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सुख-दुख

अमर उजाला लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार मो. इरफान का निधन, मंगलवार को डालीगंज कब्रिस्तान में होंगे सुपुर्द-ए-खाक

लखनऊ। हिंदी दैनिक अमर उजाला के वरिष्ठ पत्रकार मो. इरफान का इंतकाल हो गया है। उनके निधन की खबर से मीडिया जगत में शोक की लहर दौड़ गई है। परिजनों और सहकर्मियों के मुताबिक, उन्हें मंगलवार दोपहर एक बजे डालीगंज कब्रिस्तान में सुपुर्द-ए-खाक किया जाएगा।

इरफान लंबे समय से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय रहे और अपनी बेबाक वैचारिक चर्चाओं के लिए जाने जाते थे। उनके साथियों का कहना है कि अभी एक दिन पहले ही पुराने साथी ‘विधि भाई’ के निधन का दुख कम भी नहीं हुआ था कि यह कष्टकारी सूचना आ गई। लगातार दो साथियों के बिछुड़ने से पत्रकार बिरादरी गहरे सदमे में है।

बताया जा रहा है कि लगभग पंद्रह-सत्रह दिन पहले ही उनकी मुलाकात और बातचीत साथियों से हुई थी। एक दिन पहले ही ‘विधि भाई’ से हिन्दुस्तान कार्यालय में चर्चा हुई थी और उससे एक दिन पहले इरफान से उजाला कार्यालय के बाहर वैचारिक संवाद हुआ था। ऐसे में उनका अचानक यूं चले जाना सहकर्मियों को भीतर तक व्यथित कर गया है।

सहकर्मियों ने उन्हें एक सजग, चिंतनशील और आत्मीय पत्रकार के रूप में याद किया है। उनके निधन को पत्रकारिता जगत के लिए अपूरणीय क्षति बताया जा रहा है। ईश्वर से प्रार्थना है कि दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करें और शोकाकुल परिजनों को यह दुख सहने की शक्ति दें।


एक और दोस्त साथ छोड़ गया..
इरफान और मैंने पत्रकारिता साथ-साथ शुरू की थी.. हिंदुस्तान अखबार से.. दुर्भाग्य रहा कि इरफान ने बेहतर संस्थानों में पत्रकारिता की लेकिन पद और वेतन के मामले में स्थिति बहुत अच्छी नहीं रही..
टीवी पत्रकारिता की दुनिया में जाने से पहले आखिरी बार हम अमर उजाला में साथ थे..
बीते सप्ताह ही भाजपा मुख्यालय के बाहर एक साथी ने इरफान के अस्पताल में भर्ती होने की जानकारी दी.. मेरे अस्पताल जाने से पहले ही इरफान दुनिया से चला गया..
मैं अपने काम में व्यस्त रहता हूँ.. व्यस्त रहना मुझे अच्छा भी लगता है लेकिन आज मुझे अपनी व्यस्तता पर क्रोध आ रहा है..
शुरुआती साथियों का यूं चले जाना बेहद दुखद होता है.. पहले विधि भाई.. फिर इरफान..
प्यारे इरफान, तुम जहां भी रहो, मोहब्बत फैलाओ..
हे ईश्वर.. कृपा करो
या मौला.. रहम कर..

-विवेक त्रिपाठी


लखनऊ प्रवास के दिनों में फिर करियर स्टार्ट करने के बाद जब Mohit Dubey सर ने अपने पोर्टल के लिए बतौर रिपोर्टर ज़िम्मेदारी दी तो मर्चरी के बाद रोज़ाना शाम पांच बजे लोकल क्राइम की ब्रीफिंग जानने के लिए कमांड जाना होता था. कमांड में ही पहली बार देखा था हिंदुस्तान अख़बार में वरिष्ठ संवाददाता रहे दिवंगत विधि सिंह जी को. ग़ज़ब का ऑरा लेकिन बेहद साधारण सा व्यक्तित्व.

बहुत फॉर्मल जान पहचान नहीं थी विधि सर से लेकिन नमस्ते का जवाब बड़ी सौम्यता से देते थे. कई बार तो ऐसे मौके भी आए जब ख़ुद आकर उन्होंने हाल चाल लिया. लखनऊ छूटा तो विधि जी और तमाम लोग छूट गए.

अभी बीते दिनों ही तमाम लखनऊ वाले पत्रकारों और कुछ पुलिस वालों की पोस्ट से पता चला कि विधि जी नहीं रहे. हार्ट अटैक आया था. मौत की उस खबर ने बड़ा विचलित किया. लगा कोई अपना चला गया. फिर आज मालूम हुआ कि अमर उजाला के मुस्लिम बीट के पत्रकार इरफ़ान भाई ने भी इस दुनिया को अलविदा कह दिया.

