पत्रकारों के लिए अब सच बोलना बहुत मुश्किल होता जा रहा है। संसद में देश की सुरक्षा से जुड़े सवालों के जवाब नहीं मिल रहे!एक किताब से आपको डर लगता है! किताब रोकने के लिए हर-हथकंडे अपनाए जा रहे हैं!#EpsteinFiles पर खामोशी और सन्नाटा है! दूसरे देशों में जिन लोगों का Epstein Files में नाम भर आया है, उनके इस्तीफे हो रहे हैं, कार्रवाई हो रही है, सफाई पेश की जा रही है! लेकिन हमें किसी से क्या लेना देना! हम तो ट्रेड डील की माला पहनकर खुशियों में झूम रहे हैं! सवाल पूछने वाले पत्रकारों की जुबान और कलम पर रोक लगाई जा रही है! Ravi Nair एक बेहतरीन फाइनेंशियल इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट हैं, जिन्हें देश विदेश में सुना और पढ़ा जाता है, उन्होंने कई महत्वपूर्ण स्टोरीज सामने लाई हैं, कई फाइनेंशियल गड़बड़ियों का उद्घाटन किया है। बात अब उनके “दोस्तों” के हितों पर आ गई है इसलिए पत्रकारों को भी खामोश किया जा रहा है और कितने अच्छे दिन चाहिए ! अघोषित इमरजेंसी चल रही है ! मानहानि के मुकदमें में खोजी पत्रकार रवि नायर को एक साल की सजा बेहद असाधारण फैसला है। ये सजा गुजरात में मंसा के न्यायिक मजिस्ट्रेट ने अडानी द्वारा दायर एक केस में सुनाई है। रवि नायर ने अडानी से लेकर अंबानी और कई बड़े पूंजीपतियों के सरकार से सांठगांठ पर कई खुलासे किये हैं।
-आशू नैथानी
नई दिल्ली। देश की मीडिया जगत में एक बार फिर अदानी समूह और पत्रकारों के बीच क़ानूनी टकराव सुर्खियों में है। हाल में गुजरात की एक मजिस्ट्रेट अदालत ने पत्रकार रवि नायर को अदाणी इंटरप्राइजेज लिमिटेड (AEL) के खिलाफ मानहानि (defamation) मामले में एक साल की जेल और जुर्माने की सज़ा सुनाई है — आरोप है कि उनके ट्वीट और ऑनलाइन बयान समूह की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाले थे।
इससे पहले दिल्ली की एक अदालत ने सितंबर 2025 में निचली अदालत द्वारा जारी एक आदेश को चुनौती देने वाले चार पत्रकारों — रवि नायर, अबिर दासगुप्ता, अयस्कान्त दास और अयुष जोशी — का पक्ष सुना और गैग ऑर्डर को रद्द कर दिया था, जिसमें उन्हें कथित “मानहानिकारक सामग्री” हटाने के लिए कहा गया था।
अदाणी के खिलाफ दायर मानहानि मुकदमों में अब तक कई पत्रकार और शोधकर्ता नाम जुड़े रहे हैं, जिनके खिलाफ प्रकाशित सामग्री को हटाने या रिपोर्टिंग रोकने के निर्देश भी अदालतों ने दिए हैं। उन मुकदमों में रवि नायर, पारनजॉय गुप्ता ठाकुरता, अबिर दासगुप्ता, अयस्कान्त दास और अयुष जोशी जैसे नाम सामने आए हैं, जिन पर आरोप है कि वे समूह के ख़िलाफ़ सामग्री प्रकाशित करते समय “अप्रत्यक्ष” या “असत्य” दावे कर रहे थे।
पत्रकार संगठनों ने कहा है कि ऐसे मुकदमे प्रेस फ़्रीडम पर दबाव का संकेत हैं और वे गंभीर रूप से स्वतंत्र पत्रकारिता पर असर डाल सकते हैं। अदालतों में जारी कार्रवाई यह दिखाती है कि अब बड़े कॉर्पोरेट समूहों के खिलाफ रिपोर्टिंग करते समय पत्रकारों को क़ानूनी जोखिम का सामना करना पड़ रहा है।
पत्रकार सौमित्र राय लिखते हैं-
इससे पहले ख़बर थी कि गौतम अदानी पत्रकारों को डराने के लिए मुकदमे कर रहा है। कल रात गुजरात के गांधीनगर की मानसा कोर्ट ने खोजी पत्रकार और मित्र रवि नायर को अदानी एंटरप्राइजेज के खिलाफ ट्वीट करने के जुर्म में 1 साल जेल की सज़ा सुनाई है।

अदानी का दावा है कि ये ट्वीट झूठे और उसकी बची–खुची इज़्ज़त को मिट्टी में मिलाने वाले हैं। अदानी ने कहा और भारत के सबसे गुलाम राज्य गुजरात की कोर्ट ने मान लिया।
यह सही है कि मानसा कोर्ट के फैसले को ऊंची अदालत का सामना करना पड़ेगा और वह वहां टिकेगा नहीं। लेकिन, मजिस्ट्रियल कोर्ट के इस फैसले से अदानी के कलेजे को ठंडक पहुंची होगी और अपनी दौलत, रसूख पर घमंड भी हो रहा होगा।
रवि नायर अंतरराष्ट्रीय संगठन रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स से जुड़े हैं। इसी RSF ने बीते दिनों बताया था कि अदानी ने अपनी दौलत और रसूख के दम पर भारत के 15 पत्रकारों को अदालती मामलों में घेर रखा है।
मेरे कुछ बचे–खुचे मित्र पत्रकार यह सुझाव दे सकते हैं कि जेल जाने के डर से मैं अदानी को चोर, घूसखोर न कहूं और बिक जाऊं। ऐसा कतई नहीं होगा। मुझे जेल जाने में कोई ऐतराज़ नहीं।
लेकिन, जो सच है उसे बेधड़क कहूंगा। लाज़िम है कि हम देखेंगे।


