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क्रूड महंगा होने की PR खबरें छपवाकर इंडियन ऑयल ने कूटा 14,500 करोड़ का मुनाफा!

IOCL Q4 results: net profit up 78% YoY to ₹14,458 crore; final dividend ₹1.25 per share.

सुभाष सिंह सुमन-

इंडियन ऑयल ने कल मार्च क्वार्टर का रिजल्ट दिया। मार्च क्वार्टर मने 01 जनवरी से 31 मार्च तक का समय। ईरान पर अमेरिका और इजरायल ने हमला किया था 28 फरवरी को। तेल के दाम 01 मार्च को ही 100 डॉलर पार कर गया था। उसके बाद से ऑलमोस्ट 100 डॉलर के ऊपर ही है।

सरकार और ये सरकारी कंपनियाँ रो रही हैं कि क्रूड 100 डॉलर पार होने से उन्हें पेट्रोल और डीजल पर हर लीटर 35 रुपये का घाटा हो रहा है। अभी दाम बढ़ने की शुरुआत से पहले इस एंगल से आप सब ने खूब खबरें देखी होंगी। सभी टॉप के पब्लिकेशन ने इस एंगल से खबरें की थीं। वे खबरें वास्तव में पेड PR कैंपेन से छपी थीं।

सरकार और सरकारी कंपनियों ने इस एंगल से खबरें कराने पर बड़े मजे में टैक्सपेयर्स के करोड़ों फूंक दिये होंगे। अब मार्च क्वार्टर का रिजल्ट देख लीजिये। इंडियन ऑयल खुद बता रही है शुद्ध लाभ 78% बढ़ा है और 14,500 करोड़ रुपये के करीब हो गया है।

भक्त लोग थेथरई कर सकते हैं, इस कारण कुछ बातें स्पष्ट लिखते हैं अब। पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ने शुरू हुए मई में। यानी मार्च क्वार्टर में पूरा एक महीना (मार्च महीना) कथित तौर पर हर लीटर डीजल-पेट्रोल 30-35 रुपये का घाटा करा रहा था, फिर ये नेट प्रॉफिट 78% बढ़ा कहाँ से? स्पष्ट है कि दाम बढ़ाये जाने से पहले भी किसी को कोई घाटा नहीं हो रहा था।

दूसरी बात, भारत में आप पेट्रोल पर जो खुदरा कीमत देते हैं, उसमें 55% हिस्सा टैक्स और सेस का है। डीजल पर 50%। मतलब यदि केंद्र और राज्य सरकारें कुछ समय के लिए थोड़ा लोड खुद उठाने की नीयत रखें, तो डीजल और पेट्रोल की कीमत 50 रुपये लीटर से कम हो सकती है। मजे की बात, उसमें भी न तो किसी कंपनी को घाटा होने वाला है, न ही सरकार की पूरी कमाई गायब होने वाली है, क्योंकि 20% का गन्नाकरी ब्रो ने अलग इंतजाम कर रखा है। ये न भी करें, दाम स्थिर ही रखें, तो भी कहीं वज्रपात नहीं होने वाला है।

2013 में क्रूड ने 140 डॉलर का ऑल टाइम हाई बनाया था। अभी के संकट में 120 डॉलर तक जा पाया है। वो भी जाता है और छू कर वापस आ जाता है। 2013 में पेट्रोल का भाव था 55 रुपये लीटर। अभी देश के ज्यादातर हिस्से में 100 के पार है। घाटा 2013 में भी नहीं हो रहा था, जबकि तबसे अब तक शोधन की तकनीक एडवांस हुई है। अब क्रूड का उस समय से अधिक इस्तेमाल हो पाता है। मतलब कायदे से पेट्रोल 50 रुपये से नीचे ही होना चाहिए।

लेकिन ऐसा नहीं हो सकता। कम से कम ट्रंप चचा के सामने चरणागत हो चुके (अंग्रेजी में कॉम्प्रोमाइज हो चुके) प्रधान की सरकार से तो बिल्कुल नहीं हो सकता। ये भाई हर वो काम करेगा, जो ICE इंजन को बर्बाद करे और EV को बढ़ावा दे। भाई से EV का प्रमोशन उचित तरीके से हो नहीं पा रहा। उसके लिए इंफ्रा बनाने होंगे। पॉलिसी बनानी होगी। काम करने पड़ेंगे। वो इनसे होना नहीं है।

तो भाई बैकडोर से EV पुश करेगा। गोरी चमड़ी वाले आकाओं का आदेश है यह। इसका पालन होकर रहेगा। इसके लिए भले ही पेट्रोल और डीजल को 150 रुपये लीटर करना पड़े या पेट्रोल में 80% गन्ना जूस मिलाना पड़ जाये। ईरान संकट ने इन्हें आकाओं के आदेश का पालन करने का एक सॉलिड बहाना भर दिया है।

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