Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

सियासत

अबकी ईरान को निपटा कर मानेगा अमेरिका, युद्ध तय है!

नितिन त्रिपाठी-

पश्चिम एशिया के आसमान में फिर बारूद की गंध घुली हुई है। अमेरिकी युद्धपोत यूएसएस जेराल्ड फोर्ड अपने पाँच हज़ार नाविकों के साथ क्षेत्र में तैनात है। कुछ महीने पहले बी-2 बॉम्बर ने ईरान की परमाणु सुविधाओं को निशाना बनाया था। अब सवाल यह नहीं कि तनाव है या नहीं, सवाल यह है कि अगला वार कब होगा। युद्ध की आहट अक्सर गोलियों से पहले आती है, और इस समय वह आहट साफ़ सुनाई दे रही है।

पिछले पचास वर्षों में मध्य-पूर्व की शक्ति-संतुलन की तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। कभी तेहरान को “पूर्व का पेरिस” कहा जाता था। ईरान विकास की राह पर था, शिक्षा, उद्योग और सांस्कृतिक खुलापन—सब कुछ मौजूद था। फिर धीरे-धीरे मजहबी उन्माद ने राज्य की दिशा बदल दी। पड़ोसी देशों—सऊदी, क़तर, यूएई—ने अपने-अपने तरीके से विकास और मजहब के बीच संतुलन साधने की कोशिश की, और आज वे आर्थिक रूप से संपन्न, वैश्विक रूप से प्रभावशाली राष्ट्र माने जाते हैं। ईरान ने अलग राह चुनी, और उसका मूल्य चुकाया। 1985-86 में जिसकी अर्थव्यवस्था भारत के आसपास थी, वह आज भारत की तुलना में बहुत पीछे छूट चुका है; शक्ति के समीकरण में वह सीरिया जैसे संकटग्रस्त देशों के समकक्ष दिखने लगा है।

आज की स्थिति में ईरान लगभग अलग-थलग है। अमेरिका की सैन्य शक्ति उसके दरवाज़े पर है। चीन दूर बैठा है, रक्षा उपकरण देता है—पर वह सहायता केवल डेमो मात्र है अपने रक्षा उपकरण दूसरे देशों को बेचने के लिए। अमेरिका अपने आक्रामक हथियारों की क्षमता परखता है, चीन अपने रक्षा सिस्टम की। मैदान किसी और का, प्रयोग किसी और का। अंततः नुकसान उसी भूमि का होता है जहाँ गोलियाँ चलती हैं।

ऊपर से देखने पर लगता है कि इज़राइल चारों ओर से इस्लामी देशों से घिरा है। लेकिन परतें हटाकर देखें तो सऊदी अरब, यूएई जैसे प्रभावशाली देश अमेरिका के घनिष्ठ सहयोगी हैं। शक्ति-संतुलन की इस नई शतरंज में ईरान के साथ खुलकर खड़े होने वाले देश बहुत कम बचे हैं। परिणाम का अंदाज़ा लगाना कठिन नहीं।

इसी बीच दुनिया के कई देश—भारत सहित—अपने नागरिकों को ईरान से निकालने में जुटे हैं। जब सरकारें अपने लोगों को वापस बुलाने लगें, तो समझ लीजिए कि हालात कूटनीतिक बयानबाज़ी से आगे बढ़ चुके हैं।

यह कहानी किसी एक देश की हार या जीत की नहीं है। यह उस चुनाव की कहानी है जो राष्ट्र करते हैं—विकास और संतुलन का, या कट्टरता और अलगाव का। इतिहास ने कई बार दिखाया है कि जब नीति पर उन्माद हावी हो जाता है, तो ताक़तें बाहर से नहीं, भीतर से टूटती हैं।

और अंत में युद्ध किसी विचारधारा को नहीं जलाता—वह सबसे पहले इंसानों को जलाता है।


ईरान पर हमला करने के लिए तैयार है अमरीका

संयुक्त राज्य अमेरिका ने अपने सबसे आधुनिक लड़ाकू विमान F‑22 रैप्टर के 11 जेट इज़राइल के नेगेव रेगिस्तान में ओवदा एयरबेस पर तैनात कर दिए हैं। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ।

F-22 का काम बम गिराना नहीं होता। यह दुश्मन के रडार और एयर डिफेंस सिस्टम को नष्ट करता है, ताकि दूसरे भारी बमवर्षक सुरक्षित अंदर जा सकें।

यानी F-22 “पंच” नहीं है, बल्कि ढाल हटाने वाला हाथ है—जो रास्ता साफ करता है।

इस इलाके में F-22 का मतलब है ईरान की एयर डिफेंस (जैसे S-300/S-400) को अंधा करना और नष्ट करना।

जब रास्ता साफ हो जाता है, तब B‑2 स्पिरिट जैसे बमवर्षक GBU‑57 जैसे भारी बंकर-बस्टर बम लेकर लक्ष्य तक पहुँच सकते हैं।

F-22 बहुत कम हैं (करीब 180 ही ऑपरेशनल)। उनमें से 11 को आगे तैनात करना सिर्फ संकेत देने के लिए नहीं किया जाता।

साथ-साथ बहुत कुछ पहले ही हो चुका है:

कैरियर स्ट्राइक ग्रुप्स तैनात हैं

सैकड़ों लड़ाकू विमान

टैंकर, AWACS, गोला-बारूद की बड़ी खेप पहुंच गई है।

दूतावासों की निकासी और नागरिकों के लिए चेतावनियाँ जारी हो चुकी हैं।

हवाई युद्ध का एक तय क्रम होता है। उसमें छठा कदम है दुश्मन की एयर डिफेंस को दबाना (SEAD)। वह कदम अब उठ चुका है।

इसका मतलब: यह सिर्फ “डिटरेंस” नहीं दिखता। आसमान साफ किया जा रहा है, और ऐसा तब होता है जब कुछ बड़ा होने वाला हो।

F-22 की यह तैनाती बताती है कि तैयारियाँ अपने अंतिम चरण में हैं। यह चेतावनी नहीं, कार्रवाई से पहले की व्यवस्था जैसी दिखती है।

-शीतल पी सिंह

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन