे। वहीं आतंकी समूह भी आकर धर्म सुधार की बातें किया करता थे।उनके आगमन पर आसपास जनपदों के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी वहाँ मौजूद थे और सुरक्षा का कड़ा प्रबंध था।सिखों ने पुलिस उत्पीड़न,आतंकियों के शरण देने के नाम पर धन वसूली व टाडा TADA Act में बंद बुजुर्गों व महिलाओं की जमानत की बात की। श्री सिंह ने पुलिस उत्पीड़न से मुक्ति का वादा करते हुए बंद बुजुर्गों की शीघ्र जमानत कराने की बात कहते हुए सिखों को भी आतंकियों को शरण न देने व
पुलिस की सहायता करने का अनुरोध किया। यह बैठक बहुत सफल रही, सिखों में भी डीजीपी व पुलिस पर विश्वास बढ़ा ।
इसके पश्चात वह पास के अतिथि गृह में सभी पुलिस अधिकारियों के साथ वार्ता कर उचित निर्देश देते हुए सिखों का उत्पीड़न समाप्त करने को कहा,फिर वहीं लान में चायपान हुआ। चाय के दौरान एक तरफ मुझे बुलाकर वह बोले कि आतंकियों से बरामद हिट लिस्ट की एक प्रति मैं उनको भी दे दूँ। मैंने अपने पास ऐसी किसी लिस्ट के होने से इनकार किया तो वह बोले कि मा. मुख्यमंत्री जी मेरे स्थानांतरण के लिए बुलाकर कहा कि मेरे पास आतंकियों की हिट लिस्ट है जिसमें मेरा भी नाम है, इसीलिए उन्होंने पूछा था। फिर वह सर्द आवाज़ में बोले कि यह मेरी तीसरी गलती है, यदि अगली बार कोई सिफारिश मैंने कराई तो मुझे कूड़े दान में डाल दिया जाएगा और जीवन भर के लिए IPS संवर्ग से वंचित रह जाएँगे।
मैंने घर आकर रिश्तेदार मंत्री जी से विनम्र निवेदन किया कि जब उनके वश में कुछ नहीं है तो अब वह मेरी सिफारिश न करें,और मैं इलाहाबाद स्थानांतरित होने की आशा त्याग कर परिवार फतेहपुर से पीलीभीत बुलाकर पीलीभीत में बच्चों का प्रवेश करा दिया ।मा. मंत्री जी ने मुख्यमंत्री जी को भेजे गए अपने पत्र में मेरा नाम आतंकियों की लिस्ट में होने की बात लिख कर मेरे स्थानांतरण की सिफारिश की थी।
क्रमशः…
लेखक बद्री प्रसाद सिंह रिटायर आईपीएस अफसर हैं.

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