Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

सुख-दुख

अमर उजाला, दैनिक जागरण जैसे अखबारों में वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे प्रदीप मिश्रा का निधन!

राजेंद्र त्रिपाठी-

अलविदा प्रदीप: मुझे माफ करना देना…

सुबह के करीब आठ बजे थे। मैं किसी मित्र के यहां बैठा था। मोबाइल बजा, निगाहें स्क्रीन पर गई. तो देखा सपना का फोन था। ….प्रदीप भैय्या के बारे में कोई खबर है आपके पास? किसी अनहोनी की आशंका से दिल की धड़कने तेज हो उठीं थीं। प्रदीप भैय्या नहीं रहे-। किसने बताया..? राजश्री के व्हाट्सअप का स्टेटस देखो। फिर तो न देखने की हिम्मत हुई और न सुनने की। राजश्री ने स्टेटस डाला है तो सच ही होगा, फिर भी मन मानने को तैयार नहीं था।

प्रदीप मिश्रा से अक्सर मजाकिया लहजे में कहा करता था-“खुला खेल फर्रुखाबादी” का मतलब क्या होता है। प्रदीप का जवाब होता था-“सर, खुल्लम खुल्ला….बिंदास बोल…पीठ पीछे नहीं सरेआम पोल खोल”। प्रदीप का मिजाज भी कुछ ऐसा ही था। प्रदीप सच में फर्रूखाबादी थे। साथियों से काम लेने में सख्त मिजाज, एक्शन लेने की बात करता तो रहमदिल। खुद ही कहने लगते कि- “सर छोड़ दो, अब ये गलती नहीं करेगा”। अमर उजाला में करीब दस बरस तक प्रदीप मेरे लेफ्टिनेंट रहे।

2010 में जब आगरा पहुंचा तो प्रदीप उप-समाचार संपादक की भूमिका में थे। अपकंट्री संस्करणों की जिम्मेदारी उनके कंधो पर थी। यहां करीब पांच साल मेरे नायब रहे। 2016 में जब आगरा से बनारस पहुंचा तो उनके काम को देखते हुए मैंने बनारस बुला लिया। करीब तीन साल यहां समाचार संपादक की भूमिका में रहे। 2019 से मेरठ में मेरी टीम का फिर से हिस्सा बने।

90 के दशक में अमर उजाला विस्तार ले रहा था। पंजाब में लांचिंग की तैयारी थी। टीम तैयार की जा रही थी। पंजाब रवाना होने के पहले टीम को मेरठ यूनिट में दीक्षित किया जाता था। अलग-अलग मीडिया हाउस से आ रहे लोगों को अमर उजाला की रीति-नीति के बारे में समझाया जाता था। सिटी चीफ होने के नाते टीम रिपोर्टिंग का हिस्सा बनने जा रहे लोगों को एक हफ्ते मेरे कमांड में रहना पड़ता था। उन तमाम लोगों में प्रदीप भी एक थे जो पंजाब के तैयार की जा रही टीम का हिस्सा थे। ये छोटी और पहली मुलाकात थी। इसके बाद हमारी आगरा में ही मुलाकात हुई। इस बीच कोई संवाद भी नहीं रहा। वो अपने काम में व्यस्त रहे, मैं अपने।

अप्रैल 2021 में जिम्मेदारी से मुक्त हुआ तो प्रदीप मेरठ यूनिट में ही थे। एक दिन अचानक उनकी बीमारी की सूचना मिली। मैं घर पहुंचा तो उनकी हालत देख कर विचलित होना ही था। सच कहूं तो किसी भी प्रिय की ऐसी हालत मुझसे देखी नहीं जाती। यही वजह रही कि प्रदीप मेरठ से लखनऊ चले गए। मैं लखनऊ देखने नहीं जा सका। सपना और राजश्री की बातें होती रहती थीं…आज अचानक ये बुरी खबर मिली।

मुझे माफ करना प्रदीप, लखनऊ न पहुंच पाने का मलाल रहेगा। अपना खयाल रखना श्रेया बिटिया (प्रकृति मिश्रा), अपनी मम्मी राजश्री का भी खयाल रखना। तुमने बेटों से बढ़ कर प्रदीप के लिए संघर्ष किया है। हम बचा नहीं सके। जुझारू प्रदीप मिश्रा भी खूब लड़े पर विधि के विधान को कौन टाल सका है। विनम्र श्रद्धांजलि। अलविदा


