अमरेंद्र के किशोर-
कढ़ाई में तली पत्रकारिता या कैमरों की सजी पटकथा?
जब यह खबर आई कि BBC के पूर्व संपादक संजीव श्रीवास्तव ने कचौरी की दुकान खोल ली है, तो सोशल मीडिया से लेकर मीडिया गलियारों तक जैसे हलचल मच गई। किसी ने इसे “पत्रकारिता के पतन” की निशानी कहा, किसी ने “व्यवस्था की विफलता” बताया, तो किसी ने इसे साहसिक प्रयोग करार दिया। लेकिन शोर-शराबे के बीच कुछ बुनियादी सवाल दब गए—क्या सचमुच यह कोई अभूतपूर्व घटना है? क्या पहली बार किसी पत्रकार ने दूसरा पेशा अपनाया है? और सबसे अहम—क्या पत्रकारों में इतनी दूरदर्शिता नहीं होती कि ऊँचे पदों पर रहते हुए वे अपने भविष्य के लिए कुछ संचित कर सकें?
पत्रकारिता कोई सन्यास नहीं है कि एक बार व्रत ले लिया तो जीवन भर उसी में जले-भुने रहें। देश के छोटे कस्बों और गांवों में हजारों पत्रकार हैं जो स्ट्रिंगर के नाम पर काम करते हैं—न नियमित वेतन, न बीमा, न पेंशन, न सामाजिक सुरक्षा। वे खबरें भेजते हैं, जोखिम उठाते हैं, स्थानीय सत्ता से टकराते हैं, और बदले में पाते हैं अस्थिरता। उनमें से कई शाम को दुकान संभालते हैं, कोई खेती करता है, कोई छोटा व्यापार। उनके लिए यह मजबूरी है, जीवन रक्षा की रणनीति है। लेकिन उन पर कोई विशेष चर्चा नहीं होती। वे खबर नहीं बनते, क्योंकि वे “बड़े नाम” नहीं हैं।
तो क्या समस्या यह है कि एक बड़े संस्थान में लंबे समय तक ऊँचे पद पर रहे व्यक्ति ने कचौरी बेचना शुरू कर दिया? क्या चिंता इस बात की है कि प्रतिष्ठा और पेशा बदलने का यह मेल हमारी पूर्व धारणाओं को तोड़ता है? या चिंता इसलिए है कि इससे पत्रकारिता की चमकदार छवि पर खरोंच आती है? यदि कोई वरिष्ठ पत्रकार दुकान खोलता है, तो क्या इसे स्वतः “त्रासदी” मान लिया जाए? और अगर यह सचमुच त्रासदी है, तो फिर यह प्रश्न क्यों नहीं उठता कि इतने वर्षों तक शीर्ष पदों पर रहने के बाद भी भविष्य की आर्थिक सुरक्षा क्यों सुनिश्चित नहीं की गई?
यहाँ सवाल व्यक्ति के निर्णय पर नहीं, बल्कि उस विमर्श पर है जो इस निर्णय के इर्द-गिर्द रचा जा रहा है। अगर आर्थिक संकट था तो यह निजी संघर्ष है; अगर शौक या प्रयोग था तो यह निजी स्वतंत्रता है। लेकिन इसे जिस तरह से प्रस्तुत किया गया—मानो कोई ऐतिहासिक दुर्घटना हो गई हो—वह स्वयं में प्रश्न खड़ा करता है। क्या इतना प्रचार आवश्यक था? क्या यह स्वाभाविक रूप से फैली खबर थी, या पहले से नियोजित मीडिया रणनीति का हिस्सा? जब कैमरे सज-धज कर पहुँचते हैं, पैनलिस्ट चर्चा करते हैं, और सोशल मीडिया पर ‘प्रेरणादायक’ आख्यान बुना जाता है, तो यह सहज घटना नहीं लगती; यह एक निर्मित कथा लगती है।
कभी हिंदी के मूर्धन्य साहित्यकार उपेंद्रनाथ अश्क़ ने भी आजीविका के लिए किराने की दुकान चलाई थी। अनेक पत्रकारों ने ठेला लगाया, घूमा-फिरा कर सामान बेचा। पेशा बदलना जीवन की सच्चाई है। लोग मन बदलते हैं, विकल्प तलाशते हैं, संकट से जूझते हैं या नई राह चुनते हैं। इसमें अस्वाभाविक क्या है? लेकिन हर बार जब कोई बड़ा नाम ऐसा करता है, तो उसे प्रतीक बना दिया जाता है—या तो पतन का, या प्रेरणा का। दोनों ही अतिशयोक्ति हैं।
एक और सवाल असहज करता है—यदि आने वाली पीढ़ी यह देखे कि मीडिया के ऊँचे शिखरों तक पहुँचने के बाद भी अंततः कचौरी-पकौड़ी की दुकान ही खोलनी है, तो क्या वह इस पेशे की ओर आकर्षित होगी? पत्रकारिता पहले ही आर्थिक असुरक्षा, अनुबंध आधारित रोजगार और अनिश्चित भविष्य से जूझ रही है। ऐसे में क्या इस तरह की कहानियों का महिमामंडन नई पीढ़ी को भ्रमित नहीं करेगा? क्या यह संदेश जाएगा कि संस्थान आपको उपयोग कर लेंगे और अंततः आपको अपनी आजीविका के लिए कुछ भी करना पड़ेगा?
यह कहना गलत होगा कि मीडिया की स्थिति उत्तम है। हालात कठिन हैं, विशेषकर जमीनी पत्रकारों के लिए। लेकिन क्या वे इतने भी बदहाल हैं कि दशकों तक शीर्ष पद पर रहने के बाद भी व्यक्ति को फुटपाथनुमा व्यापार ही एकमात्र विकल्प लगे? और यदि यह मजबूरी नहीं, बल्कि चुनाव है, तो फिर इसे ‘संवेदनशील संकट कथा’ की तरह क्यों प्रस्तुत किया जा रहा है? क्या साधारण व्यवसाय को असाधारण घटना बनाकर हम स्वयं अपने पेशे की गरिमा पर प्रश्नचिह्न नहीं लगा रहे?
पत्रकारिता में दूरदर्शिता की बातें करने वाले, अर्थव्यवस्था और नीति पर विश्लेषण लिखने वाले, दूसरों को वित्तीय अनुशासन का पाठ पढ़ाने वाले—क्या अपने जीवन में उस अनुशासन को लागू कर पाए? यह व्यक्तिगत आक्षेप नहीं, बल्कि एक व्यापक प्रश्न है। अगर किसी वरिष्ठ पत्रकार को आजीविका को लेकर अचानक निर्णय लेना पड़ता है, तो यह दूरदृष्टि की कमी का संकेत भी हो सकता है। और यदि यह पूरी तरह योजनाबद्ध प्रयोग है, तो फिर उसे सहज रहने दिया जाना चाहिए था—बिना शोर, बिना आत्म-प्रचार।
मेहनत का हर काम सम्मानजनक है। कचौरी बेचना उतना ही ईमानदार काम है जितना खबर लिखना। समस्या कचौरी नहीं, कथा है; समस्या दुकान नहीं, उसका प्रस्तुतिकरण है। जब मीडिया स्वयं अपने ही पेशे को दया या रोमांच के फ्रेम में रखकर परोसने लगे, तो आत्ममंथन जरूरी हो जाता है।
मेहनत को सम्मान दीजिए, लेकिन उससे मिथक मत गढ़िए। जीवन में पेशा बदलना न तो अपराध है, न पराजय—यह व्यक्ति का अधिकार है। पर उसे पूरे पेशे की सामूहिक शोकसभा का दृश्य बना देना बौद्धिक आलस्य है। असली साहस कढ़ाही के सामने खड़े होने में नहीं, बल्कि आईने के सामने खड़े होने में है। यदि पत्रकारिता की सचमुच चिंता है तो कैमरों का रुख व्यक्ति की ओर नहीं, व्यवस्था की ओर कीजिए।
सवाल किसी एक दुकान का नहीं, उस ढांचे का है जो हजारों को असुरक्षित छोड़ देता है। वरना हम हर कुछ वर्षों में किसी नई कढ़ाही के चारों ओर भीड़ लगाएंगे, तालियां बजाएंगे, आहें भरेंगे—और इस बीच पत्रकारिता की असली आग, जो सवालों से जलती है, धीरे-धीरे राख में बदलती जाएगी।
असल प्रश्न यही है—क्या हम पत्रकारों की संरचनात्मक आर्थिक असुरक्षा पर गंभीर बहस करेंगे? क्या स्ट्रिंगर सिस्टम, अस्थायी अनुबंध और सामाजिक सुरक्षा के अभाव पर विमर्श होगा? या हम केवल बड़े नामों की जीवनशैली को ‘ब्रेकिंग न्यूज़’ बनाकर तालियाँ बजाते रहेंगे? यदि पत्रकारिता को भविष्य देना है, तो उसे प्रतीकों की नहीं, संरचनात्मक सुधार की जरूरत है। अन्यथा कल कोई और वरिष्ठ पत्रकार जब कोई नया व्यवसाय शुरू करेगा, तो हम फिर वही शोर दोहराएँगे—और असली मुद्दे फिर हाशिए पर चले जाएँगे।


