अकले, द हिन्दू ने मुख्य खबर के साथ कांग्रेस की असहमति को प्रकाशित किया है। देशबन्धु में विरोध भी साथ है, टाइम्स ऑफ इंडिया में संपादकीय पन्ने पर एक बढ़िया लेख। काश! पहले की तरह कोई विशेष संपादकीय होता लेकिन अब वैसे संपादक कहां रहे?
संजय कुमार सिंह
आज मेरे 10 में से नौ अखबारों की लीड एसआईआर पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला है। एक अखबार, दि एशियन एज की लीड का शीर्षक है, सिद्धारमैया आज इस्तीफा दे सकते हैं; डीके शिवकुमार का कर्नाटक का मुख्यमंत्री होना तय। मैं पहले लिख चुका हूं कि यह अटकल कई दिनों से चल रही है। कांग्रेस का आंतरिक मामला है। घोषणा नहीं हुई है तो खबर नहीं है। अटकल एक बार, एक दिन तो खबर हो सकती है लेकिन लगातार कई दिनों तक ऐसा करना हेडलाइन मैनेजमेंट का भाग हो सकता है। खासकर इसलिए कि कांग्रेस अगर ऐसा करना चाहे तो उसे रोका नहीं जा सकता है और कर दे तो छिपाया नहीं जा सकता है। फिर भी रोज पहले पन्ने की एक खबर की जगह खराब करना पत्रकारिता तो नहीं हो सकती है पर वह अलग मुद्दा है। कर्नाटक का मुख्यमंत्री बदलने की अटकल आज हिन्दुस्तान टाइम्स, टाइम्स ऑफ इंडिया में भी पहले पन्ने पर प्रमुखता से है। केरल के पूर्व मुख्यमंत्री पिनराई विजयन के घर ईडी का छापा दूसरी बड़ी खबर है। इसपर कुछ कहने की जरूरत नहीं है। यह सब करने-करवाने का मकसद होता है, सरकार विरोधी खबरें दब जाएं। उदाहरण के लिए, सीबीएसई की उत्तर पुस्तिकाओं की जांच से संबंधित विवाद की खबर आज पहले पन्ने से गायब है। नीट मामले में गिरफ्तारियों का प्रचार हो रहा है। मीडिया ट्रायल चल रहा है लेकिन राहुल गांधी ने वीडियो जारी करके कुछ सवाल किए हैं और एक्स पर भी लिखा है। लेकिन वह खबर सिर्फ देशबन्धु में पहले पन्ने पर दिखी। एसआईआर पर सुप्रीम मुहर जैसा प्रचार है जो नवोदय टाइम्स की लीड का शीर्षक है। अमर उजाला में पहले पन्ने पर एक शीर्षक है, (चुनाव) आयोग मतदाताओं के साथ था, है और रहेगा। यह खबर मुख्य चुनाव आयुक्त की तस्वीर के साथ छपी है और राहुल गांधी के सवाल पहले पन्ने पर तो नहीं ही हैं। दूसरी ओर ज्ञानेश कुमार के कहने का क्या मतलब है जब उनके मतदाताओं के साथ रहते लाखों मतदाता वोट नहीं दे पाए और वे सरकार के दुलारे हैं उनकी नियुक्ति से संबंधित मामले को सुप्रीम कोर्ट ने ठंडे बस्ते में रख दिया और यह फैसला कर दिया कि चुनाव आयोग को एसआईआर कराने का अधिकार है। अभी तो दिखाई दे रहा है कि चुनाव आयोग का मुखिया सरकार का चुना हुआ है, नियुक्ति से संबंधित मामले पर फैसला नहीं हुआ है (था) और उसने जो किया वह गैर जरूरी था, सरकार के हित में था फिर भी होने दिया गया और हो जाने के बाद कहा जा रहा है कि उसका अधिकार है। अगर नहीं था या इसपर विवाद था तो स्टे दिया जाता। दिया जाता रहा है। इसलिए फैसला तो सबको मालूम था। इससे अलग कुछ हो भी नहीं सकता था।