दैनिक जागरण, लखनऊ से पत्रकारिता की शुरुआत करने वाले प्रदीप मिश्र अब हमारे बीच नहीं रहे। हाल ही तक वह अमर उजाला में समाचार संपादक के पद पर थे। परमात्मा उन्हें अपने श्रीचरणों में सबसे करीब स्थान प्रदान करें। -राजू मिश्रा, वरिष्ठ पत्रकार


राहुल विश्वकर्मा-

कुछ लोग होते हैं जो जीवन में बहुत अहमियत रखते हैं. ये बहुत दखल तो नहीं रखते, लेकिन इनका प्रभाव बहुत रहता है. आपके प्रति अपनत्व वे दर्शाते नहीं, बस आहिस्ता से जता देते हैं. मिजाज भी बिलकुल नारियल जैसा… ऊपर से बेहद सख्त और अंदर से नर्म, मुलायम, रुई के फाहों जैसा. ऐसे ही थे प्रदीप सर. ये ‘थे’ लिखना बड़ा अखर रहा. ये असमय है. असामान्य है.

पिछले 20 बरस से भी ज्यादा समय से प्रदीप सर के साथ जुड़ाव रहा. 23 मार्च 2006. इसी तारीख को सर से पहली मुलाकात हुई. जम्मू के विक्रम चौक के पास मौजूद अमर उजाला के दफ्तर में आते ही मुझे प्रदीप सर के सुपुर्द कर दिया गया. सर से ही पत्रकारिता का ककहरा सीखा.

बीते कुछ वर्षों से आपने बेहद बहादुरी से बीमारी का सामना किया. इस बुरे वक्त में भाभी जी ने जिस तरह सेवा की, उसे शब्दों में बयां करना नामुमकिन है. पिछले कुछ महीनों में सर से लखनऊ उनके घर जाकर मिला. शुरू में लगा कि शायद ये जंग जीत ली जाएगी, लेकिन फरवरी में सर से जो मुलाकात हुई (जो अब आखिरी बन गई), उसने शंकित कर दिया था. आज सुबह ये बुरी खबर पता चलते ही मन उदास हो गया.

अलविदा सर. बिटिया श्रेया आपका नाम बहुत रौशन करेगी.


शम्भूनाथ शुक्ला-

जुलाई 2011 में मुझे अमर उजाला के मेरठ ऑफिस में वेस्टर्न यूपी और उत्तराखंड का इंचार्ज बना कर भेजा गया। सुनील शाह वहाँ न्यूज़ एडिटर थे, मुझे यह पसंद आया क्योंकि सुनील शाह मेरे साथ जनसत्ता में काम कर चुके थे। किंतु जल्द ही सुनील शाह को बरेली में स्थानीय संपादक बना कर भेज दिया गया। न्यूज़ एडिटर के बिना मेरठ में सहयोगियों से डायलॉग मुश्किल होता है।

कुछ दिनों बाद प्रदीप को बतौर न्यूज़ एडिटर मेरे पास भेजा गया। दुबले-पतले प्रदीप बहुत विनम्र और ज़हीन थे। मगर मेरे साथ उम्र में गैप था इसलिए मेरे कमरे में आने के पूर्व वे कई बार परमीशन लेते।

उनसे मेरा अधिक परिचय तो नहीं रहा मगर मुझे व्यक्ति और एक पत्रकार के तौर पर पसंद आए। फ़रवरी 2013 मेरी आयु 58 की हो गई या मैं नियमानुसार सेवा से मुक्त हो गया। सेवा विस्तार मैंने चाहा नहीं फिर भी मालिकान ने मुझे वर्क फ्रॉम होम का काम सौंपा। ऑफिस जाना बंद हो गया तो पुराने सहकर्मियों से भी नाता टूट गया।

अलबत्ता प्रदीप जी बीच-बीच में फ़ोन कर लेते। आज फेसबुक के माध्यम से उनके निधन की सूचना मिली तो धक से रह गया। यह भी कोई उम्र थी जाने की। पर विधि का विधान!
साथी प्रदीप की स्मृतियों को नमन!

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
1 Comment

1 Comment

  1. Varshney Manoj

    April 21, 2026 at 5:25 pm

    कुछ लिखने की हिम्मत नहीं। जिनसे सीखा उनकी ऐसी खबरें विचलित करती हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन