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एक पुलिस अफसर का संस्मरण (2) : मंत्री की बात सुनते ही डीजीपी प्रकाश सिंह का चेहरा लाल हो गया!

भरी गोष्ठी में प्रकाश सिंह जी की वह ललकार सुनकर मंत्री जी सन्न रह गये

बद्री प्रसाद सिंह-

प्रकाश सिंह जी आतंकवाद प्रभावित क्षेत्रों में हेलीकॉप्टर से माह में एक बार या बड़ी घटना होने पर आते रहते थे और बड़ी से बड़ी घटनाएँ होने पर पुलिस बल को दोषी ठहराकर कभी भी नहीं डाटा। वह घटनास्थल पर आकर स्थानीय अधिकारियों से घटना समझ कर उस घटना से सबक लेते हुए कैसे तैयारी की जाय यह समझाते थे तथा बल का साहस सदैव बढ़ाते रहते थे। उनके जाने के बाद खीरी जनपद की एक आतंकी घटना में ६ व्यक्तियों की हत्या के बाद तत्कालीन डीजीपी ने स्थानीय अधिकारियों को प्रेस के सामने बहुत जलील किया था जिससे पुलिस बल निराश हुआ था।

रुद्रपुर, नैनीताल में १९९१ की रामलीला में बम विस्फोट हुआ कुछ मरे और कुछ घायल हुए। घायलों को पुलिस व जनता वहाँ के सरकारी अस्पताल ले गयी जहाँ दूसरा विस्फोट हुआ और वहाँ भी कुछ मरे व घायल हुए। अगले दिन गृह राज्यमंत्री के साथ डीजीपी आकर घटनास्थल देखा। आसपास के जनपदों के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी भी वहाँ पहुच गये थे। मंत्री जी वहाँ से भाजपा कार्यकर्ताओं के साथ पंतनगर विश्वविद्यालय के तराई भवन चले गये। डीजीपी वहीं बने रहे और वहाँ उपस्थित डीआईजी कुमाऊँ रण बहादुर सिंह जी को टोका कि उनके सर के बाल बढ़े हैं व वह आफिस शू के स्थान पर पीटी शू क्यों पहने हैं ? इतने महत्वपूर्ण स्थल पर जहाँ मृत व घायलों की संख्या १०० के लगभग थी, वह अनुशासन का पाठ पढ़ाना नहीं भूले।

घटनास्थल से हम सभी उनके साथ पीएसी कान्फ्रेंस रूम आए और गोष्ठी आरंभ हुई। डीआईजी कुमाऊँ ने बताया कि घटना की सूचना मिलते ही वह और एसएसपी नैनीताल सत्य व्रत बंसल घटनास्थल को चल दिए। डीजीपी ने उन्हें टोंकते हुए बताया कि वह उनकी गलती थी। भाग्यशाली रहे कि वे बच गये अन्यथा रास्ते की किसी पुलिया पर तीसरा विस्फोट भी हो सकता था। वह पंजाब में आईजी सीमा सुरक्षा बल रह चुके थे, उन्होंने तीसरे विस्फोट का उदाहरण देते हुए सभी अधिकारियों को इससे सीख लेने को कहा। उस समय रुद्रपुर में अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक का पद रिक्त था। उन्होंने तत्काल स्थानीय किसी अधिकारी का नाम सुझाने को कहा, बाद में किसी अन्य की स्थाई नियुक्ति वे कर देंगे।

डीआईजी बरेली ने बरेली के पुलिस अधीक्षक देहात का नाम सुझाया जिसे सुनकर वह बोले कि वह भ्रष्ट अधिकारी हैं और भ्रष्टों में नैतिक बल नहीं होता, वे कायर होते हैं और कायर कभी बल का सफल नेतृत्व नहीं कर सकते। उन्होंने कहा कि पंजाब में पुलिस आतंकियों का सफाया इसीलिये नहीं कर पा रही है कि वह भ्रष्ट बल है। यह था उनका भ्रष्टाचार के प्रति ज़ीरो टालरेंस वाला नज़रिया।

