दिबांग उन पत्रकारों में हैं, जिन्होंने टीवी पत्रकारिता को सिर्फ़ शोर और सनसनी का मंच नहीं बनने दिया। उन्होंने सवाल पूछने की उस परंपरा को जीवित रखा, जिसमें सत्ता से असहमति भी थी, समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के प्रति संवेदना भी और तथ्यों के प्रति प्रतिबद्धता भी।
पिछले कई वर्षों से तमाम चोटी के न्यूज चैनलों में विभिन्न पात्र अदा कर चुके दिबांग अब एक नए सफ़र पर निकल रहे हैं। वे अपना यूट्यूब चैनल ‘दिबांग ऑफ़िशियल’ लेकर आ रहे हैं।
ऐसे समय में, जब शोर को संवाद और प्रचार को पत्रकारिता का विकल्प बनाने की कोशिशें तेज़ हैं, दिबांग जैसी संतुलित, निर्भीक और विश्वसनीय आवाज़ों की ज़रूरत पहले से कहीं अधिक है। उनके इस नए मंच का स्वागत होना चाहिए।
देखें चैनल और सब्सक्राइब करें-
https://youtu.be/AO75NCTtyrg?si=SH6mlCHqXxtp_FTs
दिबांग एनडीटीवी में मेरे बॉस थे। हम जैसे हमेशा उतावले रहने वाले युवाओं को तिरछी निगाहों से तौलते रहते थे, जो काम से ज़्यादा महत्वाकांक्षी नज़र आते थे। साथ में काम करते हुए हमारी उतनी बात नहीं हुई, जितनी बाद में हुई। मैं उन्हें पसंद करता हूं, प्यार करता हूं। उन्हें पिछले कई बरसों से आप एबीपी न्यूज़ पर देख रहे होंगे। अब वह अपना नया यूट्यूब चैनल लेकर आ रहे हैं, दिबांग ऑफ़िशियल। उनके चैनल को सब्सक्राइब कीजिएगा। इस समय उन जैसी तमाम आवाज़ें देश की ज़रूरत है।
-अविनाश दास, वरिष्ठ पत्रकार और फिल्मकार
दिबांग भी आ गये यूट्यूब चैनल लेकर. उन्हें बहुत बधाई और शुभकामनायें. इनके चैनल का नाम है दिबांग ऑफिशियल. ऐसा ही नाम तमाम मीडिया मित्रों ने अपने चैनलों का रखा है. यानि अपने नाम से. कभी मैं अगर इस राह में गया तो जेनेरिक नाम रखूंगा – अपने नाम से तो कभी नहीं. मैं टीम पर्सन हूं. जब भी आऊंगा तो टीम के साथ आऊंगा और टीम के सभी लोगों की अपनी पहचान के सिद्धांत पर. मुझे बहुत बुरा लगेगा अगर मेरा कोई भी सहयोगी ये कहेगा कि मैं “प्रशांत ऑफिशियल” के लिए काम करता हूं. उनका उद्देश्य भले ये न हो पर आत्ममुग्धता की ध्वनि तो जाती ही है. यूट्यूब में तलाश कर के सब्स्क्राइब कर लीजिए. दिबांग अनुभवी और शानदार पत्रकार हैं.
-प्रशांत टंडन (वरिष्ठ पत्रकार)
यही वो चीज़ है जो मीडियाकर्मियों के बीच से ग़ायब हो रही हैः
आज सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लोगों की टाइमलाइन दिबांग की वीडियो से भरी है. दशकों तक न्यूज़रूम के बॉस रहे दिबांग अब यूट्यूब की दुनिया में शामिल हो रहे हैं. इस फैसले तक पहुंचने की उनकी अपनी वजह रही होगी. संभवतः न्यूज चैनल-अख़बार की दुनिया छोड़कर यूट्यूब का रास्ता पकड़ने के सभी वरिष्ठ मीडियाकर्मियों के अपने कारण रहे हों. लेकिन
व्यक्तिगत स्तर पर अलग-अलग कारणों के बीच दो बातें एकदम स्पष्ट है- पहली तो ये कि पत्रकारिता अब रिटायर होने तक बने रहने का पेशा नहीं रहा, रहने ही नहीं दिया गया और दूसरा कि अब हम “Solo Journalism” के दौर में प्रवेश कर चुके हैं. एक ऐसा दौर जिसमें संस्थानों की पत्रकारिता, उसके बीच की संभावनाएं तेज़ी से ख़त्म हो रही है, उसका ढांचा बुरी तरह ध्वस्त हो गया है. ऐसे में,
आज जो संस्थान के भीतर रहकर काम कर रहा है, वो कल को संभावित यूट्यूबर होगा, इसी सोलो जर्नलिज़्म का हिस्सा होगा. सोलो जर्नलिज़्म की दुनिया बड़ी होगी और ओपिनियन बेस्ड पत्रकारिता, रूटीन रिपोर्ट के पैटर्न को पीछे छोड़ देगी.
आज मुझे ये देखकर अच्छा लग रहा है कि मीडियाकर्मियों के बीच जो दो धूरी बिल्कुल स्पष्ट बन चुकी है और दोनों अपने-अपने बाड़े में ही रहकर ताल ठोंकना बेहतर समझते हैं, आज इससे बाहर निकलकर दिबांग के यूट्यूब पर आने का स्वागत कर रहे हैं. जो कभी सामान्य बात हुआ करती, आज दुर्लभ लग रही है. अपने से दुगुने उम्र के संपादक को डपटे जाने के टीवी डिबेट के दृश्यों और सोशल मीडिया पर तू-तड़ाक पर उतर आने के बीच, आज दिबांग को इस अंदाज़ में बधाई देते हुए मीडियाकर्मियों को देखना अच्छा लगा. इस पेशे के भीतर आपस में लिहाज़-सम्मान बना रहे.
-विनीत कुमार (मीडिया विश्लेषक)