यूँ तो इरफ़ान भाई से मुलाक़ात फील्ड में हुई थी लेकिन Shakeel Rizvi Syed चाचा Jawed Zaidi मामा और Naved Shikoh भाई और Syed HR Ali Tahir Rizvi जैसे लोगों की बदौलत इरफ़ान भाई से रिश्ता फॉर्मल नहीं रहा.

चाहे सिविल हॉस्पिटल चौराहा हो या फिर जागरण चौराहा और छोटा इमामबाड़ा अक्सर इरफान भाई से मिलना हो जाता था. कई मौके वो भी आए जब मुस्लिम बीट से जुड़ी खबरों में भी उन्होंने बड़े भाई की तरह मदद की.

जैसा कि ऊपर बताया लखनऊ छूटा तो बहुत से लोग छूटे फिर आज इरफ़ान भाई का समाचार मिला. नहीं रहे इस दुनिया में. बीमार थे और इलाज चल रहा था. इलाज और अच्छा हो सकता था लेकिन लखनऊ जैसे शहरों में अखबार में काम करने वालों की क्या स्थिति है किसी से छिपी नहीं है (ईमानदारी से काम करने वालों की स्थिति और ज़्यादा दयनीय है)

बहरहाल … विधि जी और इरफान भाई ईश्वर आप दोनों की आत्मा को स्वर्ग में स्थान और घरवालों को इस दुःख को सहने का हौसला दे.

-बिलाल एम जाफरी


अलविदा ‘इरफ़ान आग’

​”वो शमा बुझ गई जिसे ‘आग’ ने पाला था,
मगर ज़हन में अब भी वही ‘उजाला’ है।”

​अत्यंत भारी मन और भीगी आँखों के साथ अपने छोटे भाई समान प्यारे दोस्त और जुझारू पत्रकार मोहम्मद इरफ़ान (अमर उजाला) को रुख़सत कर रहा हूँ। इरफ़ान का जाना महज़ एक इंसान का जाना नहीं, बल्कि पत्रकारिता के उस ‘तपते हुए’ दौर का अंत है जिसने समाज के अंधेरों से लड़ना सीखा था।

इरफ़ान की पत्रकारिता का फलसफा भी बड़ा दिलचस्प रहा। करीब बीस साल पहले उन्होंने ‘आग’ अखबार से अपने करियर की इब्तिदा की थी। लोग अक्सर आग से बचते हैं, लेकिन इरफ़ान ने उस ‘आग’ को ओढ़ लिया। उसी की तपिश और रोशनी लेकर वे ‘अमर उजाला’ के आंगन में आए। आज भी सैकड़ों दोस्तों और हमारे मोबाइल कॉन्टैक्ट्स में उनका नाम ‘इरफ़ान आग’ के रूप में महफूज़ है। यह महज़ एक नाम नहीं, बल्कि उनके मिज़ाज की उस गर्मी का डिजिटल गवाह है जो दूसरों के दुःख-दर्द को देखकर उबल पड़ती थी।

हम अक्सर मज़ाक में कहते थे— “मियां इरफ़ान, तुम्हारे नाम में ‘आग’ है, ज़रा संभल के!” पर किसे पता था कि यह आग एक दिन बुझकर हमें बर्फ जैसी खामोशी दे जाएगी।

दोस्त इरफान, तुम वाकई खुदा के पसंदीदा बंदों में से थे। तुम्हारी अज़मत और शराफत का इससे बड़ा सुबूत और क्या होगा कि अल्लाह पाक ने तुम्हें ‘माहे-रमज़ान’ के पहले अशरे में अपने पास बुलाया। मौत तो बरहक है और सबको आनी है, लेकिन ऐसी बा-बरकत मौत की ख्वाहिश तो हर मोमिन के दिल में होती है। तुमने ता-उम्र लोगों के आंसुओं को ज़ुबान दी, शायद इसीलिए कुदरत ने तुम्हें इनाम में यह रूहानी विदाई अता की। बारी तआला मरहूम की मग़फ़िरत फ़रमाए, उन्हें जन्नत-उल-फ़िरदौस में आला मक़ाम अता करे और उनके अहले-खाना (परिवार) को इस अज़ीम सदमे को बर्दाश्त करने के लिए ‘सब्र-ए-जमील’ अता फ़रमाए।

“अजीब शख़्स था ‘आग’ से रोशनी ले आया,
जो खुद तो बुझ गया पर यादें ‘अमर’ कर गया।”

-मंसूर अली

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