तभी मंत्री जी ने कहलाया कि जितने पुलिस अधिकारी डीजीपी की बैठक में हैं, सभी तराई भवन उनकी बैठक में आ जाय।उस समय बैठक में नैनीताल पीलीभीत, बरेली,रामपुर के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी मौजूद थे। प्रकाश सिंह जी ने कहा कि केवल नैनीताल के ही अधिकारी वहाँ बैठक में रहेंगे शेष सब जाय, मंत्री का अन्य से क्या मतलब ?डीआईजी कुमाऊँ के समझाने पर कि इससे मंत्री का अहंकार संतुष्ट होगा,सब चले चलें,डीजीपी ने कहा कि जिसकी इच्छा हो वह चले। डीजीपी के साथ नैनीताल व पीलीभीत के अधिकारी वहाँ गए। वहाँ मंत्री जी ने रुष्ट होकर कहा कि उनके कार्यकर्ताओं ने बताया है कि बम ब्लास्ट की पूर्व सूचना के बाद भी ब्लास्ट नहीं रुका, इसमें पुलिस की निष्क्रियता है, इससे कार्यकर्ताओं में रोष है।

इतना सुनते ही प्रकाश सिंह जी का चेहरा लाल हो गया। उन्होंने बड़े रोष से कहा कि पंजाब के क्षेत्रफल के बराबर तराई का क्षेत्र है, पंजाब में जंगल तथा गन्ने की फसल लगभग नहीं है जबकि तराई में यह अत्यधिक है। पंजाब में सेना ,बीएसएफ़ सीआरपीएफ व अन्य बल अत्यधिक संख्या में लगे हैं तब भी वहाँ बिस्फोट रुक नहीं पा रहा है,उनकी तुलना में उत्तर प्रदेश में मात्र दो बटालियन बीएसएफ़ दो कम्पनी नागा बल व पीएसी लगी है फिर भी हमारे एक भी सैनिक ने न तो त्यागपत्र दिया और न ड्यूटी से पलायन किया ॥आज हमारे सिपाही पुरानी .३०३ बोर रायफल से ए.के. ४७ का मुक़ाबला कर रहे हैं, मर रहे हैं और मार भी रहे हैं, और क्या करें । हमारे आधुनिकीकरण के सारे प्रस्ताव शासन में लंबित हैं ,क्यों?

जहां तक पूर्व सूचना की बात है, वह पूरे तराई के लिए थी किसी स्थान विशेष के लिए नहीं था। पुलिस ने अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास किया था, इसमें कोई दोषी नहीं है। उन्होंने आगे कहा कि आपके कुछ कार्यकर्ता १९८४ की सिख उत्पीड़न की घटनाओं को दुहराना चाहते हैं, आप उन्हें समझा दें कि यदि ऐसी बात हुई और सिख मारे गए तो सिखों का यहाँ से महापलायन होगा और वे सभी पंजाब में जाएँगे और तब उनकी आबादी वहाँ इतनी हो जाएगी कि वह खालिस्तान स्वयं हो जाएगा। भरी गोष्ठी में प्रकाश सिंह जी की वह ललकार सुनकर मा. मंत्री जी सन्न रह गये और फिर अपने कार्यकर्ताओं को सिख उत्पीड़न से मना करते हुए अपनी सफ़ाई देने लगे। गोष्ठी बाद मंत्री जी व प्रकाश सिंह जी उसी हैलीकाप्टर से लखनऊ वापस चले गये। मेरा सौभाग्य था कि मैं उस गोष्ठी में था।बहुत चाहकर भी मैं प्रकाश सिंह का एक अंश भी नहीं बन सका।हर पुलिस अधिकारी प्रकाश सिंह बन भी नहीं सकता।