योगेन्द्र यादव ने इस संबंध में बुधवार को दिन में 11:36 बजे लिख दिया था, मैं आज एसआईआर मामले में सर्वोच्च न्यायालय का फैसला सुनने के लिए उपस्थित नहीं हुआ। इस मामले में एक वादी होने के नाते और अदालत को संबोधित करने का सम्मान प्राप्त करने वाले व्यक्ति के रूप में, मुझे आशावान, चिंतित या कम से कम उत्सुक होना चाहिए था लेकिन मैं नहीं था। मामला बहुत पहले ही तय हो चुका था। हम केवल फैसले की कॉपी और उसके बारीक विवरण का इंतजार कर रहे थे। जाहिर है फैसले में कुछ नया नहीं है लेकिन जो व्यवस्था है उसमें लीड बनी है। जहां नहीं है वहां भी व्यवस्था का ही ख्याल रखा गया है। संभव है इससे संबंधित आदेश (अगर कोई होता हो) का पालन किया गया है। वरना जनहित में राहुल गांधी की मांग उनके आरोप लीड क्यों नहीं हो सकते हैं। सीबीएसई मामले में प्रधानमंत्री ने कुछ नहीं कहा है, जिस बच्चे ने शिकायत सार्वजनिक की उसे पाकिस्तानी बता कर मामले को कमजोर करने की कोशिश सरकारी एंकर और प्रधानमंत्री के चहेते ने की, सीबीएसई और शिक्षा मंत्रालय ने चूक या गड़बड़ी स्वीकार नहीं की है, लीपने-पोतने की कोशिश करता पकड़ा गया है। दूसरी ओर, देशबन्धु की खबर से पता चलता है कि राहुल गांधी ने नीट अभ्यर्थियों से मुलाकात की, कांग्रेस नेता कन्हैया ने प्रेस कांफ्रेंस कर कहा कि हर घंटे दो छात्र आत्महत्या कर रहे हैं। इसीलिए राहुल गांधी ने सीबीएसई के परीक्षार्थियों को आश्वस्त करने के लिए कहा है, “हम मांग करते हैं कि इस पूरे घोटाले के असली दोषियों को सामने लाने के लिए स्वतंत्र न्यायिक जांच और एसआईटी का गठन तत्काल किया जाए। सीबीएसई के जेनज़ी साथियों – आपकी मेहनत, आपका भविष्य, कोई चुरा नहीं पाएगा। हम इस साजिश की तह तक जाएंगे और इस भ्रष्टाचार को जड़ से उखाड़ फेंकेंगे।” अखबारों ने इसे महत्व नहीं दिया है।
इस स्थिति में आज के अखबारों ने एसआईआर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लीड बनाया है जबकि अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा है कि अदालत ने चुनाव आयोग को ब्लैंक चेक दे दिया है। अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा है कि एसआईआर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले में विरोधाभास है। देशबन्धु में मूल खबर का शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट ने एसआईआर को सही ठहराया। उपशीर्षक है, सर्वोच्च अदालत ने (इसे) स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए जरूरी कदम बताया। अखबार ने इस खबर पर दो अधिवक्ताओं की प्रतिक्रिया छापी है तो भाजपा प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी की प्रतिक्रिया भी पहले पन्ने पर है। इसका शीर्षक है, यह (फैसला) विपक्ष की राजनीतिक, संवैधानिक और नैतिक हार है। दूसरी ओर, सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले को जायज बचाने के लिए जो तर्क दिए हैं उसे भी अखबारों ने अच्छी तरह प्रचारित किया है। उदाहरण के लिए अमर उजाला का शीर्षक है, एसआईआर वैध… चुनाव आयोग का अधिकार लोकतंत्र की मजबूती व निष्पक्ष चुनाव चुनाव मकसद। दैनिक भास्कर का फ्लैग शीर्षक है, बिहार में आयोग की कवायद को लेकर दाखिल सभी याचिकाएं खारिज। अखबार ने इसे बड़ा फैसला लिखा है। मेरा मानना है कि यह बड़ा फैसला हो भी तो नया नहीं नहीं है और बड़ा भी क्या है जब चुनाव हो चुके हैं, भाजपा की सरकार बन चुकी है। दुनिया जानती है कि एसआईआर का मकसद यही था। यह अलग बात है कि जिस तरह भाजपा ने आयातित सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाया, नीतिश कुमार को राज्य सभा का सदस्य बनाया, उनके बेटे को मंत्री बनाया उससे अगर नाराजगी हो सकती थी। तब चुनाव रद्द किया जाता तो फैसला बड़ा कहा जा सकता था। दैनिक भास्कर का मुख्य शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट ने कहा – एसआईआर में नागरिकता की सीमित जांच कर सकता है आयोग।
नवोदय टाइम्स में तीन सवालों पर सुप्रीम कोर्ट के जवाब है। लेकिन फैसले पर टिप्पणी नहीं है और यह चुनाव आयोग को ब्लैंक चेक मिलने का प्रचार ही है। दि एशियन एज का शीर्षक है, …. सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के अधिकारों का समर्थन किया। द टेलीग्राफ का शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट ने एसआईआर पर सुप्रीम कोर्ट के अधिकारों को कायम रखा (उपशीर्षक है) लेकिन पैनल नागरिकता का फैसला नहीं कर सकता है : कोर्ट। यह इस तथ्य के बावजूद है कि पश्चिम बंगाल में भाजपा जीत गई और नई सरकार नागरिकता पर फैसला कर रही है। सीधे करे या परोक्ष रूप से – मुख्यमंत्री ने आरपीएफ को ही कह दिया है कि विदेशियों को कोर्ट में नहीं, सीमा सुरक्षा बल को सौंपना है। आप समझ सकते हैं कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला भाजपा की कैसी जीत है और यह उस चुनाव आयोग के दम पर हुई है जिसे प्रधानमंत्री ने बनाया था। अब सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि चुनाव आयोग को यह अधिकार है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि प्रधानमंत्री पसंद के व्यक्ति को मुख्य चुनाव अधिकारी बनाकर जीत जाएं पर ऐसा हो चुका है और अखबारों में यह मुद्दा नहीं है। मेरे हिसाब से यह मीडिया का पक्षपात है। डर से हो या समर्पण। द हिन्दू की लीड का शीर्षक है – सुप्रीम कोर्ट ने एसआईआर को सही ठहराया, कहा यह चुनाव आयोग का संवैधानिक कर्तव्य है। उपशीर्षक है, कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग वोटर लिस्ट में नाम शामिल करने या हटाने के लिए नागरिकता की जाँच कर सकता है; उसने चुनाव आयोग से बिहार के उन वोटरों के नाम, जिन्हें लिस्ट से हटा दिया गया है, नागरिकता कानून के तहत फ़ैसला करने के लिए केंद्र सरकार को भेजने को कहा। अखबार ने भारत के मुख्य न्यायाधीश का यह कथन हाईलाइट किया है कि नागरिकता (वोटर लिस्ट में) नाम दर्ज कराने के लिए एक अनिवार्य शर्त है। वोटर लिस्ट तैयार करने या उसमें संशोधन करने के दौरान, चुनाव आयोग के पास निस्संदेह नागरिकता से जुड़े सवालों की जाँच करने का अधिकार है। द हिन्दू मेरे अखबारों में अकेला है जिसने कांग्रेस की असहमति को प्रमुखता से स्थान दिया है। शीर्षक है, सम्मानपूर्वक असहमत: कांग्रेस। इसके