एक बार वह संपूर्णानगर, खीरी में किसी आतंकी घटना में आए थे। वह मेरा सीमा क्षेत्र था, मैं भी वहीं था। जब वह जिप्सी पर बैठकर जंगल में जाने के लिए तैयार हुए तो उन्होंने वहाँ के पुलिस अधीक्षक से कहा कि हमारी पुलिस पर्दानशीन कब से हो गई?जिप्सी के किनारे के सीसों पर पर्दा लगा था। उन्होंने समझाया कि पर्दे सीसे पर लगने से साइड की वस्तु नहीं दिखेगी और किनारे से ऐम्बुश (घात लगा कर हमला) होने का डर बना रहेगा और फिर पुलिस वाहनों के पर्दे हट गए ।

एक बार वह पीलीभीत में भ्रमण पर आए थे। गोष्ठी के बाद थानाध्यक्षों के साथ चाय पीते समय उन्हें शाबाशी देते हुए पुलिस अधीक्षक सुलखान सिंह जी से पूछा कि अगली ख़ुशख़बरी वह कब देगें, सुलखान सर ने कहा कि प्रयास कर रहे हैं, उन्होंने कहा कि पुलिस अधीक्षक खीरी ने तो एक सप्ताह में देने को कहा है तो सुलखान सिंह ने कहा कि वह पकड़ कर बिठाए होंगे, मेरे पास तो ऐसा कोई नहीं है। फिर वह मुझसे यही पूछा तो मैंने कहा कि एकाध सप्ताह में। वह हंस पड़े और कहा- सुलखान, बद्री को देखो, मैं जानता हूँ कि आतंकी पकड़ना या मारना रोज़ रोज़ नहीं होता लेकिन वरिष्ठ तथा कनिष्ठ का हौसला बढ़ाने के लिए ऐसी बात कभी-कभी कहनी भी चाहिए। सुलखान सिंह जी ईमानदार होने के साथ स्पष्टवादी भी थे। इसी के बाद एक पूर्व विधायक जी आकर अपनी सुरक्षा हेतु गनर की माँग की तो उन्होंने सबके सामने ही कह दिया कि पूर्व विधायक जी, कुकृत्य न करो, खतरा नहीं होगा। अगले दिन प्रेस में यह ख़बर नमक मिर्च के साथ छपी।

आतंकियों द्वारा भीषण नर संहार

पीलीभीत के ईमानदार और कर्मठ पुलिस अधीक्षक सुलखान सिंह जी के स्थानांतरण के पश्चात नये पुलिस अधीक्षक प्रकाश सिंह की पसंद न होकर मा. मुख्यमंत्री के पुत्र की पसंद के थे और प्रकाश सिंह जी ने मुख्यमंत्री सचिवालय को लिखित सूचित भी कर दिया था कि यह अधिकारी आतंकवाद से लड़ने में सक्षम नहीं है और उसके कृत्य का उत्तरदायित्व उनका नहीं होगा। उनके इस पत्र को मा.मुख्यमंत्री जी कार्यालय ने मुख्यमंत्री के अधिकार पर कुठाराघात मान कर तीखी प्रतिक्रिया भी की थी। वह जब पीलीभीत भ्रमण पर आए तो मुझे बता दिया कि नया एसपी अयोग्य है, आतंकवाद मुझे ही पहले की तरह देखना है,सिखों का यदि उत्पीड़न हुआ या उनसे धन वसूली की गयी तो मेरी भी संलिप्तता मानी जाएगी। “भई गति सांप छछून्दर केरी” वाली स्थिति मेरी हो गई थी।

जब वह पीलीभीत आते, कप्तान से बात न कर मुझे ही डांटते।उनका व आईजी ज़ोन रमेश चंद्र दीक्षित “दुर्वासा जी” का स्नेह मुझे प्राप्त था इसलिए सब निभ जाता था। दि.३१ जलाई १९९२ को गजरौला थाना क्षेत्र के शिवनगर गाँव के कुछ ग्रामीण थाने पर आकर बताए कि उनके गाँव के कुछ लड़के जंगल में कटेरुआ (एक जंगली मशरूम जो साल या साखे पेड़ की जड़ से निकलती है और प्रोटीन का अच्छा श्रोत व सब्जी के रूप में मंहगा बिकता है) बीनने गए थे वापस नहीं लौटे। ऐसी ही सूचनाएं घुंघचाई चौकी को भी मिली। हम सतर्क हुए और रात बीतने पर हम सीमा सुरक्षा बल , पीएसी तथा जिले का पुलिस बल लेकर गढ़ा वन क्षेत्र में तलाशी अभियान में लग गये। थोड़ी देर में इधर उधर बिखरे २९ ग्रामीणों के शव जंगल में मिले। कुछ को गोलियाँ मारी गई थीं कुछ का गला घोंटा गया था व कुछ पर धारदार हथियार के निशान थे। इस हृदय विदारक घटना को सुनकर सारा जनपद शोक में डूब गया व लखनऊ में कोहराम मच गया। यह रुद्रपुर के बम ब्लास्ट के बाद तराई क्षेत्र की सबसे त्रासद घटना थी। सभी के शवों का विच्छेदन कराकर शव उनके परिजनों को सुपुर्द किया गया। आईजी डीआईजी व पड़ोसी जनपदों के पुलिस अधिकारियों ने मौक़े का मुआयना किया।

पता चला कि इस जंगल में ४-५ आतंकियों ने इन लड़कों को जंगल में जाने से मना कर रखा था लेकिन वे बग़ैर पुलिस को यह बात बताए २ दिन रुकने के बाद पुनः पैसे के लोभ में जंगल में कटेरुआ बीनने गए थे जहाँ आतंकियों ने उनको पुलिस मुखबिर के शक में हत्या कर दी। पता चला कि यह कृत्य भिंडरावाले टाइगर ग्रुप आफ खालिस्तान के सतनाम सिंह छीना गैंग का था जो उस समय तराई का सबसे ख़ूँख़ार गैंग था।

इस घटना के बाद कांबिंग , तलाशी, ऐंबुश तेज़ किए गए और क्षेत्रीय लोगों को तत्काल बंदूक़ लाइसेंस कैंप लगाकर बाँटे गये ।घटना के ३ दिन बाद डीजीपी प्रकाश सिंह आकर घटनास्थल का निरीक्षण कर विस्तृत जानकारी ली और पूरनपुर के चीनी मिल के अतिथि गृह में वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की बैठक ली जिसमें पीलीभीत, नैनीताल खीरी व शाहजहांपुर के पुलिस प्रभारियों व वरिष्ठ अधिकारियों के अलावा लखनऊ से आए पीएसी, अभिसूचना विभाग व आसूचना ब्यूरो IB के वरिष्ठ अधिकारी सम्मिलित थे। इस गोष्ठी में पुलिस अधीक्षक से निम्न मात्र दो अधिकारी थे-एक अपर पुलिस अधीक्षक आतंकवाद अभियान पीलीभीत मैं, दूसरे इसी पद पर नैनीताल में कार्यरत सुशील कुमार सिंह। मैं तो इस शोक बारात का दूल्हा ही था।

प्रारम्भ एआईजी टास्क फोर्स गिरिराज शाह से हुई। उन्होंने नालायकी , अक्षमता, कायरता का सारा ठीकरा पीलीभीत पुलिस पर फोड़ते हुए कहा कि वह आतंकियों की सटीक सूचना वह पीलीभीत भेजते हैं ,पीलीभीत पुलिस कुछ करती ही नहीं, उसे जंगल में घुसने से ही डर लगता है। एआईजी टास्क फोर्स नया पद था जो आईजी बरेली के अधीन रहकर सभी आतंक प्रभावित क्षेत्र की मानीटरिंग करता था और डीजीपी कार्यालय से सीधे संपर्क रखता था। अपने पुलिस अधीक्षक को चुप देख मैं रोष से इसका प्रतिवाद करना चाहा, डीजीपी ने इशारे से बिठा दिया व शाह जी से बोले कि जब उनके पास निश्चित सूचना थी तो उन्होंने स्वयं कार्रवाई क्यों नहीं की, उनको इसके लिए अलग से बल दिया गया है। वह ख़ामोश हो गये। डीजीपी ने पुनः कहा कि यह उनकी निष्क्रियता थी और इन २९ मृतकों की हत्या का उत्तरदायी उनको क्यों न माना जाय? गोष्ठी में सन्नाटा छा गया।

फिर अभिसूचना मुख्यालय से आए डीआईजी वीके का नंबर आया, उन्होंने भी कहा वे आतंकियों की गतिविधियों की सूचना जिलों को नियमित भेजते रहते हैं, कार्रवाई तो जिलों को ही करना है। मैं फिर प्रतिवाद हेतु खड़ा हुआ तो डीजीपी ने फिर इशारे से मुझे बिठा दिया। मैं प्रत्येक स्रोत से प्राप्त सूचना मय रजिस्टर व पत्रावली के साथ लाया था और सुरक्षा एजेंसियों को आईना दिखाना चाहता था लेकिन मौक़ा नहीं मिल रहा था। जनता, अधिकारियों प्रेस का दबाव तो था ही, २९ शव भी मेरी नपुंसकता पर कहकहे लगा रहे थे, मैं अत्यधिक तनाव में बैठा अपने ऊपर लगे तथ्यविहीन आरोपों को मौन होकर सुन रहा था।

अब सीमा सुरक्षा बल की बारी आई। ४८वी बटालियन मेरे आपरेशनल कंट्रोल में थी और उसको पी एस चहल कमांड कर रहे थे तथा शास्त्री जी सेकंड कमांड में थे। चहल प्रकाश सिंह जी के अधीन सीमा सुरक्षा बल में रह चुके थे और डीजीपी उन्हें जानते व मानते थे। चहल ने उक्त सभी आरोपों का दृढ़ता से खंडन करते हुए मेरी प्रशंसा करते हुए पीलीभीत पुलिस को जुझारू फोर्स बताते हुए प्रतिदिन घने जंगलों में कांबिंग, ऐम्बुश की बात की। नागा सशस्त्र दल की दो कम्पनी इस आपरेशन में दी गयी थी, उसके कमांडेंट आलम (जो बाद में डीजीपी नागालैंड भी बने थे) ने चहल का समर्थन किया। पीएसी टास्क फोर्स बरेली के कमांडेंट सुभाष गुप्त ने भी चहल का समर्थन किया।

अब बारी आई आईजी बरेली ज़ोन रमेश चंद्र दीक्षित जी की जो ईमानदार, स्पष्ट वक्ता और नो नानसेंस मैन थे साथ में अत्यधिक क्रोधी भी, जिसके कारण वह उत्तर प्रदेश पुलिस में दुर्वासा के नाम से प्रसिद्ध थे। उन्होंने पीलीभीत पुलिस पर लगाए गए अकर्मण्यता, कायरता के आरोपों की धज्जियाँ उड़ाते हुए कहा कि वह स्वयं पीलीभीत पुलिस की कांबिंग बग़ैर बताए हुए कभी कभी चेक करते हैं और हर बार वह उन्हें पुलिस घने जंगलों में घुसी या जंगल से निकलते हुए मिली। आतंकवाद के विरुध्द आपरेशन में पीलीभीत पुलिस तराई में सर्वश्रेष्ठ है। अब मुझे सुकून मिला। मुझे उनसे ऐसी प्रशंसा की उम्मीद नहीं थी।

अब बारी थी मुख्य अभियुक्त यानी मैं। मैंने अपने प्रयासों को संक्षेप में बताते हुए कहा कि पीलीभीत में ६ वन प्रभाग हैं और उनका क्षेत्रफल लगभग १५०० वर्ग किलोमीटर है व उनसे लगे सिखों के झाले व गन्ने के खेत हैं। सिख प्रेम या भय से आतंकियों की सूचना नहीं देता और अभिसूचना विभाग बड़ी गोल सूचना देकर सटीक सूचना बताता है कि अमुक जंगल में आतंकी देखे गए हैं। २५०-३०० वर्ग किलोमीटर के जंगल में हम कहाँ तलाशे, हमारी मुख्य समस्या यही है। मैंने उन्हें बाहर से प्राप्त सूचनाओं की पत्रावली दिखाना चाहा तो उन्होंने मना करते हुए कहा कि उन्हें पता है। वह बोले कि कल वह कांबिंग करना चाहते हैं , मैं कांबिंग का कार्यक्रम बनाऊँ। मैंने कहा कि मैं कार्यक्रम बना तो दूँ पहले अभिसूचना एजेंसियाँ बताएँ कि आतंकियों की आज उपस्थिति कहाँ है। सभा में शांति छा गयी और सभी ने सर झुका लिए।

अंत में पुलिस अधीक्षक आसूचना (IB)ने कहा कि महोफ जंगल में भारामल की पुलिया के पास एक समूह रह रहा है। डीजीपी ने वहीं कांबिंग की स्वीकृति दी तो मैंने उन्हें रोकते हुए कहा कि भारामल पुलिया पीलीभीत में नहीं अपितु नैनीताल के सुरई वन रेंज में है॥ मैंने सुशील कुमार सिंह से इसकी पुष्टि कराते हुए दुर्वासा जी को याद दिलाया कि कुछ दिन पूर्व जब सुरई रेंज में नैनीताल व पीलीभीत पुलिस की साझा तलाशी अभियान चल रहा था तो उन्होंने एक पुलिया पर बैठे सीमा सुरक्षा बल की एक टुकड़ी को टोका था, वहीं भारामल पुलिया है। दुर्वासा जी ने न जानकारी के लिए आईबी के एसपी को डाँटा भी। प्रकाश सिंह जी ने शांत स्वर में कहा कि ठीक है कोई स्पष्ट सूचना के अभाव में अपने अनुसार कार्यक्रम मैं बनाऊँ।

मैंने अवसर देख कर डीजीपी से अनुरोध किया कि आतंकवाद की समीक्षा हेतु जो भी वरिष्ठ अधिकारी उनके द्वारा यहाँ भेजे जाते हैं वे लखनऊ से चलकर दोपहर यहां पहुचते हैं और मुझसे यहाँ पीलीभीत के नक्शे पर आतंकवाद समझते हैं और अव्यवहारिक राय देकर शाम ४ बजे से पूर्व डबल इस्कार्ट के साथ लखनऊ के लिए निकल जाते हैं जिससे सूर्यास्त के पहले खीरी जनपद की सीमा पार कर सकें। उनका कोई योगदान नहीं रहता। कृपया किसी योग्य अधिकारी को इसके लिए लगाएं जिसे इस क्षेत्र की भौगोलिक व आतंकी गतिविधियों की जानकारी हो। डीजीपी ने डीआईजी सत्यव्रत बंसल को इसके लिए नियुक्त कर मेरी राय मांगी तो मैने कहा कि वह नैनीताल में वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक रहे हैं वह बेहतर रहेंगे। इसके बाद गोष्ठी समाप्त हो गई और डीजीपी, आई जोन, डीआईजी रेंज के अलावा सभी अधिकारी चले गए स्थानीय पुलिस अधिकारियों में मैं व सीओ पूरनपुर ही वहाँ रह गये।

डीजीपी, आईजीजोन, डीआईजी बरेली वहीं चीनी मिल अतिथि गृह में ही रुके। मैं पूरनपुर में बी.एस.एफ. टेकहेडक्वार्टर में रहता था और अधिकारियों के रहने की व्यवस्था कर वहीं जाकर कल की कांबिंग की योजना बनाई। कल की कांबिंग मेरे अनुभव, ज्ञान व व्यवसायिक दक्षता की ऐसी परीक्षा थी जिसमें मुझे सफल होना अनिवार्य था। मैं योजना बना कर चीनी मिल अतिथि गृह आ गया।
लगभग ८ बजे रात डीआईजी बरेली अशोक पांडेय जी ने मुझे बुलाकर मेरी योजना पूछी। मैने बताया कि “पीलीभीत लखनऊ रेलवे लाइन को मध्य में लेकर गजरौला सें पूरनपुर जाने वाली पक्की सड़क से एक पुलिस टीम तथा माधोटाडा से पीलीभीत जाने वाली जंगल रोड से दूसरी पुलिस टीम घुसेगी और दोनों टीमों का मिलान रेलवे पटरी पर होगा।”

“दोनों टीमों को कितना चलना होगा?”

जंगल सड़क वालोंको ११ किलोमीटर तथा पूरनपुर पक्की रोड वालों को लगभग ९ किलोमीटर , मैंने उत्तर दिया ।

“जंगल का टेरेन?” कठिन है, बीच बीच में बेंत की कँटीली झाड़ियाँ भी हैं, मैंने उत्तर दिया। “और आतंकियों की वहाँ उपस्थित? “पूर्ण संभावना है, उधर उनकी गतिविधियों देखी गयीं है, पुनः उत्तर दिया ।इसके बाद तो वह रौद्र रूप में आकर कहने लगे कि मेरा दिमाग़ ख़राब है क्या, डीजीपी कँटीली झाड़ियों में आतंकियों की उपस्थिति में १० किलोमीटर कांबिंग करेंगे ? उन्हें कुछ हो गया तो? मैंने पूछा तो फिर कैसे बनाएं? उन्होंने दूरदर्शिता व अनुभव का परिचय देते हुए सलाह दी कि किसी सुरक्षित जंगल में किनारे से एक किलोमीटर जंगल क्षेत्र की कांबिंग का कार्यक्रम मैं बना दूँ और उनके जंगल में जाने से पहले उस क्षेत्र की पुलिस से कांबिंग करा दूँ जिससे भीतर कोई हादसा न हो। तनाव झेलते झेलते मैं टूट सा गया था, मैंने ज़ोर से कहा कि मरने के लिए केवल बद्री या छोटा पुलिसकर्मी ही क्यों, डीजीपी या आप क्यों नहीं?डीजीपी ने कांबिंग योजना के लिए मुझसे कहा है, पिकनिक के लिए नहीं। वह आए हैं तो देखें, फील्ड आफिसर्स की क्या समस्याएं हैं। मैं यह कार्यक्रम नहीं बदलूँगा उनकी इच्छा हो तो कांबिंग करें या न करें।

डीआईजी मेरा हाथ पकड़कर आई जी के कक्ष में घसीटते हुए ले लाए। वह भी पुलिस उपाधीक्षक से डीआईजी तक गये थे और लम्बे चौड़े, मोटे तथा ५७-५८ वर्ष के थे। दुर्वासा से हम सभी डरते थे। हम उनके कक्ष में जैसे ही तेज़ी से घुसे, वह लेटे थे घबरा गये और बोले क्या हुआ? वह समझे कि जनपद में कहीं भीषण आतंकी हमला हुआ है। मैंने झट से कहा कि सब कुशल है, डीआईजी सर कल की योजना पर आपसे बात करेंगे, तब वह सामान्य हुए। डीआईजी के कहने पर मैंने उन्हें भी पूरी योजना समझाई। वह बोले ,ठीक तो है। डीआईजी ने शंका की कि जंगल में इतनी दूरी की कांबिंग में अगर डीजीपी को कुछ हो गया तो? तो क्या? मरने के लिए कनिष्ठ अधिकारी ही हैं डीजीपी मैं व तुम भी तो सिपाही हैं हम भी तो ड्यूटी में मर सकते हैं , उन्होंने कहा। डीआईजी के अगर मगर के बाद भी वह मेरी योजना को स्वीकृति देते हुए अंतिम निर्णय डीजीपी पर छोड़ दिया।

रात्रि भोज के बाद डीजीपी ने मुझसे कल की योजना के विषय में जानकारी ली। मैंने उन्हें पूरी योजना सर्वे आफ़ इंडिया के नक़्शे पर समझाया। यह ज्ञान मैने बी.एस. एफ. से सीखा था। उन्होंने दोनों पार्टियों का व्यवस्थापन (डिप्लावमेंट) पूछा तो मैंने बताया कि जंगल रोड से रेलवे लाइन ११ किलोमीटर हैं व उस दल में एक बटालियन बी.एस. एफ. व दो सीओ व कुछ थानाध्यक्ष अपने बल के साथ हैं । दूसरी पार्टी को ९ किलोमीटर पैदल चलना है उसमें दो कंपनी नागा सशस्त्र बल, पीएसी व दो सीओ व कुछ थानाध्यक्ष हैं, मैने कहा।”नागा कैसे हैं? “जंगल कांबिंग में दक्ष लेकिन अनुशासन में लचर,मैने उत्तर दिया। “कैसे? जंगल में घुसने के बाद वह अनियंत्रित हो जाते हैं और कोई जानवर या अन्य शिकार देखते ही उसके पीछे भागते हैं। बाहर निकलने पर उनके जवान साथ बाहर नही बाहर आते, हमें प्रतीक्षा करनी पड़ती है, मैने समझाने का प्रयास किया।” ऐसा क्यों, उनके अधिकारी क्यों नहीं इसे देखते? “वे कहते हैं कि इस बल में कुछ आत्मसर्मपण किए हुए विद्रोही हैं यदि उन पर कड़ा अनुशासन थोपा गया तो वे रायफल साथ लेकर भाग भी सकते हैं। ओह! बीएसएफ कैसी है? रियल फाइटर, बेटर दैन सीआरपीएफ , मैंने कहा। मेरे लिये तुम्हारा क्या सुझाव है? बीएसएफ , उसे चहल कमांड कर रहा है, मैने उत्तर दिया। हाँ , वह असली जाट है बहादुर और निडर। ठीक है कब चलना है? ५.३० बजे प्रातः ,मैने बताया । दीक्षित जी आप भी चलेंगे क्या ? जी सर , मैं दूसरी पार्टी में रहूंगा, आईजी ने जवाब दिया॥ लेकिन बद्री ,यह बताओ कि सर्वे आफ इंडिया के नक़्शे से कांबिंग कहां से सीखा? बीएसएफ के टैक हेड क्वार्टर में सप्ताह मे ३-४ दिन रहता हूँ , वहीं से यह युद्ध कला सीखी सर, मैने जवाब दिया॥ शाबाश !कल मिलते हैं।

यह वार्तालाप आईजी व डीआईजी की उपस्थिति में हुआ। डीआईजी ने मुझे निर्देशित किया कि कल कांबिंग में पुलिस अधीक्षक डीजीपी के साथ नहीं रह कर दूसरी पार्टी में रहेंगे क्योंकि उन्हें कांबिंग का ज्ञान नही है और डीजीपी के प्रश्नों का सही उत्तर न देकर असहज करेंगे, उन्होंने मुझे डीजीपी के साथ रहने का आदेश दिया।

इसके बाद आईजी डीआईजी भी अपने कक्ष में चले गये और रह गया लड़की का बाप मैं और चचा सीओ पूरनपुर राजेंन्द्र यादव जो मेरा सहयोगी, विश्वस्त और बहादुर योद्धा था। हम दोनों पहले सर्वे आफ इंडिया के संबंधित क्षेत्र का फोटोस्टेट मशीन से बड़े नक्शे की कुछ छायाप्रतियां टोली लीडर व उसके ऊपर वाले अधिकारियों के लिए तैयार कर उसमें उचित स्थान चिह्नित किए फिर थाना पूरनपुर में बैठकर देर रात तक पूरी योजना बनाई कि कौन थाना या पीएसी कहां लगेगी, कैसे स्टार्टिंग प्वाइंट पर पहुंचेगी, गाइड कौन होगा, कांबिंग बाद खाना, उनकी सकुशल वापसी कैसे होगी ,आदि। कल नया इतिहास रचा जाएगा जब विश्व के सबसे बड़े पुलिस बल का मुखिया तराई के घने जंगल में पैदल कांबिंग करेगा। कल क़यामत का दिन होगा, इसी तनाव में मैं रात में सो भी न सका।

जारी…

लेखक बद्री प्रसाद सिंह रिटायर आईपीएस अफ़सर हैं.


इसके पहले का पार्ट पढ़ें-

https://www.bhadas4media.com/ips-prakash-singh-sansmaran-part-one/

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