तहत कहा गया है, कांग्रेस ने बुधवार को कहा कि वह सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश से “विनम्रतापूर्वक असहमत” है, जिसमें वोटर लिस्ट के विशेष गहन परीक्षण (एसआईआर) की वैधता को सही ठहराया गया है। हिन्दुस्तान टाइम्स का शीर्षक है – सुप्रीम कोर्ट ने कहा, एसआईआर वैध है, ईसीआई के अधिकारों में आता है। सर्वोच्च अदालत ने क्या कहा – के तहत सुप्रीम कोर्ट के और भी स्पष्टीकरण और तर्क हैं लेकिन असहमति, विरोध या विरोधाभास नहीं है।
टाइम्स ऑफ इंडिया का शीर्षक है, ‘लोकतंत्र का मतलब योग्य मतदाता हैं’: सुप्रीम कोर्ट ने बिहार एसआईआर को सही ठहराया। यहां भी सुप्रीम कोर्ट के तर्क और स्पष्टीकरण हैं। हालांकि, अखबार ने अपने संपादकीय पन्ने के एक पठनीय लेख होने की सूचना भी दी है। अंग्रेजी में इसका शीर्षक, यस सर बट ऑलसो नो सर है। हिन्दी में मोटा मोटी इसका मतलब हुआ, एसआईआर तो ठीक है लेकिन ठीक नहीं भी है। कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के एक रिसर्च स्कॉलर, अदित्य प्रसन्न भट्टाचार्य के इस लेख का जो अंश अखबार ने हाईलाइट किया है वह हिन्दी में कुछ इस तरह होगा, अच्छी बात है कि सुप्रीम कोर्ट ने मतदान को एक संवैधानिक अधिकार के रूप में मान्यता दी है। लेकिन, उसका मतलब हो, इसके लिए मतदाता सूची में नाम शामिल करना सुनिश्चित करना चुनाव आयोग की सकारात्मक जिम्मेदारी होनी चाहिए और किसी को बाहर करना उचित ठहराने की जिम्मेदारी उसी को दी जानी चाहिए। फैसला यह काम नहीं करता है। इंडियन एक्सप्रेस की खबर भी एसआईआर को वैध बताने और सुप्रीम कोर्ट को सही ठहराने वाली है। मुख्य शीर्षक के अलावा सिंगल कॉलम की एक खबर का शीर्षक है, इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से कहा कि हटाए गए मतदाताओं की रिपोर्ट करे, (इस तरह) नागरिकता जांच की (बुनियादी) तैयारी कर दी। मुझे लगता है कि सुप्रीम कोर्ट ने जो कहा वह कानूनी मसला होगा पर व्यावहारिक नहीं है। ऐसा होता नहीं है और नागरिकता की जांच या इसे सुनिश्चित करने की जरूरत तब होगी जब किसी और देश में भारत के मतदाताओं की सूची बन रही हो। जो पहले से है उसे (बिना शिकायत) जांचने का मतलब ही नहीं है। भारत में जो सामान्य तौर पर रह रहा है, अपना मकान है या किराए के घर में बतौर नागरिक रह रहा है तो उसे नागरिक नहीं मानने का कारण होना चाहिए उससे नागरिकता साबित करने का मतलब है कि देश में अवैध घुसपैठिए रह रहे हैं। यह भाजपा का प्रचार है और फ्लैट में रहने वालों के लिए नहीं है। झुग्गियों में रहने वालों मजदूरों और कम पढ़े लिखे लोगों के लिए है। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश का असर यह होगा कि अभी भाजपा तमाम लोगों के नाम कटवाकर जीत गई और जब जरूरत होगी इनके नाम शामिल करवाकर जीत जाएगी। तब कोई और तर्क दे दिए जाएंगे। मूल मुद्दा यह है कि जो सामान्य तौर पर रह रहा है वह वोटर क्यों नहीं है और (नागरिक) नहीं है तो रह कैसे रहा है?

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।



